India-New Zealand FTA: भारत और न्यूजीलैंड के बीच 27 अप्रैल को हुआ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) सिर्फ एक और डील नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक व्यापार माहौल में एक अहम रणनीतिक कदम माना जा रहा है। दोनों देशों ने मार्च 2025 में FTA के लिए बातचीत शुरू की और दिसंबर 2025 तक इसे अंतिम रूप दे दिया यानी एक साल से भी कम समय में यह डील पूरी हो गई, जो भारत की सबसे तेज व्यापार वार्ताओं में शामिल है। साल के अंत तक लागू होने वाला यह समझौता भारत के लिए नए अवसर लेकर आ सकता है। इसके तहत भारतीय निर्यातकों को न्यूजीलैंड में 100% शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच मिलेगी। साथ ही, अगले 15 वर्षों में 20 अरब डॉलर के FDI का रास्ता खुलेगा और श्रमिकों की आवाजाही भी आसान होगी, जिससे सर्विस सेक्टर को फायदा मिल सकता है। रूबिक्स डेटा साइंसेज के एक एनालिसिस के मुताबिक, यह समझौता ऐसे समय में आया है जब द्विपक्षीय व्यापार में मजबूत वृद्धि तो दिखी है, लेकिन हाल के समय में इसमें कुछ धीमापन भी देखने को मिला है।
रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वस्तु व्यापार FY25 में 1 अरब डॉलर के स्तर को पार कर गया, जो आर्थिक सहयोग में लगातार बढ़ोतरी को दर्शाता है। हालांकि, FY26 में यह रफ्तार कुछ धीमी पड़ गई और अप्रैल-फरवरी के दौरान कुल वस्तु व्यापार घटकर 1.06 अरब डॉलर रह गया, जो एक मजबूत साल के बाद ठहराव का संकेत देता है।
इस समझौते से व्यापार में ज्यादा स्थिरता आएगी और भविष्य का अंदाजा लगाना आसान होगा। साथ ही, यह लंबे समय में विकास के लिए मजबूत आधार तैयार करेगा।
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भारत से न्यूजीलैंड को होने वाला वस्तु निर्यात (goods exports) वित्त वर्ष 2022 से 2025 के बीच 13% की CAGR से बढ़ा और 488 मिलियन डॉलर से बढ़कर 711 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया। हालांकि, वित्त वर्ष 2026 (अप्रैल-फरवरी) में इसमें कुछ गिरावट देखी गई और निर्यात घटकर 524 मिलियन डॉलर रह गया, जो पिछले साल के मजबूत प्रदर्शन के बाद मांग के सामान्य होने का संकेत है।
दूसरी ओर, न्यूजीलैंड से भारत के आयात वित्त वर्ष 2022 से 2025 के बीच 16% CAGR से बढ़े, लेकिन वित्त वर्ष 2026 में इनमें भी हल्की नरमी आई। इन दोनों रुझानों के चलते भारत का वस्तु व्यापार अधिशेष (ट्रेड सरप्लस) काफी कम हो गया, जो वित्त वर्ष 2024 में 203 मिलियन डॉलर से घटकर वित्त वर्ष 2026 (अप्रैल-फरवरी) में 9.4 मिलियन डॉलर रह गया।
ये बदलाव इस बात की ओर इशारा करते हैं कि व्यापारिक संबंध बढ़ तो रहे हैं, लेकिन साथ ही बदलती मांग और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल भी रहे हैं।
यह मुक्त व्यापार समझौता (FTA) वस्तुओं, सेवाओं और निवेश के क्षेत्र में व्यापक टैरिफ में कमी और बेहतर बाजार पहुंच प्रदान करता है।
न्यूजीलैंड सभी 8,284 टैरिफ लाइनों पर शुल्क खत्म करेगा, जिससे भारतीय निर्यातकों को शुरुआत से ही 100% ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिलेगा। इससे टेक्सटाइल, परिधान, लेदर और फुटवियर जैसे सेक्टर्स की प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, वहीं इंजीनियरिंग गुड्स, ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और केमिकल्स के क्षेत्र में भी ग्रोथ को समर्थन मिलेगा।
कृषि क्षेत्र को भी फायदा होने की उम्मीद है। फलों, सब्जियों, मसालों, अनाज और प्रोसेस्ड फूड जैसे उत्पादों को बेहतर बाजार पहुंच मिलेगी। साथ ही, उत्पादकता बढ़ाने और किसानों को ग्लोबल वैल्यू चेन से जोड़ने के लिए सहयोगात्मक पहल भी की जाएंगी।
सेवाओं के क्षेत्र में न्यूजीलैंड ने 118 सेक्टरों में प्रतिबद्धताएं दी हैं। इसके साथ ही स्वास्थ्य, पारंपरिक चिकित्सा, पर्यटन और ऑडियो-विजुअल इंडस्ट्री जैसे क्षेत्रों में तकनीकी सहयोग को भी बढ़ाया जाएगा।
यह समझौता निवेश और लोगों की आवाजाही (मोबिलिटी) को भी मजबूत करता है। इसके तहत 20 अरब डॉलर के लॉन्ग टर्म निवेश की प्रतिबद्धता दी गई है और छात्रों व कुशल पेशेवरों के लिए नए अवसर और रास्ते खोले गए हैं।
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द्विपक्षीय व्यापार की संरचना में धीरे-धीरे बदलाव देखने को मिल रहा है। भारत से न्यूजीलैंड को होने वाला निर्यात अब ज्यादा वैल्यू-ड्रिवन सेक्टर्स पर फोक्स्ड होता जा रहा है। फार्मास्यूटिकल प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी बढ़ी है। वहीं, पैसेंजर व्हीकल्स और रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का महत्व भी बढ़ा है, जो उच्च मूल्य और रणनीतिक रूप से प्रतिस्पर्धी कैटेगरी की ओर बढ़ते रुझान को दर्शाता है।
दूसरी ओर, आयात के मामले में मुख्य कच्चे माल पर निर्भरता बढ़ रही है। लकड़ी के लट्ठों (वुड लॉग्स) और फेरस स्क्रैप की हिस्सेदारी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। साथ ही, एल्युमिनियम स्क्रैप और कोयले के आयात में भी इजाफा हुआ है। यह निर्माण, रीसाइक्लिंग और औद्योगिक ऊर्जा जरूरतों से जुड़ी मांग को दर्शाता है।
यह बदलता ट्रेट स्ट्रक्चक इस बात का संकेत है कि दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच औद्योगिक जरूरतों और सप्लाई चेन के स्तर पर तालमेल और गहरा हो रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया कि यह समझौता केवल तत्काल व्यापारिक लाभों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे आगे भी इसका महत्व है। ओशिनिया क्षेत्र में न्यूजीलैंड की रणनीतिक स्थिति और वहां भारतीय मूल की बड़ी आबादी के कारण लोगों के बीच संबंध, भारत को पूरे पैसिफिक क्षेत्र में अपनी भागीदारी बढ़ाने का अवसर प्रदान करते हैं।