Strait of Hormuz Crisis: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और Strait of Hormuz के आसपास बनी अनिश्चितता ने एक बार फिर दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। यह सिर्फ एक समुद्री रास्ते की कहानी नहीं है, बल्कि उस नस की कहानी है, जिससे दुनिया के तेल बाजार में जान बनी रहती है। दुनिया के करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल की सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है। इसलिए जब भी हॉर्मुज के आसपास तनाव बढ़ता है, पूरी दुनिया के बाजार में बेचैनी बढ़ जाती है। तेल की कीमतों में उछाल आता है, सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ती है और आयात पर निर्भर देशों की मुश्किलें अचानक बढ़ जाती हैं।
भारत भी ऐसे ही देशों में है, जो अपनी तेल जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। ऐसे में हॉर्मुज में तनातनी सिर्फ विदेश नीति या क्षेत्रीय संघर्ष का मुद्दा नहीं रह जाती, बल्कि यह सीधे भारत की अर्थव्यवस्था, तेल की उपलब्धता, महंगाई और आम लोगों की जेब से जुड़ जाता है। यही वजह है कि इस समय भारत की ऊर्जा सुरक्षा, तेल भंडार और रणनीतिक तैयारी पर चर्चा तेज हो गई है।
दुनिया के तेल भंडार समान रूप से बंटे नहीं हैं। कुछ ही देशों के पास बहुत बड़े भंडार हैं, जबकि बड़ी आबादी और बड़ी अर्थव्यवस्था वाले कई देशों के पास अपने संसाधन काफी सीमित हैं। वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि वेनेजुएला, सऊदी अरब और ईरान जैसे देशों के पास सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडार हैं। इनके अलावा कनाडा, इराक, यूएई, कुवैत, रूस, लीबिया और अमेरिका भी बड़े भंडार वाले देशों में शामिल हैं।
| देश | तेल भंडार (अरब बैरल में) |
|---|---|
| वेनेजुएला | 303.2 |
| सऊदी अरब | 267.2 |
| ईरान | 208.6 |
| इराक | 145 |
| संयुक्त अरब अमीरात | 113 |
| कुवैत | 101.5 |
| रूस | 80 |
| लीबिया | 48.4 |
| अमेरिका | 45 |
सोर्स: worldpopulationreview
इसका सीधा मतलब यह है कि दुनिया की तेल व्यवस्था कुछ गिने-चुने इलाकों पर टिकी हुई है। खासकर मिडिल ईस्ट का महत्व इसलिए बहुत ज्यादा है, क्योंकि वहां सिर्फ भंडार ही नहीं, बल्कि उत्पादन और निर्यात की क्षमता भी बहुत बड़ी है। दुनिया के कई बड़े आयातक देशों की ऊर्जा जरूरतें उसी क्षेत्र पर निर्भर हैं। इसलिए जब वहां तनाव बढ़ता है, तो उसका असर सीमाओं में नहीं रुकता, बल्कि पूरी दुनिया के तेल बाजार में दिखाई देता है।
भारत के पास खुद के कच्चे तेल के भंडार बहुत सीमित हैं। यही भारत की सबसे बड़ी कमजोरी भी है। देश के पास अनुमानित रूप से 4 से 5 अरब बैरल के आसपास प्रमाणित तेल भंडार हैं। इतनी बड़ी आबादी, तेजी से फैलती अर्थव्यवस्था और लगातार बढ़ती ऊर्जा जरूरतों वाले देश के लिए यह मात्रा बहुत कम मानी जाती है। यही कारण है कि भारत अपनी जरूरत का बहुत बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है।
ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा इस स्थिति को बहुत साफ शब्दों में समझाते हैं। उनका कहना है कि तेल के बड़े भंडार सरकारें नहीं बनातीं, प्रकृति बनाती है। किसी देश की जमीन या समुद्र के नीचे कितना तेल है, यह प्राकृतिक संरचना पर निर्भर करता है। भारत में गुजरात, असम, आंध्र प्रदेश, कृष्णा-गोदावरी बेसिन, बंगाल की खाड़ी और बॉम्बे हाई जैसे इलाकों में तेल और गैस के स्रोत जरूर हैं, लेकिन वे देश की कुल जरूरत के मुकाबले बहुत छोटे हैं। इसलिए भारत अपनी पूरी मांग घरेलू उत्पादन से पूरी ही नहीं कर सकता।
तनेजा के मुताबिक भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। उद्योग बढ़ रहे हैं, परिवहन बढ़ रहा है, ऊर्जा की खपत बढ़ रही है, और ऐसे में तेल की मांग भी लगातार ऊपर जा रही है। जब मांग इतनी तेज हो और घरेलू भंडार सीमित हों, तो आयात पर निर्भरता बढ़ना तय है। यही वजह है कि भारत आज अपनी कुल जरूरत का करीब 89 प्रतिशत तेल बाहर से खरीदता है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि भारत की ऊर्जा व्यवस्था की सबसे बड़ी सच्चाई है।
भारत के सामने एक स्वाभाविक सवाल यह है कि जब आयात पर निर्भरता इतनी ज्यादा है, तो क्या देश के अंदर तेल उत्पादन तेजी से नहीं बढ़ाया जा सकता? पहली नजर में यह आसान रास्ता लग सकता है, लेकिन असल तस्वीर काफी मुश्किल है।
नरेंद्र तनेजा बताते हैं कि सरकारें लगातार कोशिश करती हैं कि देश के अंदर ज्यादा से ज्यादा जगहों पर तेल और गैस की खोज हो। जहां संभावना दिखती है, वहां सर्वे होते हैं, ब्लॉक दिए जाते हैं और उत्पादन बढ़ाने की कोशिश की जाती है। लेकिन तेल उद्योग में खोज और उत्पादन का काम बहुत लंबा और महंगा होता है। खासकर जब भंडार गहरे समुद्र में हों, तब मामला और कठिन हो जाता है। पहले यह पता लगता है कि वहां तेल या गैस है, फिर उसकी मात्रा का आकलन होता है, फिर तकनीक, निवेश, पर्यावरण और ढांचे की तैयारियां होती हैं। इसके बाद जाकर उत्पादन शुरू होता है। इस पूरी प्रक्रिया में 8 से 9 साल तक लग सकते हैं।
यानी आज अगर किसी नए क्षेत्र में संभावना मिलती भी है, तो उससे देश को तुरंत राहत नहीं मिलती। इसलिए घरेलू उत्पादन बढ़ाना जरूरी जरूर है, लेकिन यह कोई तात्कालिक समाधान नहीं है। भारत को लंबे समय तक आयात पर निर्भर रहना ही पड़ेगा। यही वह सच्चाई है, जो भारत की ऊर्जा नीति को और ज्यादा जटिल बनाती है।
जब कोई देश अपनी जरूरत का इतना बड़ा हिस्सा आयात करता हो, तो उसके लिए सिर्फ रोजाना तेल खरीदना काफी नहीं होता। उसे संकट के दिनों के लिए अलग से सुरक्षा कवच भी तैयार रखना पड़ता है। इसी जरूरत से स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व यानी SPR की अहमियत सामने आती है।
भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व तैयार किए हैं। मार्च 2026 तक देश की कुल SPR क्षमता करीब 5.33 मिलियन मीट्रिक टन है, जो लगभग 39 मिलियन बैरल कच्चे तेल के बराबर है। ये भंडार विशाखापट्टनम, मंगलुरु और पादुर में बनाए गए हैं। फिलहाल इनमें लगभग 4.09 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल भरा हुआ है। अकेले यह स्ट्रैटेजिक रिजर्व भारत को लगभग 9 से 10 दिन का सुरक्षा कवर देता है।
लेकिन भारत की सुरक्षा तस्वीर सिर्फ SPR तक सीमित नहीं है। सरकारी तेल कंपनियों जैसे इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम के पास भी रिफाइनरियों, बंदरगाहों और भंडारण टैंकों में बड़ा स्टॉक रहता है। अगर इन कंपनियों के पास मौजूद स्टॉक को जोड़ दिया जाए, तो भारत के पास कुल मिलाकर लगभग 70 से 74 दिनों का तेल बफर मौजूद माना जाता है।
नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि रणनीतिक भंडार ऊर्जा सुरक्षा के लिए सबसे अहम साधनों में से एक हैं। लेकिन वे यह भी साफ करते हैं कि ऐसे भंडार बनाना बहुत महंगा काम है। पहले तो इन्हें बनाने के लिए भारी पूंजी चाहिए। उसके बाद उनमें भरने के लिए तेल खरीदना पड़ता है। फिर उस तेल को लंबे समय तक स्टोर करना भी लागत वाला काम है। यानी यह सिर्फ टैंक बनाने भर का मामला नहीं है, बल्कि बड़ी वित्तीय प्रतिबद्धता का विषय है। इसलिए विकसित देश जैसे अमेरिका, जापान, यूरोप के कई देश, कनाडा और चीन बड़े पैमाने पर ऐसे भंडार बनाए रखते हैं, क्योंकि वे इस खर्च को ऊर्जा सुरक्षा की कीमत मानते हैं।
भारत के पास 70 से 74 दिनों का कुल बफर सुनने में काफी लग सकता है, लेकिन असल सवाल यह है कि क्या यह तेजी से बढ़ती और आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए पर्याप्त है? नरेंद्र तनेजा का संकेत साफ है कि भारत को इससे बड़े सुरक्षा कवच की जरूरत है।
उनका कहना है कि अगर कोई देश भारी मात्रा में तेल आयात करता है, तो उसके लिए बड़े रणनीतिक भंडार रखना हमेशा समझदारी है। खासकर ऐसे समय में, जब स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज जैसे अहम मार्ग को लेकर अनिश्चितता बनी हो। भारत को न सिर्फ मौजूदा भंडार बनाए रखने हैं, बल्कि उन्हें आगे बढ़ाना भी है। तनेजा बताते हैं कि भारत का लक्ष्य अपने रणनीतिक भंडार को और बढ़ाकर लंबी अवधि की सुरक्षा तैयार करना है। उन्होंने इस दिशा में 90 दिनों तक का लक्ष्य महत्वपूर्ण बताया। यह काम एक दिन में नहीं होगा, क्योंकि इसमें जमीन, ढांचा, पूंजी, तेल खरीद और स्टोरेज- सब कुछ लगता है। लेकिन अगर भारत को भविष्य के संकटों से कम नुकसान उठाना है, तो इस दिशा में गंभीर निवेश करना ही होगा।
भारत करीब 40 से ज्यादा देशों से तेल खरीदता है। यह सुनने में विविधता जैसा लगता है, लेकिन असलियत यह है कि भारत का बड़ा हिस्सा अभी भी खाड़ी और मिडिल ईस्ट के देशों से आता है। इसके पीछे एक साफ आर्थिक कारण है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, यूएई जैसे देश भारत के अपेक्षाकृत करीब हैं। वहां से तेल जल्दी आता है, परिवहन लागत कम रहती है और आपूर्ति की व्यवस्था ज्यादा आसान होती है। यानी यह सिर्फ राजनीतिक नहीं, आर्थिक विकल्प भी है।
नरेंद्र तनेजा इसी बात को अर्थशास्त्र की भाषा में समझाते हैं। उनका कहना है कि तेल का व्यापार भावनाओं से नहीं, लागत और सप्लाई से चलता है। अगर कोई चीज आपके पड़ोस में सस्ती और जल्दी मिल रही है, तो आप उसे दूर से महंगा खरीदने नहीं जाएंगे। इसलिए भारत के लिए खाड़ी देशों से तेल खरीदना स्वाभाविक आर्थिक फैसला है।
लेकिन यही सुविधा संकट के समय जोखिम बन जाती है। अगर हॉर्मुज के आसपास तनाव बढ़ता है, तो सिर्फ तेल की कीमत ही नहीं बढ़ती। समुद्री जहाज का किराया बढ़ता है, बीमा महंगा हो जाता है, जोखिम प्रीमियम जुड़ जाता है और पूरी सप्लाई चेन की लागत ऊपर चली जाती है। यानी तेल अगर उपलब्ध भी रहे, तब भी वह महंगा हो सकता है। और अगर सप्लाई बाधित हुई, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल के दाम पर नहीं, बल्कि परिवहन, उद्योग, बिजली, महंगाई और आम खर्च पर भी पड़ता है।
ऐसे समय में यह सवाल उठता है कि क्या भारत के पास हॉर्मुज का कोई विकल्प है? क्या कोई पाइपलाइन, कोई दूसरा समुद्री रास्ता या कोई वैकल्पिक व्यवस्था है, जो इस जोखिम को कम कर सके?
नरेंद्र तनेजा का कहना है कि इस मामले में भारत के पास बहुत आसान विकल्प अभी मौजूद नहीं हैं। कई बार पाइपलाइन परियोजनाओं की चर्चा होती है, लेकिन वे या तो अभी व्यावहारिक नहीं हैं या फिर भू-राजनीतिक अड़चनों में फंसी हुई हैं। जैसे TAPI पाइपलाइन का नाम आता है, लेकिन वह भारत के लिए तत्काल और भरोसेमंद विकल्प नहीं है। इसलिए अभी भारत को वास्तविक विकल्पों पर काम करना होगा।
तनेजा का सुझाव है कि भारत को सिर्फ तेल खरीदने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तेल संपत्तियों में हिस्सेदारी बढ़ानी चाहिए। अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे क्षेत्रों में जहां अवसर हों, वहां तेल ब्लॉकों या कुओं में भागीदारी लेने की रणनीति अपनानी चाहिए। इससे भारत सिर्फ बाजार से खरीदार नहीं रहेगा, बल्कि सप्लाई स्रोतों में हिस्सेदार भी बनेगा। इसके साथ ही देश को अपने जहाजों की क्षमता भी बढ़ानी चाहिए, ताकि ढुलाई के मामले में पूरी तरह बाहरी कंपनियों पर निर्भरता कम हो। यह वही मॉडल है, जिसे चीन जैसे देश अपनाते रहे हैं।
भारत तेल पर निर्भरता कम करने के लिए एथनॉल ब्लेंडिंग को भी बढ़ावा दे रहा है। E10 और E20 जैसे कदम इसी दिशा का हिस्सा हैं। इसका मकसद यह है कि पेट्रोल में कुछ हिस्सा एथनॉल का मिलाकर कच्चे तेल की खपत कम की जाए। यह सुनने में अच्छा उपाय लगता है, लेकिन नरेंद्र तनेजा इस पर एक संतुलित नजरिया रखते हैं।
उनका कहना है कि एथनॉल ब्लेंडिंग एक अच्छी नीति है, लेकिन इससे भारत की पूरी तेल निर्भरता खत्म नहीं होने वाली। सबसे पहली बात यह है कि यह मुख्य रूप से पेट्रोल में लागू होती है, डीजल में नहीं। जबकि देश की कुल ईंधन खपत में डीजल की भूमिका बहुत बड़ी है। इसलिए इसका असर सीमित रहेगा। दूसरी बात, एथनॉल उत्पादन को बहुत ज्यादा बढ़ाने का असर खेती और खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। अगर बहुत बड़ा कृषि क्षेत्र ईंधन के लिए इस्तेमाल होने लगे, तो खाद्यान्न संतुलन बिगड़ने का खतरा पैदा हो सकता है। इसलिए इस नीति को संतुलन के साथ आगे बढ़ाना होगा। यह मदद जरूर करेगी, लेकिन यह अकेले भारत को आयात निर्भरता से मुक्त नहीं कर सकती।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा किसी एक फैसले से मजबूत नहीं होगी। इसके लिए कई स्तरों पर एक साथ काम करना होगा। नरेंद्र तनेजा की बातों से साफ है कि पहला काम रणनीतिक भंडार को लगातार बढ़ाना है। दूसरा, घरेलू खोज और उत्पादन के प्रयास जारी रखने हैं, भले उनका असर धीरे-धीरे आए। तीसरा, आयात के स्रोतों में ज्यादा विविधता लानी है, ताकि एक ही क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता कम हो। चौथा, विदेशों में तेल संपत्तियों में हिस्सेदारी बढ़ानी है। और पांचवां, ढुलाई और लॉजिस्टिक्स के मोर्चे पर देश की अपनी ताकत बढ़ानी है।
यानी भारत को ऊर्जा सुरक्षा को केवल तेल खरीदने के नजरिए से नहीं, बल्कि पूरी सप्लाई चेन, भंडारण, उत्पादन, निवेश और विकल्पों की रणनीति के रूप में देखना होगा। हॉर्मुज का संकट बार-बार यही याद दिलाता है कि दुनिया आज भी बहुत हद तक तेल आधारित अर्थव्यवस्था है, और जो देश समय रहते तैयारी नहीं करते, उन्हें संकट के समय ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है।