भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के बाहरी सदस्य सौगत भट्टाचार्य ने कहा है कि नीतिगत चूक का जोखिम बढ़ गया है और भविष्य के कदमों में सावधानी बरतने की जरूरत है। मनोजित साहा को दिए एक ईमेल साक्षात्कार के अंश…
क्या आपको लगता है कि दरों में कटौती का चक्र समाप्त हो गया है और इस स्तर से दरें केवल बढ़ सकती हैं?
यह मेरी व्यक्तिगत राय है, मौद्रिक नीति समिति की नहीं। इस समय की बढ़ी हुई अनिश्चितता को देखते हुए अनुमान लगाना या पहले से तय राह या जरूरत के मुताबिक भविष्य के लिए रीपो रेट को लेकर कार्रवाई असंभव हो गई है। आने वाले आंकड़ों की व्याख्या के आधार पर ये फैसले हर बैठक के मुताबिक लिए जाने चाहिए।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि अगर फरवरी 2026 की एमपीसी की समीक्षा के समय व्यापक आर्थिक माहौल से तुलना की जाए तो अब वृद्धि और महंगाई दर के बीच संतुलन अब प्रतिकूल रूप से बदल गया है। कम से कम निकट भविष्य के हिसाब से ऐसा नजरआ रहा है।
नीतिगत फैसले अब रिजर्व बैंक के कठोर विश्लेषणात्मक ढांचों और व्यापक सर्वे की विस्तृत श्रृंखला के आधार पर होंगे। इसमें पूर्वानुमान लगाने वाले पेशेवरों के सर्वेक्षणों व अन्य प्रतिक्रियाओं, वैश्विक केंद्रीय बैंकों के साथ कम्युनिकेशन सहित कई बाहरी हितधारकों की प्रतिक्रियाओं सहित बाहरी इनपुट भी अपनी भूमिका निभाएंगे। नीतिगत चूक का जोखिम बढ़ गया है और भविष्य के कदमों का आकलन सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए।
नीतिगत समीक्षा के ब्योरे में आपने कहा कि महंगाई दर का अनुमान बढ़ती महंगाई के जोखिम के संकेत दे रहा है, जो अधिक चिंताजनक है। क्या आपको लगता है कि पिछले 15 दिनों में स्थिति खराब हुई है?
स्वाभाविक रूप से महंगाई दर का दबाव चिंता का विषय बन गया है। यह वास्तव में महंगाई दर में कैसे तब्दील होता है और फिर उत्पाद महंगे होते हैं और आखिरकार मजदूरी और श्रम लागत पर असर पड़ता है। यह वास्तविक चिंता है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हाल में हुए विरोध प्रदर्शन में खर्च वहन करने का मसला उभरकर सामने आया है।
मौद्रिक नीति रिपोर्ट (एमपीआर) में घरेलू और उद्यमों में महंगाई दर की की अपेक्षाओं को व्यापक रूप से लिखा गया है। आईआईएम अहमदाबाद बिजनेस इन्फ्लेशन
एक्सपेक्टेशन सर्वे और पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) जैसे निजी सर्वे से भी इसे समर्थन मिलता है। सभी में अलग अलग समय सीमाओं में परिवारों और एंटरप्राइज की महंगाई दर के संकेत मिले हैं।
क्या यह मानना सही होगा कि आप वृद्धि की तुलना में महंगाई को लेकर ज्यादा चिंतित हैं?
नहीं। मैं महंगाई दर की अपेक्षाओं के बारे में ‘अधिक चिंताजनक’ का उल्लेख करता हूं, न कि महंगाई दर को लेकर। एमपीसी की भविष्यवाणियों में वृद्धि और महंगाई दर दोनों पर प्रतिकूल प्रभावों को शामिल किया गया है। हालांकि वृद्धि-महंगाई दर के संतुलन का विस्तार एक साथ नहीं है। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण आपूर्ति श्रृंखला में लंबे समय तक चलने वाले व्यवधान के अप्रत्याशित परिणाम हो सकते हैं।
रिजर्व बैंक ने पहली बार वित्त वर्ष 2027 में मुख्य महंगाई दर 4.4 प्रतिशत रहने का अनुमान जारी किया है। क्या महंगाई दर के मोर्चे पर इससे कुछ राहत मिलेगी?
मैं मुख्य महंगाई दर का पूर्वानुमान जारी करने के मौद्रिक नीति समिति के फैसले से सहमत हूं। मेरा मानना है कि अनुमानों की विस्तारित श्रृंखला होने से हितधारकों को बेहतर संचार में मदद मिलेगी, जिसमें सभी अंतर्निहित जटिलताएं शामिल होंगी।
क्या एमपीसी के फैसले में मुद्रा के अवमूल्यन के मसले पर विचार किया गया था?
रुपये का विनिमय दर मौद्रिक नीति समिति के दायरे से बाहर है। हालांकि भुगतान संतुलन की अंतर्निहित गतिशीलता, पूंजी आवंटन, प्रमुख केंद्रीय बैंकों की कार्रवाई सहित वैश्विक आर्थिक स्थितियों पर महत्त्वपूर्ण चर्चा हुई। मेरे लिए बाहरी वातावरण चिंता का विषय बना हुआ है, जैसा कि पिछली समीक्षाओं में मैं जोर देकर कहता रहा हूं।