भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) डॉलर-रुपये के लिए एकल वैश्विक बाजार और रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण के दीर्घकालिक लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्ध है। रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर टी रवि शंकर ने बुधवार को क्लियरिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (सीसीआईएल) की 25वीं वर्षगांठ के कार्यक्रम में कहा कि केंद्रीय बैंक के बैंकों के ओपन नॉन डिलिवरेबल फॉरवर्ड (एनडीएफ) पोजिशन पर लगाए गए प्रतिबंध अस्थायी हैं और इनका उद्देश्य घरेलू मुद्रा में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करना है।
रवि शंकर ने कहा, ‘डॉलर-रुपये के लिए एकल वैश्विक बाजार बनाने की प्रतिबद्धता कायम है। दूसरा, रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण की प्रतिबद्धता भी कायम है। ये दीर्घकालिक प्रतिबद्धताएं हैं। अभी जो कुछ भी किया गया, वह बाजार में भारी अस्थिरता पैदा करने वाली अस्थायी घटना से निपटने के लिए था। इसका जब हल प्राप्त कर लेंगे तो अपने काम को फिर से करना शुरू कर देना चाहिए। हमारा विचार यह है कि दुनिया में रुपये के जोखिम से जुड़ा कहीं भी कोई भी उपयोगकर्ता किसी भी उपलब्ध उत्पाद तक पहुंच सके। लिहाजा यह प्रतिबद्धता बनी रहेगी।’
उन्होंने यह नहीं बताया कि बैंकों के लिए ऑनशोर डिलीवरेबल मार्केट में नेट ओपन पोजीशन पर 10 करोड़ डॉलर की सीमा कब तक लागू रहेगी। रिजर्व बैंक के उपायों के परिणामस्वरूप 27 मार्च से 20 अप्रैल के बीच घरेलू मुद्रा में 2 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई। इस सप्ताह की शुरुआत में रिजर्व बैंक ने रुपये के डेरिवेटिव में बैंकों के आर्बिट्राज ट्रेडों पर कुछ प्रतिबंधों में ढील दी, जिसमें 1 अप्रैल को लागू किए गए उपायों को आंशिक रूप से उलट दिया गया।
केंद्रीय बैंक ने उन कुछ प्रतिबंधों को वापस ले लिया, जिन्होंने बैंकों को रुपये से जुड़े नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड की पेशकश करने से रोक दिया था। संशोधित नियमों के तहत बैंक अब बैक-टु-बैक मार्ग के माध्यम से मौजूदा अनुबंधों और सौदों को रद्द करने और उन्हें आगे बढ़ाने सहित कुछ संबंधित-पक्ष लेनदेन कर सकते हैं।