कच्चे कपास की सभी किस्सों पर 11 प्रतिशत के आयात शुल्क को हटाने के लिए तैयारियां पूरी होती नजर आ रही हैं। सूत्रों का कहना है कि सरकार के सभी संबंधित मंत्रालय धीरे-धीरे चार महीने की अवधि 1 जुलाई, 2026 से 31 अक्टूबर, 2026 तक शुल्क को अस्थायी रूप से हटाने की ओर प्रयासरत हैं।
कुछ अधिकारियों के अनुसार कृषि मंत्रालय सहित सरकार के एक वर्ग की सोच यह है कि कपास के सुस्त कारोबार के दौर में सीमित समय के लिए आयात शुल्क हटाने से किसानों पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ेगा और उनके हितों की रक्षा की जाएगी। अभी भारत कपास पर लगभग 11 प्रतिशत का शुल्क लगाता है। यह शुल्क 1 जनवरी 2026 से लागू हुआ है, जब छूट अवधि समाप्त हो गई थी। हालांकि अभी भी लंबे रेशे वाले कपास (लॉन्ग स्टेपल कॉटन) या ईएलएसएस कॉटन पर आयात शुल्क शून्य है। भारत लॉन्ग स्टेपल कॉटन का प्रमुख उत्पादक नहीं है।
टेक्सटाइल क्षेत्र इस आयात शुल्क को हटाने की वकालत कर रहा है। उसका कहना है कि इससे क्षेत्र को तत्काल राहत मिलेगी और साथ ही वैश्विक बाजारों में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता तय होगी। प्रमुख टेक्सटाइल उद्योग संघों ने सरकार से घरेलू कपास की कम पैदावार और पश्चिम एशिया संकट के कारण घरेलू कपास की कीमतों में आई उछाल के मद्देनजर आयात शुल्क को फिलहाल समाप्त करने का अनुरोध किया था। इस क्रम में तमिलनाडु के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आयात शुल्क को रद्द करने का आग्रह किया है ताकि नौकरियों के नुकसान को रोका जा सके और घरेलू वस्त्र उद्योग की रक्षा की जा सके। तमिलनाडु देश के सबसे बड़े वस्त्र उद्योगों में से एक है।
टेक्सटाइल क्षेत्र का मानना है कि कच्चे कपास पर मौजूदा शुल्क संरचना से उत्पादन लागत में वृद्धि होगी। इससे घरेलू वस्त्र उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और निर्यात प्रतिबद्धताओं पर असर पड़ेगा।
इसके अलावा, मिश्रित फाइबर की ओर झुकाव का भी सवाल है। कारण यह है कि सिंथेटिक फाइबर के लिए कच्चे माल पर शुल्क छूट मिलती है जबकि कच्चे कपास पर शुल्क लागू रहता है। इससे मिश्रित फाइबर की ओर आर्थिक से अलाभकारी बदलाव हो सकता है।
कपास व्यापार के वर्ग का तर्क है कि विभिन्न मंचों पर भारतीय वस्त्रों की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता उच्च शुल्क के कारण बाधित होने का तर्क गलत है। उनकी दलील है कि जो लोग निर्यात करना चाहते हैं, वे एडवांस लाइसेंस स्कीम (एएलएस) के तहत शून्य शुल्क पर आयात कर सकते हैं।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यदि इस समय शुल्क-मुक्त कपास आयात की अनुमति दी जाती है तो इससे डॉलर का विदेशी की ओर प्रवाह हो सकता है। दरअसल पिछली बार जब भारत ने कपास पर आयात शुल्क कम किया था तो कुल बहिर्वाह लगभग 1.1-1.2 अरब डॉलर था और कर से छूट की राशि भी महत्त्वपूर्ण थी।
इसी वर्ग का मानना है कि खरीफ बोआई के मौसम से ठीक पहले किसानों के हितों के लिए इस समय शुल्क में कटौती हानिकारक हो सकती है। यह उन किसानों के लिए भी नुकसानदायक हो सकती है जो बेहतर कीमतों की उम्मीद में अपने उत्पाद को रोके हुए हैं। अनुमान है कि करीब 40 लाख गांठ (1 गांठ = 170 किलोग्राम) रुकी हुई हैं।