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RBI MPC: क्या पश्चिम एशिया संकट के बीच रीपो रेट में फिर लगेगा ब्रेक? अर्थशास्त्रियों ने दी बड़ी चेतावनी

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पश्चिम एशिया संकट और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच आरबीआई इस बार भी रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रख सकता है, ताकि महंगाई को बढ़ने से रोका जा सके

Last Updated- April 05, 2026 | 3:57 PM IST
RBI MPC
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

रिजर्व बैंक की अप्रैल वाली मौद्रिक नीति समीक्षा में बेंचमार्क रीपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर ही छोड़ने की तैयारी दिख रही है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि पश्चिम एशिया का संकट महंगाई को और भड़का सकता है, इसलिए बैंक अभी कोई बदलाव का रिस्क नहीं लेना चाहता।

पश्चिम एशिया में चल रही भू-राजनीतिक उथल-पुथल ने कमोडिटी कीमतों को हिला दिया है। रुपये की कीमत भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई है। इन सबके कारण नीति बनाने वाले अधिकारियों के सामने चुनौतियां बढ़ गई हैं। विकास, महंगाई और नीति के रुख को लेकर अब सबकी नजरें टिकी हुई हैं।

एक दर्जन से ज्यादा अर्थशास्त्रियों के सर्वे में यही बात निकलकर आई है कि अभी हालात काफी अनिश्चित हैं। कच्चे तेल की कीमतों में जो उतार-चढ़ाव चल रहा है और वैश्विक घटनाएं जो रोज नई मोड़ ले रही हैं, उनको देखते हुए RBI को फिलहाल ब्रेक लगाकर बैठना पड़ सकता है। ICRA की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर कहती हैं कि आने वाले दिनों के महंगाई के आंकड़ों को अच्छे से देखने के बाद ही कोई अगला कदम सोचा जाएगा।

अर्थशास्त्रियों ने सावधानी की सलाह दी

SBI के मुख्य अर्थशास्त्री सौम्य कांति घोष का कहना है कि पॉज का ऐलान करते वक्त RBI को अपनी बात बहुत सोच-समझकर रखनी होगी। भारत इस संकट से पूरी तरह बचा नहीं है। रुपये की कीमत अब 93 डॉलर प्रति से ऊपर चल रही है और कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा पर अटका हुआ है। इससे आयात महंगाई में काफी उछाल आया है। ऊपर से सुपर एल निनो का असर भी महंगाई को और दबाव दे रहा है।

क्रिसिल की मुख्य अर्थशास्त्री दीप्ति देशपांडे मानती हैं कि अगर महंगाई मौद्रिक नीति समिति के लक्ष्य के आसपास ही रही तो इस सप्लाई शॉक को नजरअंदाज करके रेट्स को होल्ड पर रखा जा सकता है। बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कहते हैं कि इस बार न तो रीपो रेट बदलेगा और न ही नीति का रुख। टोन पूरी तरह सतर्क रहेगी। लोग RBI के GDP और महंगाई के नए अनुमानों का इंतजार कर रहे हैं।

HDFC बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री साक्षी गुप्ता का सुझाव है कि शॉर्ट टर्म की घटनाओं के आधार पर फैसला लेना ठीक नहीं होगा। खासकर जब दुनिया भर में कमोडिटी की कीमतें अभी भी ऊपर-नीचे हो रही हों। केंद्रीय बैंक महंगाई की दिशा पर साफ संकेत मिलने तक इंतजार करना बेहतर समझता है।

Also Read: युद्ध का सीधा असर भारत पर! Moody’s ने घटाई GDP ग्रोथ, 6% पर पहुंचा अनुमान; महंगाई बढ़ने की चेतावनी

पिछले फैसलों और मौजूदा दबाव की कहानी

RBI ने पिछले फरवरी से लेकर अब तक रीपो रेट में कुल 1.25 प्रतिशत की कटौती कर दी थी। महंगाई कुछ ठंडी पड़ी थी तो ग्रोथ को बढ़ावा देने के लिए यह जगह बन गई थी। लेकिन अगस्त, अक्टूबर और फरवरी 2026 की तीनों नीतियों में रेट को जस का तस रखा गया।

मौद्रिक नीति समिति की छह सदस्यीय टीम सोमवार से अपनी बैठक शुरू करेगी। बुधवार को अंतिम फैसला लिया जाएगा। यह बैठक इस बार खासतौर पर चुनौती भरी मानी जा रही है।

रिटेल महंगाई अब RBI के 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि लक्ष्य के काफी करीब पहुंच चुकी है। फिर भी कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में आई तेजी से दूसरी लहर का असर पड़ने की आशंका है। ईंधन, परिवहन और कोर महंगाई वाले हिस्सों पर इसका असर सबसे ज्यादा दिख सकता है।

जानकार बताते हैं कि कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी महंगाई को 0.60 प्रतिशत तक ऊपर धकेल सकती है। पहले कच्चा तेल 60 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था, लेकिन संघर्ष शुरू होने के बाद से यह 100 डॉलर से ऊपर चला गया। युद्ध के बाद रुपये में 4 प्रतिशत से ज्यादा की कमजोरी आई है, जिससे आयात महंगाई और बढ़ गई है।

नीति अब महंगाई पर ज्यादा ध्यान देगी

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि RBI इस बार अपने महंगाई और विकास के अनुमानों को फिर से देख सकता है। अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं तो चालू वित्त वर्ष का महंगाई पूर्वानुमान ऊपर की तरफ संशोधित किया जा सकता है।

अभी की स्थिति में नीति का मुख्य फोकस विकास को सपोर्ट करने से हटकर महंगाई को काबू में रखने पर चला गया है। घरेलू स्तर पर विकास की स्थिति भले ही ठीक हो, लेकिन वैश्विक अनिश्चितताएं निर्यात और निवेश दोनों पर असर डाल सकती हैं। इसलिए RBI को अपनी नीति में लचीलापन बनाए रखना होगा।

केंद्रीय बैंक अपना न्यूट्रल रुख बरकरार रखेगा। टोन सावधान और नजर रखने वाली रहेगी। नीति निर्माता कच्चे तेल की अस्थिर कीमतों और भू-राजनीतिक तनाव से महंगाई के ऊपरी जोखिमों को लेकर खासतौर पर बात करेंगे।

लिक्विडिटी की स्थिति, पहले के रेट बदलावों का असर और फाइनेंशियल मार्केट की स्थिरता भी RBI के लिए अहम रहेंगी। करेंसी की गतिविधियां, कैपिटल फ्लो और बॉन्ड मार्केट की दिशा पर भी कड़ी नजर रखी जाएगी।

(PTI के इनपुट के साथ)

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First Published - April 5, 2026 | 3:56 PM IST

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