India Economy: भारत की अर्थव्यवस्था इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां हर दिशा से दबाव बढ़ता दिख रहा है। एक तरफ पश्चिम एशिया के युद्ध का असर है, दूसरी तरफ कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और तीसरी तरफ धीमी पड़ती ग्रोथ। ऐसे में एक्सपर्ट्स संकेत दे रहे हैं कि महंगा तेल, कमजोर रुपया और वैश्विक अनिश्चितता आने वाले समय में अर्थव्यवस्था और नीतिगत फैसलों दोनों को प्रभावित कर सकते हैं। सवाल बड़ा है, क्या आने वाले समय में भारत की रफ्तार सच में थमने वाली है या यह सिर्फ एक अस्थायी झटका है?
ताजा अनुमान चिंता बढ़ाने वाले हैं। गोल्डमैन सैक्स के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 में भारत की जीडीपी ग्रोथ 7 प्रतिशत से गिरकर करीब 5.9 प्रतिशत तक आ सकती है। यानी जो अर्थव्यवस्था अब तक तेजी से आगे बढ़ रही थी, उसकी चाल धीमी पड़ने का खतरा साफ दिख रहा है। इसकी वजह सिर्फ एक नहीं है। भू-राजनीतिक तनाव, महंगा होता तेल और कमजोर पड़ती मांग, तीनों मिलकर ग्रोथ पर दबाव बना रहे हैं।
ग्रोथ की चिंता के बीच महंगाई भी धीरे-धीरे बढ़ रही है। फरवरी में उपभोक्ता महंगाई दर बढ़कर 3.21 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो जनवरी में 2.75 प्रतिशत थी। यह लगातार चौथा महीना है जब महंगाई में बढ़ोतरी हुई है। खास बात यह है कि खाने-पीने की चीजों की महंगाई और तेजी से बढ़ी है, जो 3.47 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ रहा है। हालांकि यह अभी भी RBI के तय दायरे में है, लेकिन बढ़ता ट्रेंड एक चेतावनी जरूर दे रहा है।
Trezix के सीईओ और को-फाउंडर हरेश कैलकट्टावाला के मुताबिक भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा तेल की कीमतें हैं। देश अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत तेल आयात करता है, इसलिए कीमत बढ़ते ही असर सीधा अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। उनका कहना है कि हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से चालू खाता घाटा GDP का 0.3 से 0.4 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। इसका असर रुपये पर दबाव और महंगाई के रूप में सामने आता है। यानी तेल की कीमतें सिर्फ एक सेक्टर नहीं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती हैं।
कैलकट्टावाला का मानना है कि बढ़ती लागत भारत के निर्यात के लिए भी चुनौती बन सकती है। खासकर टेक्सटाइल और केमिकल जैसे सेक्टर, जहां कीमतों की प्रतिस्पर्धा अहम होती है, वहां भारत पीछे रह सकता है। इसके साथ ही अगर वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ती है और बड़े देश ब्याज दरें बढ़ाते हैं, तो दुनिया भर में मांग घट सकती है, जिसका सीधा असर भारत के निर्यात पर पड़ेगा।
China+1 रणनीति के तहत कंपनियां चीन से बाहर निकलकर नए देशों की तलाश कर रही हैं और भारत को इसका फायदा मिल रहा है। लेकिन हरेश कैलकट्टावाला चेतावनी देते हैं कि यह मौका हमेशा नहीं रहेगा। वियतनाम और मेक्सिको जैसे देश तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर और नियमों की जटिलता इसकी रफ्तार को धीमा कर सकती है। अगर सुधार जल्दी नहीं हुआ, तो यह मौका हाथ से निकल सकता है।
इस स्थिति में सरकार के लिए चुनौतियां भी हैं और मौके भी। कैलकट्टावाला का मानना है कि इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट की रफ्तार को और तेज करना होगा। साथ ही निर्यात प्रक्रिया को आसान बनाना, नए व्यापार समझौते करना और स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान देना जरूरी है। भारत के पास ग्लोबल ट्रांसशिपमेंट हब बनने का भी मौका है, खासकर दक्षिणी कॉरिडोर में, जिसे सही रणनीति से भुनाया जा सकता है।
दूसरी तरफ IndiaBonds के को-फाउंडर विशाल गोयनका एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहे हैं। उनका कहना है कि रुपया तेजी से कमजोर हो रहा है और इसके पीछे तेल की कीमतें और वैश्विक तनाव बड़ी वजह हैं। विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है। ऐसे में अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या RBI ब्याज दर बढ़ाने का चौंकाने वाला कदम उठा सकता है।
गोयनका 2013 की स्थिति का उदाहरण देते हैं, जब रुपये को संभालने के लिए RBI को अचानक सख्त कदम उठाने पड़े थे। उनका मानना है कि अगर हालात ऐसे ही बने रहते हैं, तो RBI फिर से उसी तरह का कदम उठा सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो कर्ज महंगा होगा, बाजार पर दबाव आएगा और निवेशकों की रणनीति बदल सकती है।
पूरी तस्वीर एक साफ चेतावनी दे रही है। ग्रोथ की रफ्तार धीमी पड़ सकती है, महंगाई बढ़ सकती है और तेल की कीमतें पूरे खेल को बदल सकती हैं। भारत के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखने की है। एक तरफ विकास को बचाना है, दूसरी तरफ महंगाई और रुपये को संभालना है। आने वाले दिनों में लिए गए फैसले ही तय करेंगे कि यह दबाव अस्थायी है या किसी बड़े बदलाव की शुरुआत।