पश्चिम एशिया संघर्ष शुरू होने से ठीक पहले भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने फरवरी में विदेशी मुद्रा के हाजिर बाजार से 7.4 अरब डॉलर की शुद्ध डॉलर खरीद की, जो मार्च 2025 के बाद सबसे बड़ी मासिक खरीद है। यह जानकारी केंद्रीय बैंक के मासिक बुलेटिन से सामने आई है।
केंद्रीय बैंक ने मार्च में विदेशी मुद्रा बाजार में भारी हस्तक्षेप किया और डॉलर बेचे, क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के बाद रुपये पर दबाव पड़ा और यह 4 प्रतिशत से अधिक गिर गया। फरवरी में रिजर्व बैंक ने 21.4 अरब डॉलर खरीदे, जबकि 13.99 अरब डॉलर की बिक्री की। इससे पहले जनवरी में केंद्रीय बैंक ने 2.53 अरब डॉलर की शुद्ध खरीद की थी।
इस बीच भारतीय रुपये की रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (रीर) फरवरी के 93.99 के मुकाबले और घटकर 92.72 हो गई। रीर भारत और उसके प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के बीच महंगाई दर के अंतर को ध्यान में रखते हुए नॉमिनल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (नीर) को समायोजित करता है। अगर रीर की वैल्यू 100 से ऊपर रहती है तो यह आधार वर्ष की तुलना में रुपये में तेजी के संकेत देता है और इससे वैश्विक बाजारों में भारत का निर्यात कम प्रतिस्पर्धी रह सकता है। बाजार सहभागियों ने कहा कि यह आंकड़ा व्यापक तौर पर रिजर्व बैंक की फॉरवर्ड बुक के अनवाइंडिंग और रोलओवर को दिखाता है।
उन्होंने कहा कि रिजर्व बैंक ने पहले उल्लेखनीय फॉरवर्ड पोजीशन बनाई थी, जो माह के दौरान परिपक्व होने लगी और उसकी हस्तक्षेप की नीति के तहत हाजिर डॉलर खरीद आवश्यक हो गई। इसमें से कुछ खरीदारी फॉरवर्ड पोजीशन को रद्द करने के लिए हुई। एक बाजार भागीदार ने कहा, ‘खरीद का एक उल्लेखनीय हिस्सा पिछले फॉरवर्ड अनुबंधों की मैच्योरिटी की वजह से था। इसमें केंद्रीय बैंक को हाजिर बाजार में डिलिवरी लेनी पड़ी थी। इसके अलावा मौजूदा फॉरवर्ड बुक को प्रबंधित करने के लिए कुछ पोजीशनों को स्क्वायर ऑफ किया गया।’
फरवरी के अंत में रुपये के फॉरवर्ड मार्केट में रिजर्व बैंक का आउटस्टैंडिंग नेट शॉर्ट डॉलर पोजीशन बढ़कर 77.67 अरब डॉलर हो गया, जो मार्च 2025 के बाद सर्वाधिक है। जनवरी के अंत में नेट शॉर्ट पोजीशन 67.78 अरब डॉलर थी। एक साल की कम अवधि के लिए रिजर्व बैंक की शॉर्ट पोजीशन में कोई बदलाव नहीं हुआ और यह 28 अरब डॉलर पर बना रहा। वहीं एक साल से अधिक अवधि की शॉर्ट पोजीशन करीब 9 अरब डॉलर बढ़कर 49 अरब डॉलर हो गई। रिजर्व बैंक की 77 अरब डॉलर की नेट शॉर्ट पोजीशन में से 10.95 अरब डॉलर 1 महीने के कॉन्ट्रैक्ट और 5.9 अरब डॉलर एक से तीन महीने की अवधि के लिए था। वहीं 11.7 अरब डॉलर की पोजीशन 3 महीने और एक साल तय की गई थी, जबकि शेष 49 डॉलर का कांट्रैक्ट 1 साल से अधिक अवधि के लिए था।
डीलरों ने कहा कि इस बात की पूरी संभावना है कि रिजर्व बैंक ने मार्च में रुपये को समर्थन करने के लिए शुद्ध बिकवाली की हो। उन्होंने कहा कि इस तरह का संचालन आमतौर पर द्विपक्षीय होता है और यह किसी दिशा में सख्ती से झुका नहीं होता है। डॉलर सूचकांक कमजोर पड़ने और चीन के युवान जैसी मुद्राओं की तुलनात्मक रूप से स्थिरता के बावजूद रुपये पर दबाव बना हुआ है। इससे संकेत मिलते हैं कि विदेशी संस्थागत निवेशक लगातार पैसा निकाल रहे हैं। ट्रेडर्स का कहना है कि आगे चलकर रुपये के और कमजोर होने की उम्मीद के कारण ऐसा हो रहा है।