पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष की वजह से आपूर्ति में आई रुकावटों से महंगाई बढ़ने की आशंका जताई जा रही हो मगर बिज़नेस स्टैंडर्ड के सर्वेक्षण में ज्यादातर प्रतिभागियों का मानना है कि भारतीय रिजर्व बैंक की 6 सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति रीपो दर को 5.25 फीसदी पर यथावत बनाए रख सकती है। हालांकि लगभग सभी प्रतिभागियों ने उम्मीद जताई कि मौजूदा वित्त वर्ष में रीपो दर में कम से कम एक बार इजाफा होगा। इससे संकेत मिलता है कि ब्याज दरों का रुख जल्द ही बदल जाएगा। मौद्रिक नीति समिति की अगली बैठक 3 से 5 जून को प्रस्तावित है।
मौद्रिक नीति समिति ने 2025 में रीपो दर में कुल 125 आधार अंक की कटौती की थी और इस साल फरवरी तथा अप्रैल की बैठक में इसे अपरिवर्तित रखा गया है।
एचडीएफसी बैंक की प्र्रधान अर्थशास्त्री साक्षी गुप्ता ने कहा, ‘मुद्रास्फीति आरबीआई के औसत लक्ष्य से नीचे है। पश्चिम एशिया संघर्ष का वृद्धि पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए आरबीआई फिलहाल प्रतीक्षा करेगा और स्थिति पर नजर रख सकता है।’
सर्वेक्षण में शामिल लोगों का कहना है कि जब आरबीआई जून में मौद्रिक नीति समीक्षा के लिए बैठक करेगा तब तक खुदरा मुद्रास्फीति 4 फीसदी के लक्ष्य से नीचे रहेगी जबकि वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि स्थिर बनी रहेगी। हालांकि पश्चिम एशिया संकट से मुद्रास्फीति के बढ़ने और वृद्धि दर में नरमी का जोखिम पैदा कर रहा है। ऐसे परिदृश्य में वृद्धि और मुद्रास्फीति दोनों पर पड़ने वाले प्रभाव की स्पष्टता तक नीति को यथावत बनाए रखना ही सर्वोत्तम रणनीति होगी।
इसके अलावा मुद्रास्फीति के लक्ष्य का लचीला ढांचा आरबीआई को आपूर्ति-पक्ष के झटकों को नजरअंदाज करने की गुंजाइश प्रदान करता है, जब तक कि मुद्रास्फीति 6 फीसदी की ऊपरी सीमा से नीचे रहती है।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा मुद्रास्फीति अप्रैल में बढ़कर 3.48 फीसदी हो गई जो मार्च में 3.40 फीसदी थी। खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ने से खुदरा मुद्रास्फीति बढ़ी है। हालांकि अभी भी खुदरा मुद्रास्फीति आरबीआई के 2 से 6 फीसदी की वहनीय दायरे में बनी हुई है।
स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक को उम्मीद है कि मौँद्रिक नीति समिति जून से नीतिगत दरें वृद्धि शुरू कर देगी जिससे वित्त वर्ष 2027 में कुल 50 आधार अंक की बढ़ोतरी होगी। इसका कारण जिंसों के ऊंचे दाम और रुपये पर बढ़ते दबाव से मुद्रास्फीति बढ़ने का जोखिम है और यह विकास दर चिंता से कहीं बड़ी है। पिछले एक साल में डॉलर के मुकाबले रुपये में 10 फीसदी से अधिक की गिरावट आई है। सर्वेक्षण में शामिल प्रतिभागियों का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में रीपो दर में एक से लेकर तीन बार बढ़ोतरी हो सकती है।
सर्वेक्षण में शामिल प्रतिभागियों का कहना है कि आरबीआई फिलहाल कोई बदलाव नहीं करेगा और शुरुआती दौर के झटके के असर को कम करने की कोशिश करेगा क्योंकि यह आपूर्ति से जुड़ा मामला है। हालांकि आपूर्ति में लंबे समय तक रुकावट रहने से वृद्धि दर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। अगर कीमतों पर दबाव व्यापक हो जाता है और घरेलू मुद्रास्फीति में तेजी आती है तो आरबीआई द्वारा कदम उठाए जाने की संभावना है।
चालू वित्त वर्ष के लिए वृद्धि दर के अनुमान में कटौती को लेकर प्रतिभागियों की राय बंटी हुई थी।
आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेन गुप्ता ने उच्च आवृत्ति वाले संकेतकों में मजबूती का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें वृि। दर के अनुमान में कोई संशोधन की उम्मीद नहीं है। उन्होंने कहा कि ईंधन की बढ़ती कीमतों का असर उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ा है क्योंकि बढ़ोतरी मई में ही शुरू हुई है। केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2027 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.9 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है।
गुप्ता ने कहा, ‘उच्च आवृत्ति वाले संकेतकों के स्थिर रहने के कारण वृद्धि अनुमान में कोई संशोधन नहीं होगा। ईंधन की कीमतों में वृद्धि मई से ही शुरू होने के कारण उपभोक्ताओं को सुरक्षा मिली है। वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में सूचीबद्ध कंपनियों के प्रदर्शन से पता चलता है कि मार्जिन स्थिर रहे हैं क्योंकि इनपुट लागत में वृद्धि की भरपाई कम ब्याज दरों और इन्वेंट्री में कमी से हो गई।’
सर्वेक्षण में शामिल अधिकतर लोगों को वित्त वर्ष 2027 के लिए मुद्रास्फीति के अनुमान में बढ़ोतरी की उम्मीद जताई। उनका कहना था कि अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद रहता है तो मुद्रास्फीति बढ़ सकती है। आरबीआई का 4.6 फीसदी मुद्रास्फीति का अनुमान कच्चे तेल की कीमतों के औसतन 85 डॉलर प्रति बैरल रहने की धारणा पर आधारित है। कच्चे तेल की कीमतों की किसी भी प्रकार की बढ़ोतरी से खुदरा मुद्रास्फीति का अनुमान भी बढ़ सकता है।