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Explainer: मालगाड़ियों के लिए ‘रफ्तार क्रांति’! डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कैसे बना अंदरूनी व्यापार का नया गेमचेंजर?

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डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर ने मालगाड़ियों को अपनी अलग राह देकर व्यापार की रफ्तार बढ़ा दी है, जिससे अब सामान सस्ता, तेज और सुरक्षित तरीके से पहुंच रहा है

Last Updated- May 08, 2026 | 7:14 PM IST
Western Dedicated Freight Corridor
प्रतीकात्मक तस्वीर

किसी भी अर्थव्यवस्था में व्यापार की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि सामान यानी लॉजिस्टिक्स कितनी तेजी और कम लागत में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचता है। और जब बात देश के भीतर सामान को एक जगह से दूसरे जगह तक ले जाने की हो तो मुख्य रूप से सड़क और रेल मार्ग की सबसे ज्यादा चर्चा होती है। अभी भी देश में माल ढुलाई के लिए सड़क मार्ग सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है, जिसका हिस्सा लगभग 70 फीसदी है। इसके बाद रेल मार्ग का नंबर आता है, लेकिन यह सड़क के मुकाबले लगभग आधा है। सरकार इसी अंतर को पाटने के लिए रेल मार्ग से ढुलाई को तेजी बढ़ाने की जुगत में हमेशा से रही है। लेकिन इसमें एक पेंच फंसता रहा है।

सालों से देश में मालगाड़ियां यात्री ट्रेनों के दबाव में धीमी रफ्तार से चलती रही हैं, जिससे माल समय पर न पहुंचने की समस्या अक्सर सामने आती है। इससे व्यापारियों का समय और पैसा दोनों बर्बाद होता था। इसी समस्या से निपटने के लिए सरकार ने साल 2005 में डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी। इस प्रोजेक्ट के तहत ऐसी रेल लाइनें बनानी थी, जो सिर्फ माल ढुलाई के लिए ही इस्तेमाल किया जा सके। 

इसके तहत पंजाब के लुधियाना से बिहार के सोननगर तक 1337 किमी लंबे ईस्टर्न कॉरिडोर (EDFC) और उत्तर प्रदेश के दादरी से महाराष्ट्र के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट (JNPT) के बीच 1,506 किमी लंब वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (WDFC) चालू हो चुका है। वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (WDFC) को मार्च 2026 में चालू किया गया है। साथ ही रेल मंत्रालय अब ईस्ट-कोस्ट, ईस्ट-वेस्ट और नॉर्थ-साउथ जैसे तीन नए कॉरिडोर पर भी काम कर रहा है।

एक्सपर्ट का मानना है कि ‘डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर’ (DFC) के पूरी तरह चालू होने के बाद अब लॉजिस्टिक्स सेक्टर की तस्वीर बदल गई है। साल 2026 के आंकड़ों बताते हैं कि मालगाड़ियों के लिए बने इन खास रास्तों ने न केवल ढुलाई की रफ्तार बढ़ा दी है, बल्कि देश की लॉजिस्टिक्स लागत को भी कम करना शुरू कर दिया है। आज उत्तर भारत के औद्योगिक केंद्र सीधे तौर पर गुजरात और महाराष्ट्र के बंदरगाहों से ‘हाई-स्पीड’ के जरिए जुड़े हैं, जो भारत के अंदरूनी व्यापार के लिए एक नई संजीवनी साबित हो रहा है।

मालगाड़ियों का अपना ‘एक्सप्रेसवे’ और समय की नई ‘जरूरत’

लॉजिस्टिक्स की दुनिया में एक-एक घंटा कीमती होता है और डिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) ने इसे हकीकत में बदल दिया है। क्राउन वर्ल्डवाइड ग्रुप की असिस्टेंट जनरल मैनेजर कविता सुरेश कहती हैं, “रफ्तार और समय की बचत ने व्यापार के पूरे गणित को ही बदल कर रख दिया है। पहले मुंबई से दिल्ली के बीच जो माल पहले 72 घंटों में पहुंचता था, वह अब 48 घंटे या उससे भी कम समय में पहुंच रहा है। इसका सीधा और आसान मतलब यह है कि एक व्यापारी साल भर में जहां पहले केवल 10 चक्कर लगा पाता था, अब वह उसी समय में 15 चक्कर लगाने की स्थिति में है।”

कविता सुरेश का कहना है कि लॉजिस्टिक्स इंडस्ट्री में औसत रफ्तार का 50 फीसदी बढ़ना किसी बड़े बदलाव से कम नहीं है। इसका सीधा फायदा देश के कारोबार और बिजनेस ग्रोथ को मिल रहा है। अब असर सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि सप्लाई चेन भी पहले के मुकाबले ज्यादा भरोसेमंद हो गई है और तय समय के हिसाब से काम कर रही है। सामान समय पर पहुंचने से कंपनियों को ज्यादा स्टॉक जमा करके रखने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे उनकी वर्किंग कैपिटल बेहतर तरीके से मैनेज होती है और कारोबार में जोखिम भी कम होता है।

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2026 में एक दिन में चली अधिकतम 900 ट्रेनें

साल 2026 भारत के रेल इतिहास में एक अहम मोड़ बनकर सामने आया है। अब चर्चा सिर्फ नई पटरियां बिछाने की नहीं, बल्कि इस बात की हो रही है कि मौजूदा रेल नेटवर्क का सबसे बेहतर इस्तेमाल कैसे किया जाए। ग्रांट थॉर्नटन भारत के पार्टनर और ट्रांसपोर्टेशन एंड लॉजिस्टिक्स इंडस्ट्री लीडर भाविक वोरा कहते हैं, ”DFC अब देश के लॉजिस्टिक्स सेक्टर में असली बदलाव लाने वाला इंजन बन चुका है। साल 2026 की शुरुआत में ही इस कॉरिडोर पर हर दिन 400 से ज्यादा ट्रेनें चल रही हैं, जबकि व्यस्त समय में यह संख्या करीब 900 तक पहुंच जाती है।”

वोरा के मुताबिक, भारत अब सिर्फ नए इंफ्रास्ट्रक्चर और एसेट बनाने के दौर से आगे निकलकर उस चरण में पहुंच चुका है, जहां पूरे नेटवर्क का बेहतर इस्तेमाल सबसे बड़ी ताकत बन गया है। सप्लाई चेन में आने वाली रुकावटें अब धीरे-धीरे पुरानी बात होती जा रही हैं। अब मालगाड़ियों को स्टेशनों की लूप लाइन में खड़े होकर पैसेंजर ट्रेनों के गुजरने का इंतजार नहीं करना पड़ता, बल्कि वे तय समय के हिसाब से लगातार चल रही हैं। इसी नेटवर्क इफेक्ट का असर है कि भारतीय रेलवे ने वित्त वर्ष 2026 में 1.67 मिलियन टन माल ढुलाई का रिकॉर्ड बनाया। यह दिखाता है कि ये कॉरिडोर सिर्फ पुराने ट्रैफिक को दूसरी जगह शिफ्ट नहीं कर रहे, बल्कि देश में नए आर्थिक और व्यापारिक वॉल्यूम भी पैदा कर रहे हैं।

लॉजिस्टिक्स लागत का संकट और 8% का जादुई लक्ष्य

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, किसी भी सामान की अंतिम कीमत में उसे एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का खर्च बड़ा हिस्सा होता है। भारत में यह लॉजिस्टिक्स लागत लंबे समय तक दुनिया के कई देशों के मुकाबले काफी ज्यादा रही है। ज्यादा ढुलाई खर्च किसी भी अर्थव्यवस्था पर एक छिपे हुए टैक्स की तरह असर डालता है, क्योंकि इसका बोझ आखिरकार कंपनियों और ग्राहकों दोनों को उठाना पड़ता है।

बासिज फंड सर्विस प्राइवेट लिमिटेड के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर आदित्य सेश इस आर्थिक पहलू को विस्तार से समझाते हुए कहते हैं, “भारत में लॉजिस्टिक्स लागत लंबे समय तक देश की GDP के करीब 12 से 14 फीसदी के बीच रही है, जो कई विकसित देशों की तुलना में काफी ज्यादा मानी जाती है। उनके मुताबिक, DFC इस लागत को धीरे-धीरे घटाकर 8 से 9 फीसदी तक ला सकता है। इसका फायदा सिर्फ घरेलू उद्योगों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी ज्यादा प्रतिस्पर्धी बन रहे हैं।” 

आदित्य के मुताबिक, जब माल ढुलाई की लागत घटती है, तो कंपनियों का मुनाफा बढ़ता है और नए निवेश के मौके भी बनते हैं। इसका सीधा फायदा ग्राहकों को भी मिलता है, क्योंकि सामान पहले के मुकाबले कम कीमत पर उपलब्ध मिल जाता है। यह बदलाव भारत के औद्योगिक ढांचे को तेजी से बदल रहा है और पूरे देश में कार्गो मूवमेंट को नई रफ्तार और वैश्विक स्तर की ताकत दे रहा है।

वित्त वर्ष (Financial Year) कुल माल ढुलाई (मिलियन टन में)
2016-17 1,109 MT
2017-18 1,162 MT
2018-19 1,221 MT
2019-20 1,208 MT
2020-21 1,233 MT
2021-22 1,418 MT
2022-23 1,512 MT
2023-24 1,589 MT
2024-25 1,617 MT 
2025-26 1,670 MT

सोर्स: रेल मंत्रालय

औद्योगिक मानचित्र का पुनर्गठन और लैंडलॉक्ड राज्यों का उत्थान

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पहले आम धारणा यह थी कि जिन राज्यों के पास समुद्री बंदरगाह हैं, उनके लिए व्यापार करना ज्यादा आसान होता है। लेकिन डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर ने उत्तर और मध्य भारत के उन राज्यों की तस्वीर बदल दी है, जिनके पास अपना कोई पोर्ट नहीं है। अब उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पंजाब और हरियाणा के औद्योगिक क्षेत्र गुजरात और महाराष्ट्र के बंदरगाहों से तेज रफ्तार रेल नेटवर्क के जरिए सीधे जुड़ गए हैं।

भाविक वोरा कहते हैं, “इसका सबसे ज्यादा फायदा उन क्षेत्रों में दिख रहा है जहां लॉजिस्टिक्स की कैपेसिटी सीधे लागत को प्रभावित करती है। पश्चिमी कॉरिडोर के जरिए गुजरात और महाराष्ट्र, जबकि पूर्वी कॉरिडोर के माध्यम से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में स्टील, सीमेंट, ऊर्जा और निर्यात आधारित मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बड़ा फायदा मिला है।”

भाविक के मुताबिक, अब खनिज संपन्न राज्यों से कच्चा माल पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से उत्तर भारत की फैक्टरियों तक पहुंच रहा है। वहीं फैक्ट्रियों में तैयार हुआ सामान भी बिना बड़ी तकनीकी या मानवीय देरी के सीधे बंदरगाहों तक भेजा जा रहा है। इसका असर यह हुआ है कि देश के अंदरूनी इलाकों में भी उद्योगों की गतिविधियां बढ़ी हैं और आर्थिक विकास की रफ्तार तेज हुई है।

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किन राज्यों को मिलेगा फायदा और कैसे?

भाविक बताते हैं कि इसका सबसे ज्यादा फायदा उन सेक्टर्स में दिख रहा है जहां लॉजिस्टिक्स की बेहतर व्यवस्था सीधे लागत को कम करती है। पश्चिमी कॉरिडोर के जरिए गुजरात और महाराष्ट्र, जबकि पूर्वी कॉरिडोर के माध्यम से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में स्टील, सीमेंट, ऊर्जा और एक्सपोर्ट आधारित मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बड़ा लाभ मिल रहा है। 

इसके अलावा खनिज संपन्न राज्यों से कच्चा माल अब तेजी से उत्तर भारत की फैक्टरियों तक पहुंच रहा है, जबकि वहां तैयार सामान बिना बड़ी तकनीकी या मानवीय देरी के सीधे बंदरगाहों तक भेजा जा रहा है। इससे देश के अंदरूनी इलाकों में भी उद्योगों और आर्थिक गतिविधियों को नई रफ्तार मिली है।

SMEs और छोटे व्यापारियों के लिए खुली नई संभावनाएं

लंबे समय तक भारतीय रेलवे को मुख्य रूप से कोयला, अनाज और लोहे जैसे भारी या थोक माल की ढुलाई के लिए ही बेहतर माना जाता था। छोटे कारोबारियों के लिए रेल के जरिए सामान भेजना काफी कठिन और मुश्किल प्रक्रिया होती थी। लेकिन DFC की बढ़ती फ्रीक्वेंसी और बेहतर नेटवर्क ने अब छोटे और मध्यम उद्यमों यानी SMEs के लिए भी नए मौके खोल दिए हैं।

कविता सुरेश के मुताबिक, DFC ने ‘पार्ट-लोड मूवमेंट’ को आसान बना दिया है। अब छोटे व्यापारी भी कम मात्रा में अपना सामान सुरक्षित और तेज रफ्तार से देश के किसी भी हिस्से में भेज पा रहे हैं।

इसका बड़ा फायदा उन उत्पादों को भी मिला है जो जल्दी खराब हो जाते हैं, जैसे ताजे फल, सब्जियां और डेयरी प्रोडक्ट्स। इन सामानों के लिए समय पर डिलीवरी बेहद जरूरी होती है, क्योंकि थोड़ी सी देरी भी गुणवत्ता खराब होने और आर्थिक नुकसान की वजह बन सकती है। 

DFC की मदद से अब ऐसे उत्पाद समय रहते बड़े बाजारों तक पहुंच रहे हैं, जिससे किसानों और छोटे कारोबारियों को उनकी उपज का बेहतर दाम मिल पा रहा है।

यात्री ट्रेनों को मिली राहत: रेलवे की दोहरी जीत

रेलवे की इस नई क्षमता का बड़ा फायदा उन करोड़ों लोगों को भी मिला है जो रोज यात्री ट्रेनों से सफर करते हैं। पहले मालगाड़ियों और पैसेंजर ट्रेनों के एक ही ट्रैक पर चलने से अक्सर जाम जैसी स्थिति बन जाती थी और ट्रेनों में देरी आम बात थी।

आदित्य बताते हैं, “जब माल ढुलाई का बड़ा हिस्सा समर्पित फ्रेट कॉरिडोर पर शिफ्ट हुआ, तो सामान्य रेलवे ट्रैकों पर काफी जगह खाली हो गई। इसका फायदा यह हुआ कि भारतीय रेलवे अब ज्यादा यात्री ट्रेनें चला पा रही है, उनकी समयबद्धता बेहतर हुई है और पूरे ऑपरेशन की दक्षता भी बढ़ी है। आज प्रमुख रेल मार्गों पर ट्रेनों की देरी में जो बड़ी कमी देखने को मिल रही है, उसके पीछे यही रणनीतिक बदलाव अहम वजह है।”

आदित्य कहते हैं कि अब सुपरफास्ट और एक्सप्रेस ट्रेनों को भारी मालगाड़ियों के गुजरने का इंतजार नहीं करना पड़ता। इससे आम लोगों का सफर पहले के मुकाबले ज्यादा तेज, आसान और सुरक्षित हुआ है। रेलवे के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हो रहा है कि मालगाड़ियां और यात्री ट्रेनें बिना एक-दूसरे की रफ्तार रोके अपने तय समय पर लगातार आगे बढ़ रही हैं।

सड़क से रेल की ओर शिफ्ट: ईंधन बचत और पर्यावरण संरक्षण

सड़क परिवहन पर भारत की जरूरत से ज्यादा निर्भरता लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रही है। यह तरीका सिर्फ महंगा ही नहीं पड़ता, बल्कि पर्यावरण पर भी इसका गंभीर असर होता है।

आदित्य शेष का तर्क है कि DFC ने सड़कों पर भारी ट्रकों का दबाव काफी हद तक कम कर दिया है। अब लंबी दूरी का बड़ा हिस्सा ट्रकों की बजाय रेल के जरिए पहुंचाया जा रहा है। इससे हाईवे पर भीड़ घटी है, सड़क हादसों में कमी आई है और ईंधन पर होने वाला खर्च भी अरबों रुपये तक बच रहा है।

वो कहते हैं, “इस बदलाव का असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी पड़ रहा है, क्योंकि कच्चे तेल के आयात की जरूरत धीरे-धीरे कम हो रही है। साल 2026 के ताजा आंकड़े दिखाते हैं कि रेल परिवहन की ओर बढ़ते रुझान से ट्रांसपोर्ट सेक्टर के कार्बन उत्सर्जन में भी बड़ी कमी आई है। एक मालगाड़ी अकेले सड़क पर चलने वाले करीब 70 से 80 बड़े ट्रकों जितना सामान ढो सकती है। इससे प्रदूषण कम होता है, सड़कों पर दबाव घटता है और बार-बार मरम्मत व रखरखाव पर होने वाला सरकारी खर्च भी काफी बच जाता है।”

भविष्य की राह: मल्टीमॉडल हब्स और आर्थिक आत्मनिर्भरता

एक्सपर्ट्स का मानना है कि DFC की सफलता ने भारत के लिए भविष्य की कई नई और आधुनिक संभावनाओं के रास्ते खोल दिए हैं। उनके अनुसार, अब असली मौका इस मॉडल को देश के दूसरे प्रस्तावित फ्रेट कॉरिडोर के साथ जोड़ने और उन्हें मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क्स से एकीकृत करने में है। 

बोरा कहते हैं  कि जब यह पूरा नेटवर्क आपस में बेहतर तरीके से जुड़ जाएगा और साथ ही हवाई अड्डों, बंदरगाहों और दूसरे ट्रांसपोर्ट सिस्टम्स से डिजिटल रूप से कनेक्ट हो जाएगा, तब भारत का लॉजिस्टिक्स और परिवहन तंत्र पूरी तरह बदल सकता है। इससे सामान की आवाजाही पहले से कहीं ज्यादा तेज, आसान और कम लागत वाली हो जाएगी। उनका मानना है कि आने वाले समय में यह नेटवर्क भारत को दुनिया के सबसे आधुनिक, तेज और कुशल ट्रांसपोर्ट सिस्टम वाले देशों की कतार में खड़ा कर सकता है। 

कविता सुरेश का कहना है कि ये फ्रेट कॉरिडोर अब सिर्फ माल ढुलाई तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारत में विदेशी निवेश आकर्षित करने का मजबूत आधार भी बन रहे हैं। उनका मानना है कि तेज और भरोसेमंद लॉजिस्टिक्स नेटवर्क की वजह से भारत अब वैश्विक कंपनियों के लिए ज्यादा आकर्षक बनता जा रहा है। साल 2026 में भारत का लॉजिस्टिक्स ढांचा इस बात का उदाहरण बन चुका है कि सही नीति और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर किस तरह अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार दे सकते हैं। अब देश के अलग-अलग हिस्से व्यापारिक रूप से पहले से ज्यादा करीब आ गए हैं और एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह बदलाव आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक तस्वीर बदल सकता है।

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First Published - May 8, 2026 | 6:52 PM IST

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