वित्त वर्ष 2027 के दौरान भारत की उर्वरक सब्सिडी 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने सोमवार को कहा कि पश्चिम एशिया संकट के कारण बढ़ती लागत को देखते हुए यह अनुमान है।
उर्वरक विभाग में संयुक्त सचिव कृष्णकांत पाठक ने कहा, ‘मौजूदा स्थिति यह है कि हमने पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय और विभिन्न कंपनियों के साथ तालमेल और सऊदी अरब, ओमान, अर्जेंटीना और ऑस्ट्रेलिया आदि के साथ दीर्घकालिक समझौतों के माध्यम से 200 लाख टन से अधिक उर्वरकों का पर्याप्त स्टॉक बनाया है।’
पाठक ने इक्रियर द्वारा आयोजित ‘बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिमों के बीच भारत की उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला और मांग प्रबंधन को जोखिम-मुक्त करना’ नामक एक गोलमेज चर्चा को संबोधित करते हुए कहा, ‘लेकिन, इसकी एक कीमत है। युद्ध से पहले जो सब्सिडी लगभग 2 लाख करोड़ रुपये थी, मुझे लगता है कि युद्ध के कारण इसमें काफी वृद्धि होगी। यह हम पर बोझ होगा। हालांकि अभी इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता है, लेकिन यदि समस्या बनी रहती है, तो उर्वरक सब्सिडी 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है।’
यदि यह अनुमान मूर्त रूप लेत है तो वित्त वर्ष 2027 में उर्वरक सब्सिडी अब तक की सबसे अधिक हो सकती है। यह वित्त वर्ष 2023 में 2.51 लाख करोड़ रुपये सब्सिडी के रिकॉर्ड को पार कर जाएगी और वित्त वर्ष 2027 के बजट अनुमान का करीब दोगुना हो जाएगी। पाठक ने कहा कि समस्या के समाधान के लिए हम विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।
पाठक ने कहा, ‘भारत में करीब 700 लाख टन उर्वरकों का इस्तेमाल होता है, जिसमें से अधिकांश नाइट्रोजन है। हम सालाना लगभग 100 लाख टन डीएपी, 150 लाख टन एनपीकेएस और लगभग 400 लाख टन यूरिया की खपत करते हैं। लेकिन यूरिया की कुछ चुनौतियां हैं, जिसका मिट्टी में अवशोषण करीब 30 प्रतिशत ही है।’
उन्होंने कहा कि मिट्टी में इसके अवशोषण का प्रतिशत बढ़ाने के लिए कुछ तकनीकों को अपनाया जा सकता है। पाठक ने कहा, ‘हमने नैनो यूरिया और नीम लेपित यूरिया के इस्तेमाल की कवायद की, लेकिन यह ज्यादा सफल नहीं हुआ। हम उससे सीख सकते हैं और जिंक-कोटेड यूरिया या सल्फर-कोटेड यूरिया जैसी अन्य उन्नत तकनीक अपना सकते हैं।’
उन्होंने कहा कि भारत फसलों का तेजी से विविधीकरण कर सकता है, जिससे दलहन फसलों का उत्पादन अधिक हो और साथ ही रागी और तिन जैसे स्वदेशी फसलों को बढ़ावा दे सकता है। उन्होंने यूरिया के स्थान पर अमोनियम सल्फेट के उपयोग की भी वकालत की, जिसकी मिट्टी में यूरिया की तुलना में बेहतर अवशोषण दर (लगभग 70 प्रतिशत) है।