RBI MPC Meet 2026: भारतीय रिजर्व बैंक की 3-5 जून को होने वाली मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक पर बाजार की नजरें टिकी हैं। कच्चे तेल की कीमतों में हालिया नरमी और लिक्विडिटी की स्थिति में सुधार और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच MPC की बैठक डेट बाजारों के लिए सबसे अहम घटना साबित होने वाली है।
बाजार के जानकारों को व्यापक रूप से उम्मीद है कि RBI रीपो रेट को 5.25% पर बरकरार रखेगा और अपनी ‘न्यूट्रल’ नीति का रुख बनाए रखेगा। हालांकि, निवेशकों की नजर केंद्रीय बैंक की तरलता प्रबंधन, रुपये की स्थिरता और बाजारों में सुव्यवस्थित संचालन सुनिश्चित करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों पर दी जाने वाली टिप्पणियों पर रहेगी।
पश्चिम एशिया में जारी संकट से पैदा हुई भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और कच्चे तेल की कीमतों को लेकर चिंताओं के कारण पिछले कुछ सप्ताह में बॉन्ड बाजार में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है।
टाटा म्युचुअल फंड के अनुसार, मई के अंतिम सप्ताह में मजबूत क्रेडिट ग्रोथ, चालू खाते के घाटे (करंट अकाउंट डेफिसिट) में बढ़ोतरी और ब्याज दरों में संभावित वृद्धि की आशंकाओं के चलते बाजार में तरलता (लिक्विडिटी) सख्त हुई, जिससे शॉर्ट टर्म बॉन्ड यील्ड में करीब 20-30 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी हुई। वहीं दूसरी ओर, पश्चिम एशिया में स्थायी युद्धविराम की उम्मीद और महंगाई संबंधी चिंताओं में कमी आने से लंबी अवधि के बॉन्ड यील्ड में हल्की नरमी देखी गई।
फंड हाउस का मानना है कि निकट भविष्य में भू-राजनीतिक घटनाक्रम बॉन्ड बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल रहेंगे। साथ ही RBI रुपये की स्थिरता बनाए रखने और बाजार में पर्याप्त नकदी सुनिश्चित करने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता रहेगा।
फिक्स्ड-इनकम निवेशकों को मनी मार्केट में सामान्य स्थिति लौटने के शुरुआती संकेत दिखाई देने लगे हैं। बंधन एएमसी में फंड मैनेजर- फिक्स्ड इनकम हर्षल जोशी के अनुसार, मई में शॉर्ट टर्म सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CD) की यील्ड में आई तेज बढ़ोतरी अब धीरे-धीरे कम होती दिख रही है। तीन महीने की अवधि वाले CD की यील्ड एक सप्ताह पहले के 7.40-7.50 फीसदी से घटकर 7.20-7.25 फीसदी पर आ गई है। इससे संकेत मिलता है कि नकदी की स्थिति में सुधार और बैंकों द्वारा CD जारी करने में कमी से मनी मार्केट के छोटे अवधि वाले हिस्से में संतुलन लौट रहा है।
हालांकि दिसंबर 2026 से मार्च 2027 के बीच मैच्योर होने वाले लंबी अवधि के CD की यील्ड अब भी 7.70-7.80 फीसदी के ऊंचे स्तर पर बनी हुई है। इससे पता चलता है कि निवेशक मध्यम अवधि में नकदी और मौद्रिक नीति के रुख को लेकर अभी भी सतर्क बने हुए हैं।
बंधन एएमसी का मानना है कि यदि सरकारी खर्च बढ़ता है और जून के दौरान बाजार में लिक्विडिटी की स्थिति और बेहतर होती है, तो मनी मार्केट कर्व में आगे भी नरमी देखने को मिल सकती है।
बाजार के जानकारों का मानना है कि जून की MPC बैठक में RBI की ओर से दिए जाने वाले संकेत बेहद अहम होंगे, खासकर तरलता (लिक्विडिटी) प्रबंधन को लेकर। विश्लेषकों के अनुसार, यदि केंद्रीय बैंक तरलता समर्थन उपायों, विदेशी मुद्रा स्वैप (foreign exchange swaps), विदेशी बॉन्ड जारी करने की संभावनाओं या विशेष विदेशी मुद्रा जमा योजनाओं से जुड़ा कोई संकेत देता है, तो इससे बाजार की उम्मीदों को दिशा मिल सकती है और विभिन्न अवधियों की यील्ड में और नरमी आ सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि RBI पर्याप्त तरलता बनाए रखने की स्पष्ट प्रतिबद्धता जताता है, तो शॉर्ट टर्म और मिड टर्म की मनी मार्केट दरों के बीच का अंतर कम हो सकता है। इससे डेट बाजार की धारणा मजबूत होगी और बॉन्ड बाजार को भी समर्थन मिल सकता है।
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एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज के अनुसार, मई के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज गिरावट से रुपये और मौद्रिक नीति, दोनों पर दबाव काफी हद तक कम हुआ है। ब्रोकरेज के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की उम्मीदों के चलते मई में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब 22 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। इससे रुपये को हाल के निचले स्तरों से उबरने में मदद मिली है। एमके का मानना है कि ऊर्जा कीमतों में नरमी आने से मुद्रा को सहारा देने के लिए RBI को आपातकालीन नीतिगत कदम उठाने की जरूरत कम हो गई है।
हालांकि घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी के कारण महंगाई दर में कुछ बढ़ोतरी होने की संभावना है, लेकिन एमके को उम्मीद नहीं है कि RBI ब्याज दरों में वृद्धि करेगा। ब्रोकरेज का अनुमान है कि केंद्रीय बैंक आने वाली तिमाहियों में भी नीतिगत दरों को स्थिर रख सकता है और मौजूदा विराम (पॉज) का दौर जारी रह सकता है।
बाहरी परिस्थितियों में सुधार के बावजूद, घरेलू फाइनेंशियल सिस्टम में तरलता (लिक्विडिटी) की स्थिति अभी भी अपेक्षाकृत तंग बनी हुई है। सरप्लस लिक्विडिटी में उल्लेखनीय कमी आई है, जबकि शॉर्ट टर्म ब्याज दरें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। इससे RBI द्वारा पहले की गई ब्याज दर कटौतियों का पूरा लाभ अर्थव्यवस्था तक पहुंचने में बाधा आ रही है।
विश्लेषकों का मानना है कि जैसे-जैसे कच्चे तेल की कीमतों से जुड़ा दबाव कम होगा, RBI के पास बाजार में ज्यादा नकदी उपलब्ध कराने और मनी मार्केट की स्थिति को सामान्य बनाने की गुंजाइश बढ़ेगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, ब्याज दरों का स्थिर माहौल क्रेडिट ग्रोथ, उपभोक्ता मांग और कंपनियों की आय के लिए पॉजिटव माना जाता है। बैंकों की मजबूत कर्ज वितरण गतिविधियां आर्थिक वृद्धि को सहारा देती रही हैं, खासकर विवेकाधीन (डिस्क्रेशनरी) उपभोग से जुड़े क्षेत्रों में।
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चूंकि इस बार MPC बैठक में किसी बड़े नीतिगत कदम की उम्मीद नहीं है, इसलिए बाजार की नजर RBI के तरलता की स्थिति, महंगाई के जोखिमों और वैश्विक घटनाक्रमों के आकलन पर रहेगी। बॉन्ड बाजार के निवेशक केंद्रीय बैंक की टिप्पणियों को ध्यान से पढ़ेंगे ताकि भविष्य में तरलता समर्थन और अल्पकालिक ब्याज दरों की दिशा के बारे में संकेत मिल सकें।
फिलहाल कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट, तरलता की स्थिति में सुधार और नीतिगत स्थिरता की उम्मीदों ने ब्याज दरों को यथावत रखने के पक्ष को मजबूत किया है। हालांकि, पश्चिम एशिया में जारी तनाव और अन्य भू-राजनीतिक जोखिम अभी भी भारतीय बॉन्ड बाजार के लिए सबसे बड़ी अनिश्चितता बने हुए हैं।