पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं। बाजार को चिंता है कि मौजूदा युद्धविराम ज्यादा समय तक टिक पाएगा या नहीं। इसी दबाव के बीच ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी है। बढ़ती वैश्विक तेल कीमतों और लगातार हो रहे नुकसान को देखते हुए यह फैसला जरूरी माना जा रहा था। हालांकि यह बढ़ोतरी फिलहाल सीमित है और इससे कंपनियों को केवल थोड़ी राहत मिलेगी। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा बना रहता है, तो आने वाले समय में ईंधन कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है।
इस बढ़ोतरी का सीधा असर खुदरा महंगाई यानी सीपीआई आधारित मुद्रास्फीति पर देखने को मिलेगा। भारत के सीपीआई बास्केट में पेट्रोल और डीजल की हिस्सेदारी 4.81 प्रतिशत है। चूंकि ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी महीने के बीच में हुई है, इसलिए मई 2026 में इसका केवल आधा असर दिखाई देगा, जबकि बाकी असर जून में दिखेगा।
अनुमान है कि इससे मई और जून 2026 की खुदरा महंगाई दर में करीब 8-8 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी हो सकती है। इसके अलावा ईंधन महंगा होने से परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ेगी, जिससे वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी असर पड़ेगा। इस अप्रत्यक्ष प्रभाव से महंगाई में करीब 10 बेसिस प्वाइंट की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है।
अप्रैल 2026 में खुदरा महंगाई दर 3.5 प्रतिशत रही, जो मार्च के 3.4 प्रतिशत से थोड़ी ज्यादा थी। अब अनुमान है कि मई 2026 में महंगाई दर बढ़कर 4.3 प्रतिशत तक पहुंच सकती है, जबकि पहले इसका अनुमान 4.1 प्रतिशत था। कुल मिलाकर पूरे साल औसत खुदरा महंगाई दर पहले के मुकाबले करीब 0.25 प्रतिशत अधिक रह सकती है।
वहीं थोक महंगाई दर (WPI) अप्रैल 2026 में बढ़कर 8.3 प्रतिशत पहुंच गई थी और मई में इसके 9 से 9.5 प्रतिशत के बीच रहने की संभावना है।
हालांकि ईंधन कीमतों में यह सीमित बढ़ोतरी आम परिवारों (हाउसहोल्ड) के बजट पर बहुत बड़ा असर नहीं डालेगी। इकरा (ICRA) के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 में भारत ने पेट्रोल पर करीब 6 लाख करोड़ रुपये और डीजल पर लगभग 10 लाख करोड़ रुपये खर्च किए। डीजल खर्च का बड़ा हिस्सा कारोबारी गतिविधियों से जुड़ा था। अगर खपत स्थिर रहती है तो कीमतों में 3 प्रतिशत बढ़ोतरी से लगभग 0.5 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी का कुछ बोझ आम परिवारों को उठाना पड़ेगा और इसके चलते वे अपने खर्चों में बदलाव कर सकते हैं। हालांकि फिलहाल असर सीमित रहने की उम्मीद है, लेकिन अगर पेट्रोल-डीजल के दाम आगे भी बढ़ते हैं तो लोगों के गैर-जरूरी खर्चों में कटौती देखने को मिल सकती है। इसका सबसे ज्यादा असर मनोरंजन, यात्रा और अन्य गैर-जरूरी सेवाओं पर पड़ सकता है।
दूसरी ओर, पेट्रोल और डीजल की कीमत बढ़ने से सरकार के बजट पर तुरंत कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन सरकारी वित्तीय दबाव अब भी बना हुआ है। ईंधन पर उत्पाद शुल्क में कटौती और उर्वरक व ईंधन सब्सिडी का बढ़ता बोझ सरकार के खर्च को बढ़ा रहा है। इसके अलावा तेल कंपनियों से मिलने वाले टैक्स और लाभांश में कमी की आशंका भी है, जिससे राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है।
हालांकि, राहत की बात यह है कि सोने और चांदी पर आयात शुल्क बढ़ाने से सरकार की कमाई बढ़ सकती है। अगर ऊंचे शुल्क की वजह से इनका आयात घटता है और वित्त वर्ष 2027 में वित्त वर्ष 2026 के 84.6 अरब डॉलर की तुलना में आयात मूल्य में 20 प्रतिशत की कमी आती है, तो सरकार को अतिरिक्त टैक्स के रूप में लगभग 0.5 से 0.6 लाख करोड़ रुपये मिल सकते हैं। इसके अलावा 1 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक स्थिरीकरण कोष (ईएसएफ) भी सरकार को वित्तीय दबाव संभालने में मदद करेगा।
फिलहाल अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 में सरकार का राजकोषीय घाटा जीडीपी के करीब 4.7 प्रतिशत तक पहुंच सकता है, जो बजट में तय 4.3 प्रतिशत के लक्ष्य से अधिक है। पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतें और सोने-चांदी पर बढ़े आयात शुल्क से देश का चालू खाते का घाटा कुछ हद तक नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। फिर भी अनुमान है कि यह घाटा वित्त वर्ष 2026 के 0.9 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2027 में करीब 2 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
आगे की स्थिति काफी हद तक पश्चिम एशिया संघर्ष की अवधि, कच्चे तेल की कीमतों और अल नीनो के मानसून पर असर पर निर्भर करेगी। इन अनिश्चितताओं के बीच जल्द ही आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक होने वाली है और फिलहाल ब्याज दरों में किसी बदलाव की उम्मीद नहीं है।
अदिति नायर ICRA में मुख्य अर्थशास्त्री और रिसर्च एवं आउटरीच प्रमुख हैं। ये उनके निजी विचार हैं।