RBI MPC Meeting April 2026: आने वाली मौद्रिक नीति बैठक से पहले एक बार फिर नजरें RBI पर टिक गई हैं। Nuvama Institutional Equities की रिपोर्ट इशारा करती है कि इस बार भी केंद्रीय बैंक कोई बड़ा कदम उठाने के मूड में नहीं है। तमाम दबावों के बावजूद रेपो रेट 5.25 प्रतिशत पर ही टिके रहने की उम्मीद है। फरवरी 2025 से लगातार कटौती के बाद अब RBI जैसे ठहर कर हालात को समझना चाहता है।
वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव ने नई चिंता खड़ी कर दी है। ईरान से जुड़े हालात ने कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ला दिया है, सप्लाई चेन पर असर पड़ा है और ऊपर से रुपये की कमजोरी ने आयात को महंगा बना दिया है। ये सारे संकेत महंगाई के दबाव को बढ़ाने वाले हैं। लेकिन राहत की बात यह है कि रिपोर्ट इसे स्थायी संकट नहीं मानती, बल्कि एक अस्थायी झटका बताती है।
एक तरफ महंगाई सिर उठा रही है, दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था को सहारे की जरूरत है। ऐसे में RBI के लिए फैसला आसान नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक इस बार सख्ती नहीं, बल्कि संतुलन की नीति अपनाई जा सकती है। यानी महंगाई को काबू में रखते हुए ग्रोथ को भी कमजोर नहीं होने देना है।
हालांकि महंगाई के अनुमान में थोड़ी बढ़ोतरी हो सकती है, लेकिन ग्रोथ के मोर्चे पर RBI ज्यादा बदलाव नहीं करेगा। वित्त वर्ष 2027 के लिए वृद्धि दर का अनुमान लगभग पहले जैसा ही रहने की उम्मीद है। साफ है कि केंद्रीय बैंक अभी हालात को लेकर सतर्क है, लेकिन घबराया नहीं है।
वैश्विक हालात का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है। कंपनियों के मुनाफे पर दबाव आ सकता है, निवेश की रफ्तार धीमी पड़ सकती है और सरकारी खर्च भी प्रभावित हो सकता है। ऐसे में हर कदम फूंक-फूंक कर रखने की जरूरत है।
रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि RBI फिलहाल ‘देखो और इंतजार करो’ की रणनीति अपनाएगा। लिक्विडिटी पर नजर रखी जाएगी और जल्दबाजी में कोई बड़ा फैसला नहीं लिया जाएगा। जब वैश्विक हालात साफ होंगे, तब शायद फिर से दरों में कटौती का रास्ता खुल सकता है। अभी के लिए RBI की प्राथमिकता साफ है, जोखिमों के बीच संतुलन और अर्थव्यवस्था को संभालकर आगे बढ़ाना।