भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ‘अर्थव्यवस्था की स्थिति’ पर जारी मासिक रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशिया युद्ध के बाद कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी बाह्य क्षेत्र के लिए चुनौती पेश करती है। तेल में तेजी के असर पर नजर रखना जरूरी है, भले ही हेडलाइन मुद्रास्फीति दर तय सीमा के भीतर क्यों न हो।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने इस चरण में वृहद आर्थिक मजबूती की स्थिति से प्रवेश किया है क्योंकि घरेलू मांग वृद्धि की मुख्य चालक बनी हुई है। लेकिन आपूर्ति पक्ष के दबाव के कारण निकट-अवधि का परिदृश्य कुछ हद तक धुंधला नजर आ रहा है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अप्रैल में भले ही कुछ संकेतकों में गिरावट देखने को मिली हो मगर कुल मिलाकर आर्थिक गतिविधियों ने मजबूती दिखी।
आरबीआई के कार्मिकों द्वारा तैयार की गई और डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता के मार्गदर्शन में बनी रिपोर्ट में कहा गया है, ‘हेडलाइन मुद्रास्फीति दर अभी भी तय सीमा के अंदर बनी हुई है लेकिन घरेलू कीमतों पर तेल में तेजी के असर पर नजर रखने की जरूरत है।’ आरबीआई ने स्पष्ट किया कि रिपोर्ट में व्यक्त विचार लेखकों के हैं और उसके दृष्टिकोण को परिलक्षित नहीं करता है।
ब्रेंट क्रूड की कीमतें आज घटकर 100.71 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई हैं लेकिन अभी भी यह फरवरी के आखिर में पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने से स्तर से करीब 36.3 फीसदी ज्यादा हैं। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘वित्तीय हालात, कच्चे तेल की कीमतें और पूंजी का प्रवाह बाहरी क्षेत्र के लिए चुनौतियां बने हुए हैं।’ साथ ही यह भी बताया गया कि मई में ट्रेजरी बिल और दिनांकित सरकारी प्रतिभूतियों पर यील्ड में थोड़ी बढ़ोतरी हुई है।
पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण वैश्विक तेल और गैस की कीमतों में काफी बढ़ोतरी हुई। भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत ऊंची बनी रही जिसके परिणामस्वरूप तेल मार्केटिंग कंपनियों को भारी घाटा उठाना पड़ा। ऐसे में तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में दो चरणों में बढ़ोतरी की, पहली बार 15 मई को और दूसरी बार 19 मई को।
पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण कीमतों पर पड़ रहे दबाव के कारण अप्रैल में थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति दर बढ़कर 8.3 फीसदी हो गई जो मार्च में 3.9 फीसदी थी। थोक मुद्रास्फीति का यह 42 महीनों का उच्चतम स्तर है। अप्रैल में थोक महंगाई में आई इस तेज बढ़ोतरी का मुख्य कारण ईंधन और बिजली समूह रहा। हालांकि अन्य समूहों में भी कीमतों में तेज उछाल देखा गया। खुदरा मुद्रास्फीति अप्रैल में मामूली बढ़कर 3.5 फीसदी रही जो मार्च में 3.4 फीसदी थी। इसका मुख्य कारण खाद्य पदार्थों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी थी।
रिपोर्ट के अनुसार देश के कुछ हिस्सों में सामान्य से ज्यादा न्यूनतम तापमान और बेमौसम बारिश की संभावना से बची हुई रबी फसलों को नुकसान हो सकता है। मगर खाद्यान्न भंडार बफर मानक से काफी ज्यादा है, जिससे देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
सकारात्मक पक्ष यह है कि सेवाओं का मजबूत निर्यात, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का सकारात्मक शुद्ध प्रवाह, विदेशी मुद्रा भंडार और सरकार तथा रिजर्व बैंक द्वारा उठाए गए कई सक्रिय नीतिगत कदम भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहरी चुनौतियों से बचाने में मददगार साबित होंगे।