पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को देखते हुए सरकार ने आज पेट्रोल और डीजल पर अतिरिक्त उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की भारी कटौती कर दी। पेट्रोल, डीजल की कीमतों को बढ़ने से रोकने के लिए यह पहल की गई है ताकि उपभोक्ताओं पर बोझ नहीं पड़े। मगर इससे अगले वित्त वर्ष में सरकार का राजस्व करीब 1.3 लाख करोड़ रुपये कम हो सकता है।
वित्त मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार पेट्रोल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क 13 रुपये प्रति लीटर से घटाकर 3 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है और डीजल पर यह 10 रुपये प्रति लीटर से घटाकर शून्य कर दिया गया है। कटौती तुरंत लागू हो गई है। सरकार ने पिछले वर्ष अप्रैल पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में 2 रुपये प्रति लीटर बढ़ाया था।
सरकार ने देसी बाजार में दोनों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए डीजल और विमान ईंधन (एटीएफ) के निर्यात पर एक बार फिर शुल्क लगा दिया है। डीजल निर्यात पर 21.5 रुपये प्रति लीटर और एटीएफ निर्यात पर 29.5 रुपये प्रति लीटर का शुल्क लगाया गया है। पहले इनके निर्यात पर शुल्क नहीं था। अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच भारत से 1.4 करोड़ टन पेट्रोल और 2.36 करोड़ टन डीजल का निर्यात हुआ, जिसमें बड़ा हिस्सा रिलायंस इंडस्ट्रीज का रहा।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ‘पश्चिम एशिया संकट को देखते हुए घरेलू खपत के लिए पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क में प्रति लीटर 10 रुपये की कमी की गई है। इससे उपभोक्ता कीमत में इजाफे से बच जाएंगे।’
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सरकार के अधिकारियों का अनुमान है कि शुल्क में कटौती से अगले पंद्रह दिनों में लगभग 7,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होगा, जिसके बाद स्थिति की समीक्षा की जाएगी। इससे संकेत मिलता है शुल्क में यह कटौती कुछ समय के लिए ही है। केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) के चेयरमैन विवेक चतुर्वेदी ने कहा, ‘सरकार हर पंद्रह दिनों में डीजल और एटीएफ पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क की समीक्षा करेगी।’
पेट्रोल की कीमतें रोजाना बदलने वाली मूल्य व्यस्था से तय की जाती हैं, जो कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत, विनिमय दर और करों के पिछले 15 दिन के औसत पर काम करती है। अंतिम उपभोक्ता मूल्य में आधार मूल्य, केंद्रीय उत्पाद शुल्क, डीलर कमीशन और राज्य-स्तरीय वैट शामिल होता है।
चतुर्वेदी ने कहा कि शुल्क कटौती से अगले 15 दिन में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन जैसी तेल मार्केटिंग कंपनियों को लगभग 1,500 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय होने की उम्मीद है।
अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि कटौती पूरे वित्त वर्ष 2027 में लागू रही तो सरकारी खजाने को 1.3 लाख करोड़ से 1.7 लाख करोड़ रुपये तक की चपत लग सकती है। क्वांटइको रिसर्च की अर्थशास्त्री युविका सिंघल ने कहा, ‘शुल्क में कटौती से तेल कंपनियों को राहत मिलेगी। यदि ऐसा नहीं होता तो कीमतों में वृद्धि का भार उपभोक्ताओं पर डाला जा सकता था।’
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विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया संकट से उपभोक्ताओं को बचाने के लिए सरकार ने अपनी बैलेंस शीट में जो अतिरिक्त बोझ शामिल किया है, उसकी वजह से पूंजीगत व्यय करने की उसकी क्षमता कम हो सकती है। बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा, ‘उर्वरक सब्सिडी के कारण सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी अधिक होने की संभावना है, इसलिए राजस्व की हानि अधिक हो सकती है। हमें देखना होगा कि क्या इसकी भरपाई व्यय में कटौती से की जाएगी।’
सरकार ने 2026-27 के बजट में पूंजीगत व्यय को बढ़ावा दिया था और आवंटन 11.5 फीसदी बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ रुपये कर दिया था जबकि वित्त वर्ष 2025-26 के संशोधित अनुमानों में यह 10.9 लाख करोड़ रुपये था। अर्थशास्त्रियों को लगता है कि राजस्व नुकसान का राजकोषीय घाटे पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है और यदि यह पूरे वित्त वर्ष बना रहता है तो इससे राजकोषीय घाटे में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.3 से 0.4 फीसदी इजाफा हो सकता है। सबनवीस ने कहा, ‘व्यय नियंत्रण राजकोषीय घाटे के स्तर पर निर्भर करेगा और यह सरकार का निर्णय होगा।’
केंद्रीय बजट के संशोधित अनुमानों के अनुसार सरकार चालू वित्त वर्ष में विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क के माध्यम से 1.65 लाख करोड़ रुपये जुटाने की उम्मीद कर रही है। अगले वित्त वर्ष के लिए 1.69 लाख करोड़ रुपये जुटाने का अनुमान है।
पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण प्रकोष्ठ से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क के अलावा केंद्र को पेट्रोलियम क्षेत्र से लाभांश भी मिलता है, जो पिछले वित्त वर्ष में 22,000 करोड़ रुपये और चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में 4,634 करोड़ रुपये था। जब सिंघल से पूछा गया कि राजस्व नुकसान के कुछ हिस्से की भरपाई क्या लाभांश से हो सकती है तो उन्होंने कहा, ‘ऐसा तभी हो पाएगा जब तनाव कम हो और तेल कंपनियां साल के अंत में लाभ कमाने लगे। लेकिन अभी स्थिति बिल्कुल भी साफ नहीं है।’
पश्चिम एशिया संघर्ष की शुरुआत के बाद से भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत फरवरी के 69.01 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर मार्च में 117.09 डॉलर प्रति बैरल हो गई है। मगर पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च के मुख्य अर्थशास्त्री देवेंद्र पंत ने कहा, ‘यदि उत्पाद शुल्क वित्त वर्ष 2027 के दौरान वर्तमान स्तर पर बना रहता है तो सरकार को 1.70 लाख करोड़ रुपये राजस्व का नुकसान होगा। उत्पाद शुल्क में कटौती तेल कंपनियों के क्रेडिट प्रोफाइल के लिए अच्छी है। खुदरा कीमतों का स्थिर रखना वित्त वर्ष 2027 के लिए राजकोषीय गणना को जटिल बना सकता है।’