भारत में हर साल पड़ने वाली भीषण गर्मी अब सिर्फ मौसम की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था पर भी बड़ा असर डालने लगी है। लंबे और ज्यादा तेज हीटवेव की वजह से काम के घंटे कम हो रहे हैं, खेती प्रभावित हो रही है, बिजली की मांग तेजी से बढ़ रही है और लोगों का स्वास्थ्य खर्च भी बढ़ रहा है।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अगर समय रहते उपाय नहीं किए गए तो 2030 तक भारत की जीडीपी का करीब 4.5 प्रतिशत हिस्सा गर्मी से होने वाले नुकसान की वजह से प्रभावित हो सकता है। इसका सबसे ज्यादा असर खेती, निर्माण और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों पर पड़ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी ILO की रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ती गर्मी की वजह से दुनिया भर में 2030 तक 8 करोड़ फुल टाइम नौकरियों के बराबर उत्पादकता का नुकसान हो सकता है। भारत में अकेले लगभग 3.4 करोड़ नौकरियों पर असर पड़ने का अनुमान है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 2030 तक गर्मी की वजह से कुल कामकाजी घंटों का करीब 5.8 प्रतिशत हिस्सा खत्म हो सकता है। इसका कारण यह है कि देश में बड़ी संख्या में लोग खुले में या बिना एसी वाली जगहों पर काम करते हैं।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी की प्रोफेसर लेखा चक्रवर्ती के मुताबिक गर्मी से होने वाले काम के नुकसान का सबसे ज्यादा असर खेती पर पड़ता है। ज्यादा तापमान की वजह से खेतों में काम करने की क्षमता घटती है, फसलें प्रभावित होती हैं और पशुओं का उत्पादन भी कम होता है।
उन्होंने कहा कि निर्माण क्षेत्र में भी अत्यधिक गर्मी के दौरान काम की रफ्तार 18 से 35 प्रतिशत तक घट जाती है। मजदूरों को बार-बार आराम लेना पड़ता है और कई बार काम रोकना पड़ता है।
भारत में ज्यादातर मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इनके पास न तो स्वास्थ्य बीमा होता है और न ही ठंडक या आराम की सुविधाएं। इसलिए इन पर गर्मी का असर ज्यादा पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर गर्मी से जुड़ी समस्याओं को नहीं रोका गया तो भारत की आर्थिक विकास दर पर गंभीर असर पड़ सकता है। विश्व बैंक की एक स्टडी के अनुसार 2030 तक हीट स्ट्रेस की वजह से भारत की जीडीपी का 4.5 प्रतिशत हिस्सा खतरे में पड़ सकता है। यह नुकसान करीब 150 से 250 अरब डॉलर तक हो सकता है।
भीषण गर्मी की वजह से देश में बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। 21 मई को भारत की पीक पावर डिमांड 270.82 गीगावॉट तक पहुंच गई, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है।
लंबी गर्मी की वजह से लोगों के बिजली बिल बढ़ रहे हैं। घरों में पंखे, कूलर और एसी का इस्तेमाल ज्यादा हो रहा है। वहीं कंपनियों का खर्च भी बढ़ रहा है क्योंकि उन्हें कूलिंग पर ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है।
ज्यादा तापमान की वजह से मिट्टी की नमी तेजी से खत्म होती है, सिंचाई की जरूरत बढ़ती है और फसलों की पैदावार घटती है। 2022 में पड़ी तेज गर्मी की वजह से गेहूं उत्पादन में करीब 10 से 15 प्रतिशत की गिरावट आई थी। इसके बाद भारत को गेहूं निर्यात पर रोक लगानी पड़ी थी ताकि देश में खाद्य सुरक्षा बनी रहे।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय पर उपाय नहीं किए गए तो खेती की उत्पादकता घट सकती है, खाद्य महंगाई बढ़ सकती है और ग्रामीण आय पर दबाव आ सकता है।
गर्मी का असर सिर्फ फसलों पर नहीं बल्कि पशुपालन और डेयरी सेक्टर पर भी पड़ रहा है। ज्यादा गर्मी की वजह से पशु कम खाना खाते हैं, दूध उत्पादन घटता है और बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। पोल्ट्री और मछली पालन पर भी इसका असर देखा जा रहा है।
लैंसेट काउंटडाउन की रिपोर्ट के मुताबिक 2023 में भारत में लोग औसतन 100 दिन तक ऐसी गर्मी के संपर्क में रहे जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक मानी जाती है। गर्मी की वजह से हीटस्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और दूसरी बीमारियों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
2025 में मार्च से जून के बीच देश में 7,000 से ज्यादा संदिग्ध हीटस्ट्रोक के मामले सामने आए और कई लोगों की मौत भी हुई। विशेषज्ञों का कहना है कि बीमारी की वजह से लोगों का मेडिकल खर्च बढ़ता है, काम के दिन खराब होते हैं और गरीब परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब सिर्फ हीटवेव अलर्ट जारी करना काफी नहीं होगा। भारत को बड़े स्तर पर तैयारी करनी होगी। इसके तहत शहरों में ज्यादा हरियाली, ठंडी छतें, काम करने की जगहों पर पानी और आराम की सुविधा, काम के समय में बदलाव और गर्मी सहने वाली फसलों को बढ़ावा देना जरूरी होगा।
साथ ही असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने की भी जरूरत बताई गई है, ताकि बढ़ती गर्मी का असर लोगों की जिंदगी और देश की अर्थव्यवस्था पर कम किया जा सके।