भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने आज जारी ‘अर्थव्यवस्था की स्थिति’ रिपोर्ट में आगाह किया है कि पश्चिम एशिया में लगभग दो महीने से चल रहे संघर्ष के कारण आपूर्ति में आ रही बाधा आगे चलकर मांग में भारी गिरावट का रूप ले सकती है। ऐसे में इस स्थिति का बहुत ही बारीकी और सावधानी से आकलन करने की दरकार है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि आपूर्ति में आई बाधा और मौसम से जुड़ी अनिश्चितताओं के कारण मुद्रास्फीति के बढ़ने का जोखिम है मगर यह अभी भी निर्धारित दायरे में बनी हुई है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुमान के अनुसार साल 2026 में मॉनसूनी बारिश सामान्य से कम रह सकती है और यह दीर्घकालिक औसत की 92 फीसदी रहेगी। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘आपूर्ति के झटकों से मांग के प्रभावित होने के संभावित असर का सावधानीपूर्वक और लगातार मूल्यांकन की जरूरत है।’
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अमेरिका और ईरान के बीच अस्थायी युद्ध विराम से वैश्विक अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिली है। रिपोर्ट के अनुसार मजबूत वृहद आर्थिक बुनियाद अर्थव्यवस्था को ऐसे झटकों का सामना करने में मदद करेगी। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा कि आरबीआई कर्मचारियों द्वारा डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता के मार्गदर्शन में तैयार की गई यह रिपोर्ट केंद्रीय बैंक के विचारों को नहीं दर्शाती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर यह संघर्ष जारी रहता है और आपूर्ति श्रृंखला जल्द बहाल नहीं होती हैं तो इससे घरेलू अर्थव्यवस्था के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
अर्थव्यवस्था की स्थिति रिपोर्ट में कहा गया है कि घरेलू आर्थिक गतिविधियों ने कई क्षेत्रों में मजबूती दिखाई जबकि अन्य क्षेत्रों में सुस्ती देखने को मिली है। रिपोर्ट में आर्थिक गति धीमी होने के शुरुआती संकेतों की ओर इशारा किया गया है, जो बंदरगाह कार्गो, हवाई यातायात और परचेजिंग मैनेजरों के दृष्टिकोण जैसे कुछ चुनिंदा संकेतकों में भी स्पष्ट तौर पर दिखाई देते हैं।
विनिर्माण पीएमआई में वृद्धि होने के बावजूद यह लगभग 4 साल के निचले स्तर पर आ गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि लागत दबाव और अनिश्चितता ने नए ऑर्डर और उत्पादन को प्रभावित किया। सेवा क्षेत्र के पीएमआई ने लचीलापन दिखाया है मगर इसकी वृद्धि भी 14 महीने के निचले स्तर पर आ गई जो नए व्यवसाय में नरमी को दर्शाता है।
रिपोर्ट में आठ प्रमुख उद्योगों के उत्पादन में भी गिरावट का उल्लेख किया गया है। उर्वरक, कच्चा तेल, कोयला और बिजली के उत्पादन में गिरावट के बुनियादी उद्योगों का उत्पादन वृद्धि 19 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण आपूर्ति झटके का सामना करने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है। और मार्च के उच्च-आवृत्ति वाले आर्थिक गतिविधि संकेतकों ने मिश्रित रुझान दिखाए हैं।’
इसमें कहा गया कि आरबीअई के भविष्योन्मुखी सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि मौजूदा स्थिति को लेकर उपभोक्ता विश्वास कमजोर पड़ रहा है, कारोबारी आशावाद में नरमी आई है और साथ ही लागत का दबाव भी बढ़ा है।
आपूर्ति पक्ष पर रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्च महीने में औद्योगिक गतिविधियों के उच्च-आवृत्ति संकेतक पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण नरमी की ओर इशारा करते हैं।
कृषि क्षेत्र के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों के लिए गर्मियों में बोआई अनुकूल रही है मगर संभावित अल नीनो स्थितियों के कारण दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दौरान सामान्य से कम बारिश होने की आशंका कृषि उत्पादन के लिए जोखिम पैदा करती है।
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि आपूर्ति से जुड़ी रुकावटों से निपटने के लिए सरकार द्वारा किए गए त्वरित आपूर्ति प्रबंधन से महंगाई के दबाव को काबू में रखने में मदद मिली है।
मार्च में विनिमय दर में तेज गिरावट पर टिप्पणी करते हुए कहा गया कि अस्थायी युद्ध विराम की घोषणा और आरबीआई के उपायों से अप्रैल की शुरुआत में रुपये को कुछ सहारा मिला। मार्च में डॉलर के मुकाबले रुपया 4 फीसदी से ज्यादा नरम हो गया था और यह एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गई थी।
इसके बाद नियामकीय उपायों से इसकी चाल बदल गई। अब जब कुछ पाबंदियां हटा ली गई हैं तो पिछले चार कारोबारी सत्र से रुपये में फिर गिरावट देखी जा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 10 अप्रैल तक विदेशी मुद्रा भंडार संतोषजनक स्तर पर बना रहा। विदेशी मुद्रा भंडार ने लगभग 11 महीनों के आयात और दिसंबर 2025 के अंत तक बकाया बाहरी ऋण का लगभग 92 फीसदी कवर किया।