इतिहास बताता है कि जब भी दुनिया को बड़ा तेल झटका लगा, उसके बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर मंदी का साया गहरा गया। हालिया SBI रिसर्च की रिपोर्ट में 2007 के दौर का जिक्र करते हुए कहा गया है कि बड़े ऑयल शॉक के बाद अमेरिका में कभी एक महीने के भीतर तो कभी एक साल के अंदर मंदी के हालात बन गए। यही वजह है कि मौजूदा हालात को लेकर भी चिंता बढ़ रही है।
| तेल झटका | अवधि | कीमत में बदलाव | प्रतिशत बदलाव | मंदी की शुरुआत |
|---|---|---|---|---|
| अरब तेल प्रतिबंध | 1973 से 1974 | 3 डॉलर से 12 डॉलर | 300% | नवंबर 1973, एक महीने बाद |
| ईरान के शाह का पतन | फरवरी 1979 | 14 डॉलर से 35 डॉलर | 150% | जनवरी 1980, 11 महीने बाद |
| खाड़ी युद्ध के दौरान तेल उछाल | अगस्त 1990 से जनवरी 1991 | 20 डॉलर से 40 डॉलर | 100% | जुलाई 1990, पहले से मंदी |
| वैश्विक वित्तीय संकट से पहले तेल उछाल | 2007 से 2008 | 70 डॉलर से 147 डॉलर | 110% | दिसंबर 2007, 5 महीने बाद |
| रूस यूक्रेन युद्ध | 2022 | 80 डॉलर से 127 डॉलर | 59% | वैश्विक मंदी घोषित नहीं, लेकिन असर |
| पश्चिम एशिया संकट | 2026 | 70 डॉलर से आगे | – | स्थिति जारी |
स्रोत: होइसिंगटन इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट कंपनी, एसबीआई रिसर्च और ब्लूमबर्ग
रिपोर्ट यह भी साफ करती है कि इस बार हालात पहले जैसे नहीं हैं। पहले के ऑयल शॉक के मुकाबले अब अमेरिका ऊर्जा के मामले में कहीं ज्यादा आत्मनिर्भर है। इतना ही नहीं, वहां के घरों तक टैक्स रिफंड के रूप में भी सहारा पहुंच रहा है। इसलिए इस बार तेल की महंगाई का असर अमेरिका पर पड़ने का तरीका पुरानी घटनाओं से कुछ अलग हो सकता है।
| तेल झटका | अमेरिका में जीडीपी गिरावट | भारत की जीडीपी वृद्धि | वैश्विक जीडीपी पर असर | वैश्विक व्यापार में बदलाव |
|---|---|---|---|---|
| अरब तेल प्रतिबंध | -3% | -0.6% (वित्त वर्ष 1973) | -66 अरब डॉलर (1975) | -12% (1975) |
| ईरान संकट | -2.2% से -2.9% | -5.2% (वित्त वर्ष 1980) | -85 अरब डॉलर (1982) | -3.2% से -5% |
| खाड़ी युद्ध | -2% | 1.1% (वित्त वर्ष 1992) | -30 अरब डॉलर (1991) | -2.5% |
| 2008 संकट से पहले उछाल | -4% | 3.1% (वित्त वर्ष 2009) | -235 अरब डॉलर (2009) | -14.3% |
| रूस यूक्रेन युद्ध | 3% | 9.7% | 279 अरब डॉलर (2022) | -6% |
| पश्चिम एशिया संकट | 2.1% (अनुमान) | 6.5% (अनुमान) | – | 2.6% (अनुमान) |
स्रोत: होइसिंगटन इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट कंपनी, एसबीआई रिसर्च, ब्लूमबर्ग और सेंट लुइस फेडरल रिजर्व बैंक
SBI रिसर्च के मुताबिक, भारत इस वैश्विक भू राजनीतिक संकट में इस बार मजबूरी की नहीं, मजबूती की स्थिति से दाखिल हुआ है। रिपोर्ट बताती है कि वित्त वर्ष 2026 में भारत की वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रही, जो यह दिखाती है कि देश की आर्थिक बुनियाद अभी भी काफी मजबूत है। रिपोर्ट ने रूस यूक्रेन संकट के समय का भी जिक्र किया है, जब भारत 9 प्रतिशत से ज्यादा की दर से बढ़ रहा था। यानी संदेश साफ है कि भारत ऐसे वैश्विक झटकों का सामना पहले भी अपेक्षाकृत मजबूत आर्थिक स्थिति से करता रहा है और इस बार भी उसकी शुरुआती हालत कमजोर नहीं है।
| साल | ब्रेंट क्रूड | डब्ल्यूटीआई क्रूड |
|---|---|---|
| 2024 | 80 | 76 |
| 2025 | 69 | 65 |
| 2026 (अनुमान) | 96 | 87 |
| 2027 (अनुमान) | 76 | 72 |
स्रोत: आईएमएफ का डेटा और उनके अपने आकलन
रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में ब्रेंट क्रूड करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रह सकता है। इसके मुकाबले 2025 में यह सिर्फ 69 डॉलर प्रति बैरल के करीब था। अगर ऐसा होता है तो इसका असर केवल तेल पर ही नहीं, बल्कि महंगाई, चालू खाते, सरकारी खर्च और उद्योगों की लागत पर भी पड़ेगा। ऊर्जा की कीमतें बढ़ने का मतलब है परिवहन महंगा, उत्पादन महंगा और अंत में आम लोगों के लिए सामान महंगा।
| कैटेगरी | विकसित देश | उभरते बाजार | कम आय वाले देश |
|---|---|---|---|
| आयात करने वाले देश (घाटा बढ़ा) | 0.7% | 0.6% | 1.1% |
| निर्यात करने वाले देश (घाटा घटा) | 5.4% | 3.5% | 3.2% |
स्रोत: आईएमएफ का डेटा और उनके अपने आकलन
SBI रिसर्च ने IMF के अप्रैल 2026 के Fiscal Monitor का हवाला देते हुए कहा है कि ऊर्जा कीमतों का झटका दुनिया के सभी देशों पर एक जैसा असर नहीं डालेगा। खासकर कम आय वाले विकासशील देशों की हालत ज्यादा बिगड़ सकती है, क्योंकि उनके पास पहले से ही सीमित वित्तीय गुंजाइश होती है और महंगे ऊर्जा आयात का बोझ सीधे सरकारी वित्त पर पड़ता है। ऐसे देशों में राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है और सरकारी संतुलन तेजी से खराब हो सकता है। इसके उलट, तेल और ऊर्जा निर्यातक देशों की वित्तीय स्थिति आमतौर पर बेहतर होती है, क्योंकि ऊंचे दाम उनके लिए अतिरिक्त कमाई लेकर आते हैं।
रिपोर्ट में युद्ध और तेल के साथ साथ मौसम को भी बड़ा जोखिम बताया गया है। जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले महीनों में एक दुर्लभ और ताकतवर एल नीनो बन सकता है, जिसे अक्सर सुपर एल नीनो कहा जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, 1950 के बाद से ऐसे मजबूत एल नीनो सिर्फ पांच बार ही आए हैं और पिछली बार 2015 से 2016 के दौरान देखा गया था। वैज्ञानिक अब भी पूरी तरह निश्चित नहीं हैं कि इस साल एल नीनो जरूर बनेगा, लेकिन इसकी संभावना लगातार बढ़ रही है। अमेरिकी एजेंसी NOAA ने 9 अप्रैल को 61 प्रतिशत संभावना जताई थी कि एल नीनो बन सकता है, जबकि लगभग 25 प्रतिशत संभावना इस बात की है कि यह मजबूत भी हो सकता है।
SBI रिसर्च की रिपोर्ट बताती है कि एल नीनो का असर पूरी दुनिया में एक जैसा नहीं होता। अटलांटिक क्षेत्र में तूफानों का मौसम अपेक्षाकृत शांत रह सकता है, लेकिन सेंट्रल पैसिफिक में ज्यादा चक्रवात आ सकते हैं। दक्षिण एशिया में गर्मियों का मानसून कमजोर पड़ सकता है, जबकि साल के बाद के महीनों में अमेजन और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। अमेरिका में भी इसका असर अलग अलग इलाकों में अलग रूप से दिख सकता है, जहां दक्षिणी हिस्सों में ज्यादा बारिश और ठंडक, जबकि उत्तरी हिस्सों में सामान्य से ज्यादा गर्मी देखने को मिल सकती है।
रिपोर्ट कहती है कि एल नीनो सिर्फ मौसम की खबर नहीं है, यह खाद्य सुरक्षा का भी बड़ा सवाल बन सकता है। दुनिया पहले ही ईंधन और उर्वरक की बढ़ी कीमतों जैसी समस्याओं से जूझ रही है, और अगर इसके ऊपर मौसम का झटका भी लगता है, तो खाने पीने की चीजों की कीमतों और उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है। यानी युद्ध, महंगा तेल, महंगी खाद और कमजोर मानसून, ये सब मिलकर बड़ी चुनौती खड़ी कर सकते हैं।
रिपोर्ट में फरवरी 2025 की रिसर्च का जिक्र किया गया है, जिसमें कहा गया कि भारत में वसंतकालीन एल नीनो यानी फरवरी से मई के दौरान देश के करीब 30 प्रतिशत हिस्से में सामान्य से औसतन 26 प्रतिशत कम बारिश देखी जाती है। वहीं, अगर गर्मियों का एल नीनो जून से सितंबर के बीच आता है, तो देश के करीब 15 प्रतिशत हिस्से में औसतन 22 प्रतिशत कम बारिश हो सकती है।
रिपोर्ट में 11 दिसंबर 2024 को लोकसभा में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री के लिखित जवाब का भी जिक्र किया गया है। उसमें कहा गया था कि आम तौर पर एल नीनो के दौरान भारत का दक्षिण पश्चिम मानसून सामान्य से कमजोर रहता है और इसका असर इस बात पर भी निर्भर करता है कि एल नीनो कितना तीव्र है। 1950 के बाद 16 एल नीनो वर्ष दर्ज किए गए, जिनमें से 7 वर्षों में भारत में मानसून सामान्य से कम रहा। जवाब में यह भी कहा गया था कि मानसून के दूसरे हिस्से, खासकर सितंबर की बारिश, पर एल नीनो का उल्टा असर ज्यादा मजबूत दिखता है। यानी खतरा केवल शुरुआत में नहीं, बल्कि पूरे मानसून सीजन के आखिरी हिस्से तक रह सकता है।
SBI रिसर्च ने ICRIER के जून 2014 के वर्किंग पेपर 276 का हवाला देते हुए कहा है कि 1950 के बाद भारत में 13 सूखे पड़े, जिनमें से 10 एल नीनो वर्षों में आए और एक ला नीना वर्ष में। रिपोर्ट यह भी मानती है कि एल नीनो और भारतीय सूखे के बीच एकदम सीधा और हर बार एक जैसा संबंध नहीं है। यानी हर एल नीनो का मतलब सूखा नहीं होता। लेकिन 1980 के बाद यह रिश्ता ज्यादा मजबूत दिखाई देता है। खास तौर पर 21वीं सदी में इसका प्रभाव और स्पष्ट हुआ है। पिछले 14 वर्षों में दुनिया में आए 4 एल नीनो में से 3 के दौरान भारत में सूखे जैसी स्थिति बनी। इसका मतलब है कि खतरा पहले से ज्यादा गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
रिपोर्ट की एक अहम बात यह भी है कि भारतीय कृषि की संरचना अब पहले जैसी नहीं रही। कृषि सकल मूल्य वर्धन यानी Agri GVA में सहायक गतिविधियों का हिस्सा लगातार बढ़ा है। यह हिस्सा वित्त वर्ष 2012 के 35 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2024 तक करीब 46 प्रतिशत हो गया है। इसके अलावा बागवानी उत्पादन में भी अच्छी बढ़त हुई है। इसका मतलब यह है कि भारतीय कृषि अब केवल पारंपरिक फसलों पर उतनी निर्भर नहीं रही, बल्कि डेयरी, पशुपालन, बागवानी और दूसरी गतिविधियों का योगदान बढ़ा है। यही वजह है कि रिपोर्ट मानती है कि एल नीनो का असर अब पहले के मुकाबले कुछ हद तक सीमित रह सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि SBI रिसर्च ने क्वांटाइल रिग्रेशन मॉडल और एक ऑगमेंटेड मॉडल की मदद से एल नीनो और सूखे के असर का आकलन किया। नतीजों में सामने आया कि केवल एल नीनो अपने आप में भारत की जीडीपी वृद्धि पर बहुत मामूली या लगभग जीरोके बराबर असर डालता है। यानी सिर्फ एल नीनो होने भर से वृद्धि दर में भारी गिरावट जरूरी नहीं है। लेकिन अगर एल नीनो के साथ सूखा भी जुड़ जाए, तो तस्वीर बदल जाती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, एल नीनो और सूखा दोनों एक साथ होने पर जीडीपी वृद्धि पर औसतन करीब 20 बेसिस पॉइंट का असर पड़ सकता है। वहीं, अगर हालात बहुत खराब बने, तो चरम स्थिति में यह असर करीब 65 बेसिस पॉइंट तक जा सकता है। इसका मतलब है कि मौसम का असर सीमित भी रह सकता है, लेकिन खराब परिस्थिति में यह आर्थिक वृद्धि को साफ तौर पर नीचे खींच सकता है।