बैंकों ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से नेट ओपन विदेशी मुद्रा (फॉरेक्स) की सीमा 10 करोड़ डॉलर तय करने के फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है। सूत्रों के अनुसार बैंकों ने चेतावनी दी है कि इस कदम से अच्छा-खासा मार्क-टू-मार्केट (एमटीएम) घाटा हो सकता है और कारोबार के जबरन व त्वरित निपटान के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
शुक्रवार को जारी दिशानिर्देश का अनुपालन 10 अप्रैल तक सुनिश्चित किया जाना है। यह निर्देश ऐसे समय में आया है, जब डॉलर की दीर्घावधि खरीद बढ़ गई थी। बाजार के अनुमानों के अनुसार निकट भविष्य में 40 अरब डॉलर की बड़ी लॉन्ग डॉलर पोजीशन को बंद किया जाएगा। बैंकों को इसमें कमी लाने के लिए मजबूर करके केंद्रीय बैंक प्रभावी ढंग से घरेलू बाजार में डॉलर की आपूर्ति को नियंत्रित कर रहा है।
फरवरी के आखिर में पश्चिम एशिया संकट की शुरुआत के बाद से रुपया 4 प्रतिशत से अधिक कमजोर हो गया है और इस कैलेंडर वर्ष में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली एशियाई मुद्रा बन गया है। यह वित्त वर्ष 2014 के बाद सबसे तेज गिरावट की ओर अग्रसर है। शुक्रवार को यह 94.81 रुपये प्रति डॉलर के नए निचले स्तर पर बंद हुआ।
बैंकों ने प्रस्ताव किया है कि संशोधित सीमा केवल बढ़ी स्थिति के मामले में लागू किया जाना चाहिए, जिससे कि मौजूदा एक्सपोजर सुरक्षित रहेगा और बैलेंस शीट पर कम अवधि का दबाव संतुलित रहेगा। बाजार सहभागियों द्वारा एक संक्रमणकालीन अवधि की भी मांग की जा रही है।
नई सीमा के साथ पोजीशन के तालमेल के लिए 3 महीने की अवधि उचित मानी जा रही है। हालांकि कुछ सहभागियों ने कहा कि रिजर्व बैंक की ओर से अचानक उठाए गए कदम से लक्षित और संभवतः अस्थाई हस्तक्षेप के संकेत मिलते हैं, जिससे निकट भविष्य में किसी ढील की संभावना कम है।
एक निजी बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक स्पष्ट इरादे के साथ उठाया गया कदम है। मुझे नहीं लगता कि रिजर्व बैंक तत्काल कोई राहत देगा। तथ्य यह है कि इसे अचानक पेश किया गया। इससे रिजर्व बैंक की विशिष्ट चिंता का पता चलता है। मुझे उम्मीद है कि यह एक अस्थायी उपाय होगा।’