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RBI की नीतियों का 10 साल का हिसाब, कब बढ़ीं दरें और कब मिली राहत

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SBI रिसर्च रिपोर्ट में खुलासा, शक्तिकांत दास के कार्यकाल में सबसे ज्यादा उतार-चढ़ाव, लेकिन MPC के फैसलों में दिखी मजबूत सहमति

Last Updated- March 16, 2026 | 9:33 AM IST
Reserve Bank of India (RBI)

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति पर SBI रिसर्च की एक अहम रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें पिछले 10 साल (2016 से 2026) के ब्याज दर फैसलों का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान रेपो रेट ने एक पूरा चक्र पूरा किया। पहले दरों में कटौती हुई, फिर बढ़ोतरी हुई और उसके बाद स्थिरता का दौर भी आया। सबसे ज्यादा उतार-चढ़ाव गवर्नर शक्तिकांत दास के कार्यकाल में देखने को मिला, जब कोविड-19 महामारी और वैश्विक महंगाई जैसे बड़े संकटों ने नीतिगत फैसलों को प्रभावित किया।

महामारी से महंगाई तक बदलती रही नीति

रिपोर्ट बताती है कि 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए RBI ने ब्याज दरों में तेजी से कटौती की। इसके बाद 2022 में वैश्विक महंगाई के दबाव के कारण केंद्रीय बैंक को दरें तेजी से बढ़ानी पड़ीं। यानी कुछ ही वर्षों में नीति का रुख ढील से सख्ती की ओर बदल गया।

महंगाई लक्ष्य व्यवस्था के बाद कम हुए रेट हाइक

रिपोर्ट में कहा गया है कि महंगाई लक्ष्य व्यवस्था लागू होने के बाद भारत में ब्याज दर बढ़ाने की घटनाएं कम हुई हैं। जहां 2010 से 2015 के बीच 16 बार ब्याज दर बढ़ाई गई, वहीं बाद के वर्षों में दरों में बदलाव कम बार हुए और कई बार लंबे समय तक दरें स्थिर रहीं।

RBI ने दो साल तक नहीं बदली रेपो रेट

रिपोर्ट के अनुसार 2021 और 2024 ऐसे साल रहे जब पूरे साल रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया। हालांकि 2024 को फुल कंसेंसस का साल भी कहा गया, क्योंकि कई फैसले पूरी सहमति से लिए गए। लेकिन इसी साल को डिसेंट का साल भी माना गया क्योंकि नीति के रुख को लेकर मतभेद भी दिखे।

दरों के फैसलों में दिखी ज्यादा सहमति

रिपोर्ट के मुताबिक MPC के फैसलों में अक्सर सदस्यों के बीच मजबूत सहमति देखने को मिली। दर तय करने के फैसलों पर सदस्य अक्सर एकमत रहे, जबकि नीति के रुख और भविष्य के संकेत को लेकर ज्यादा मतभेद सामने आए।

शक्तिकांत दास के दौर में सबसे बड़ा संकट काल

रिपोर्ट बताती है कि शक्तिकांत दास के कार्यकाल में केंद्रीय बैंक को सबसे कठिन दौर का सामना करना पड़ा। इस दौरान कोविड-19 महामारी, वैश्विक आपूर्ति संकट और महंगाई का दबाव जैसे कई बड़े आर्थिक झटके आए। इसी वजह से इस अवधि को मौद्रिक नीति के लिहाज से सबसे ज्यादा अस्थिर दौर माना गया है।

RBI MPC की भाषा भी समय के साथ बदली

रिपोर्ट में MPC बैठकों के मिनट्स का विश्लेषण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और NLP तकनीक की मदद से किया गया। इससे पता चला कि अलग-अलग गवर्नरों के समय नीति की भाषा और शब्दावली भी बदलती रही। उर्जित पटेल के दौर में भाषा ज्यादा स्थिर और महंगाई लक्ष्य पर केंद्रित रही। शक्तिकांत दास के दौर में कोविड और वैश्विक संकटों के कारण नीति की भाषा में बड़े बदलाव आए। संजय मल्होत्रा के शुरुआती कार्यकाल में नीति की नई दिशा बनती दिख रही है।

वैश्विक मानकों के अनुरूप पारदर्शिता

रिपोर्ट में कहा गया है कि MPC बैठक के 14 दिन बाद मिनट्स जारी करना अंतरराष्ट्रीय केंद्रीय बैंकों की व्यवस्था के अनुरूप है। अमेरिका में भी फेडरल रिजर्व इसी तरह बैठकों के मिनट्स जारी करता है, जिससे निवेशकों और बाजार को नीति के पीछे की सोच समझने में मदद मिलती है।

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First Published - March 16, 2026 | 9:17 AM IST

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