भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और केंद्र सरकार ने पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के बीच विदेशी पूंजी प्रवाह को आकर्षित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। इन उपायों से देश में 50 अरब डॉलर तक की विदेशी पूंजी आ सकती है जो 2026-27 में भारत के अनुमानित भुगतान संतुलन के अंतर को काफी हद तक पाट सकती है।
सरकार ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) को सरकारी प्रतिभूतियों पर ब्याज आय और पूंजीगत लाभ पर आयकर से छूट देने की घोषणा की है। यह छूट इस साल 1 अप्रैल से प्रभावी हो गई है। इसका उद्देश्य सरकारी प्रतिभूति बाजार को व्यापक बनाना और विदेशी पूंजी को आकर्षित करना है।
इसके पहले विदेशी संस्थागत निवेशकों को, जिनमें भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के पास पंजीकृत विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भी शामिल हैं, आयकर अधिनियम, 2025 के तहत प्रतिभूतियों पर 20 फीसदी, अल्पावधि पूंजीगत लाभ पर 30 फीसदी और दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ पर 12.5 फीसदी की दर से कर देना होता था।
केंद्रीय बैंक ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा जारी किए जाने वाले बाह्य वाणिज्यिक उधारी को प्रोत्साहित करने के लिए रियायती विदेशी मुद्रा अदला-बदली और बैंकों द्वारा 3 से 5 साल की खुदरा विदेशी मुद्रा सावधि जमा को आकर्षित करने के लिए एक योजना की घोषणा की है।
आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने उपायों की घोषणा करते हुए कहा, ‘ये उपाय हमारे भुगतान संतुलन को मजबूत करेंगे वहीं हम निर्यात को और बढ़ावा देने तथा पूंजी प्रवाह को आकर्षित करने के लिए उचित नीतिगत समायोजन करना जारी रखेंगे।’
आरबीआई ने 15 वर्षीय, 30 वर्षीय और 40 वर्षीय सरकारी बॉन्डों के सभी नए निर्गमों को शामिल करने के लिए एफएआर प्रतिभूतियों के दायरे का भी विस्तार करने का निर्णय लिया है। साथ ही, सामान्य मार्ग के तहत एफपीआई निवेश के लिए अल्पावधि निवेश और व्यक्तिगत प्रतिभूतियों पर लगी सीमाओं को हटा दिया जाएगा।
मल्होत्रा ने कहा, ‘ये उपाय सरकार द्वारा आज सुबह घोषित कर लाभों के साथ, सरकारी उधार के लिए विदेशी पूंजी को आकर्षित करने में मदद करेंगे।’
विनिमय दर पर पड़ रहे दबाव के बीच विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए इन कदमों की घोषणा की गई है। पश्चिम एशिया संघर्ष के बाद से होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के बाद अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आने से भारत की बाह्य स्थिति पर व्यापक असर पड़ रहा था।
एचडीएफसी बैंक की प्रधान अर्थशास्त्री साक्षी गुप्ता ने कहा कि इन उपायों का संयुक्त प्रभाव वित्त वर्ष 2027 के लिए अनुमानित 40 से 50 अरब डॉलर के भुगतान संतुलन अंतर को पाटने में मदद कर सकता है। यह अनुमान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2.1 फीसदी चालू खाता घाटे और 90 डॉलर प्रति बैरल कच्चे तेल की औसत कीमत पर आधारित है।
गुप्ता ने कहा, ‘घोषित अलग-अलग उपायों के कारण पूंजी प्रवाह की सटीक मात्रा का अनुमान लगाना मुश्किल है लेकिन कुल प्रभाव निश्चित रूप से वित्त वर्ष 2027 के लिए 40 से 50 अरब डॉलर के भुगतान संतुलन अंतर को पाटने में मदद कर सकता है।’
येस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री इंद्रनील पान ने कहा, ‘पूंजी प्रवाह की प्रकृति को सटीक रूप से बताना मुश्किल है मगर 35 से 45 अरब डॉलर का अनुमान उचित हो सकता है जो चालू वित्त वर्ष के लिए अनुमानित भुगतान संतुलन के अंतर को लगभग पूरा करने के लिए पर्याप्त है।’
विशेषज्ञों का कहना है कि जब इसी तरह के उपाय एक दशक से भी अधिक समय पहले पेश किए गए थे, तब 2013-14 के दौरान संचयी बाह्य वाणिज्यिक उधारी प्रवाह 12 अरब डॉलर था, जबकि एफसीएनआर (बी) जमा राशि 26.6 अरब डॉलर थी।
विशेषज्ञों ने कहा कि यदि वैश्विक परिस्थितियां स्थिर होती हैं, विशेष रूप से पश्चिम एशिया में तनाव कम होने के साथ तो संचयी पूंजी प्रवाह का प्रभाव और भी अधिक हो सकता है।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि नवीनतम पैकेज 2013 की योजना से इस मायने में अलग है कि यह मुख्य रूप से एफसीएनआर (बी) जमा राशि पर निर्भर रहने के बजाय कई साधनों के माध्यम से विदेशी पूंजी को आकर्षित करने का प्रयास करता है।
आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेन गुप्ता ने कहा, ‘इन उपायों की घोषणा करके केंद्रीय बैंक ने घरेलू ब्याज-दर निर्णयों को वैश्विक नीति के साथ तालमेल बिठाने के जोखिम को कम कर दिया है।’ उन्होंने इन कदमों से 40 से 50 अरब डॉलर के प्रवाह के अनुमान से भी सहमति जताई।
उन्होंने कहा, ‘यह केंद्रीय बैंक को घरेलू परिस्थितियों के आधार पर दरें निर्धारित करने में अधिक लचीलापन देता है। यह दर में बड़ी वृद्धि के जोखिम को कम करता है क्योंकि मुद्रा के मामले में उन्होंने वह किया है जो आवश्यक था।’
एनएसडीएल डेटा के अनुसार इस महीने 3 जून तक एफपीआई डेट के 119 करोड़ रुपये के शुद्ध खरीदार थे जबकि उन्होंने इस अवधि के दौरान इक्विटी से 16,902 करोड़ रुपये की निकासी की है।