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वेस्ट एशिया संकट पर RBI का बड़ा बयान, क्या भारत पर पड़ेगा असर या फिर मजबूत है इकोनॉमी?

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वेस्ट एशिया तनाव और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच RBI ने महंगाई और विकास के संतुलन को ध्यान में रखते हुए न्यूट्रल और सतर्क रुख बनाए रखा है।

Last Updated- April 08, 2026 | 3:11 PM IST
Indian Rupee
RBI Governor Sanjay Malhotra (File Photo)

RBI MPC Meet 2026: वेस्ट एशिया में जारी युद्ध के बीच बढ़ते जोखिमों पर भारतीय रिजर्व बैंक ने संतुलित रुख अपनाया है। आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने अप्रैल बैठक में साफ किया कि हालात चुनौतीपूर्ण जरूर हैं, लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था इन झटकों को संभालने की स्थिति में है।

बुधवार को फैसलों का ऐलान करते हुए आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि संघर्ष की तीव्रता और अवधि को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, जिसका असर खासतौर पर तेल कीमतों और सप्लाई पर पड़ सकता है। ऐसे में महंगाई और आर्थिक वृद्धि पर दबाव बढ़ने का खतरा है।

उन्होंने कहा कि मौजूदा स्थिति को एक सप्लाई शॉक के रूप में देखा जा रहा है, इसलिए अभी जल्दबाजी में कोई बड़ा फैसला लेने के बजाय हालात पर नजर रखना ज्यादा जरूरी है। इसी वजह से रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया और मौद्रिक नीति का रुख ‘न्यूट्रल’ रखा गया।

Also Read: RBI MPC 2026: दरें तो नहीं बदलीं, लेकिन क्या अब असली चुनौती शुरू हो गई है?

संजय मल्होत्रा ने यह भी कहा कि भारत की आर्थिक बुनियाद पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत है, जिससे देश अब इस तरह के बाहरी झटकों का सामना बेहतर तरीके से कर सकता है। फिलहाल आरबीआई की रणनीति साफ है कि बदलते हालात पर नजर रखी जाए और उसी हिसाब से आगे के कदम तय किए जाएं।

पश्चिम एशिया संघर्ष से भारत पर सप्लाई शॉक का असर, आरबीआई की चेतावनी

भारतीय रिजर्व बैंक ने वेस्ट एशिया में चल रहे संघर्ष को भारत के लिए एक सप्लाई शॉक के रूप में देखा है। आरबीआई का कहना है कि इस तनाव की वजह से वैश्विक ऊर्जा और कमोडिटी बाजारों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है, जिसका असर अब घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है।

आरबीआई गवर्नर Malhotra, RBI Governor के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल और अन्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ी हुई अस्थिरता का असर भारत में पेट्रोल, एलपीजी और उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले डीजल जैसे ईंधनों की कीमतों पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि यह प्रभाव धीरे-धीरे घरेलू स्तर पर ट्रांसमिट हो रहा है।

गवर्नर ने यह भी संकेत दिया कि अगर हालात ऐसे ही बने रहते हैं और Strait of Hormuz, Middle East के आसपास आपूर्ति बाधित होती है, तो ऊर्जा और अन्य कमोडिटी की ऊंची कीमतें मिलकर 2026-27 में देश के उत्पादन पर दबाव डाल सकती हैं।

हालांकि, आरबीआई ने यह भी माना है कि कुछ कारक घरेलू मांग को मजबूती देते रहेंगे। इनमें सर्विस सेक्टर में लगातार बनी रफ्तार, जीएसटी में किए गए बदलावों का असर, मैन्युफैक्चरिंग में बढ़ती क्षमता का उपयोग और वित्तीय संस्थानों व कंपनियों की मजबूत बैलेंस शीट शामिल हैं। इन वजहों से मौजूदा भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बावजूद घरेलू मांग को सपोर्ट मिलने की उम्मीद है।

ईरान युद्ध और ऊर्जा कीमतों से महंगाई बढ़ने के क्या संभावित जोखिम हैं?

ईरान और ऊर्जा कीमतों को लेकर जारी वैश्विक तनाव अब महंगाई के मोर्चे पर भी असर डाल सकता है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के मुताबिक, अगर कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा स्रोतों की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इससे आने वाले समय में महंगाई बढ़ने का जोखिम बना रहेगा।

RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महंगाई (CPI) का अनुमान 4.6 प्रतिशत रखा है। हालांकि केंद्रीय बैंक ने यह भी संकेत दिया है कि मौजूदा परिस्थितियां इस अनुमान को प्रभावित कर सकती हैं। खासतौर पर अगर ईरान से जुड़े संघर्ष के कारण ऊर्जा आपूर्ति बाधित होती है या कीमतों में तेजी आती है, तो इसका सीधा असर घरेलू बाजारों पर पड़ेगा और महंगाई बढ़ सकती है।

इसके अलावा, अगर अल नीनो जैसी मौसमीय स्थिति बनती है तो मानसून पर असर पड़ सकता है। कमजोर मानसून से कृषि उत्पादन प्रभावित होता है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने लगती हैं। यही कारण है कि मौसम और ऊर्जा दोनों ही कारक महंगाई के लिए जोखिम पैदा कर रहे हैं।

हालांकि, कुछ राहत के संकेत भी हैं। मजबूत रबी फसल की उम्मीद की जा रही है, जिससे आने वाले समय में खाद्य कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। इससे अल्पकाल में महंगाई को कुछ हद तक संतुलित करने में मदद मिल सकती है।

हाल के आंकड़ों के अनुसार, फरवरी में खुदरा महंगाई 3.2 प्रतिशत रही, जो जनवरी के 2.7 प्रतिशत से अधिक है। इसमें मुख्य रूप से बेस इफेक्ट का योगदान रहा, जबकि वास्तविक मांग आधारित दबाव अभी सीमित बना हुआ है। कुल मिलाकर, आने वाले महीनों में महंगाई का रुख काफी हद तक ऊर्जा कीमतों और मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

घरेलू मांग और मैन्युफैक्चरिंग के दम पर अर्थव्यवस्था को मिल रहा सहारा

RBI ने देश की आर्थिक स्थिति को लेकर कहा है कि मौजूदा समय में घरेलू मांग और सरकारी नीतियां मिलकर ग्रोथ के लिए सहारा बन रही हैं। बैंक के अनुसार निजी खपत और निवेश की मजबूती के चलते आर्थिक गतिविधियां अभी भी संतुलित और लचीली बनी हुई हैं।

RBI ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। वहीं, वित्त वर्ष 2026-27 के लिए यह अनुमान 6.9 प्रतिशत रखा गया है। तिमाही आधार पर वृद्धि दर क्रमशः 6.8 प्रतिशत, 6.7 प्रतिशत, 7.0 प्रतिशत और 7.2 प्रतिशत रहने का अनुमान है।

RBI गवर्नर ने कहा कि देश में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बढ़ोतरी आने वाले समय में विकास को गति देने में अहम भूमिका निभा सकती है। खासकर वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच घरेलू उत्पादन क्षमता को मजबूत करना भारत की ग्रोथ को स्थिर बनाए रखने में मदद करेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि केंद्रीय बजट 2026-27 में जिन रणनीतिक और उभरते क्षेत्रों में घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है, उससे देश की आर्थिक दिशा को मजबूती मिलेगी और दीर्घकाल में विकास को सहारा मिलेगा।

आरबीआई क्यों अपना सतर्क और निगरानी वाला रुख बनाए हुए है

RBI ने मौजूदा आर्थिक हालात को देखते हुए अपनी मौद्रिक नीति में सतर्क और निगरानी वाला रुख बनाए रखने का संकेत दिया है। मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने कहा है कि वैश्विक स्तर पर बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं ने महंगाई और विकास के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को और जटिल कर दिया है।

समिति के अनुसार, हालांकि देश में मुख्य मुद्रास्फीति (headline inflation) फिलहाल लक्ष्य के नीचे बनी हुई है और कोर महंगाई के दबाव भी सीमित हैं, लेकिन आगे कई जोखिम बने हुए हैं। इनमें कच्चे तेल और ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव, सप्लाई चेन में संभावित बाधाएं और उनके चलते महंगाई के दोबारा बढ़ने की आशंका शामिल है।

इन्हीं कारणों को ध्यान में रखते हुए RBI फिलहाल कोई जल्दबाजी वाला कदम उठाने के बजाय स्थिति पर नजर बनाए रखना चाहता है। नीति निर्माताओं का मानना है कि मौजूदा समय में आर्थिक वृद्धि को समर्थन देना और महंगाई को नियंत्रण में रखना दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वैश्विक परिस्थितियां इस संतुलन को कठिन बना रही हैं।

अगली मौद्रिक नीति समिति की बैठक 3 जून से 5 जून के बीच निर्धारित है, जिसमें आगे की नीतिगत दिशा पर फैसला लिया जाएगा।

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First Published - April 8, 2026 | 3:11 PM IST

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