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Trade Deficit: निर्यात, तेल और अमेरिका से डील… FY27 में भारत की ट्रेड तस्वीर बदल सकते हैं ये 3 फैक्टर

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निर्यात में तेजी, अमेरिका के साथ संभावित व्यापार समझौता और कच्चे तेल की कीमतें; FY27 में भारत की ट्रेड तस्वीर बदल सकते हैं ये तीन बड़े फैक्टर

Last Updated- June 16, 2026 | 11:35 AM IST
Trade Deficit

Trade Deficit: भारत का व्यापार घाटा मई में थोड़ा कम हुआ है, लेकिन पिछले साल के मुकाबले यह अब भी काफी ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। आसान भाषा में समझें तो भारत ने मई में जितना सामान विदेशों को बेचा, उससे ज्यादा सामान बाहर से खरीदा। इसी अंतर को व्यापार घाटा कहा जाता है। मई में यह घाटा घटकर 28.2 अरब डॉलर रहा, जबकि अप्रैल में यह 28.4 अरब डॉलर था। हालांकि, पिछले साल मई में यह 21.9 अरब डॉलर था। यानी सालाना आधार पर घाटा अब भी ज्यादा है।

निर्यात में अच्छी बढ़ोतरी

मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट के मुताबिक मई में भारत का सामान निर्यात मजबूत रहा। मई में भारत ने 45.2 अरब डॉलर का सामान विदेशों को बेचा, जो पिछले साल के मुकाबले 18 फीसदी ज्यादा है। यह पिछले 6 महीने का सबसे ऊंचा स्तर भी है। निर्यात बढ़ाने में पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स, इंजीनियरिंग गुड्स, केमिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक सामान, जेम्स एंड ज्वेलरी और दवाओं की अहम भूमिका रही।

रिपोर्ट के अनुसार भारत का नॉन-पेट्रोलियम निर्यात भी अच्छा रहा। मई में नॉन-पेट्रोलियम निर्यात 36.8 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल 32.9 अरब डॉलर था। इसका मतलब है कि निर्यात की ग्रोथ सिर्फ पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की वजह से नहीं आई, बल्कि भारत की मुख्य निर्यात टोकरी भी मजबूत प्रदर्शन कर रही है। नॉन-पेट्रोलियम और नॉन-जेम्स एंड ज्वेलरी निर्यात भी बढ़कर 34.2 अरब डॉलर पर पहुंच गया।

मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट में कहा गया है कि सर्विसेज एक्सपोर्ट भी मजबूत बना हुआ है। मई में भारत का सर्विसेज एक्सपोर्ट बढ़कर 36.8 अरब डॉलर हो गया, जबकि एक साल पहले यह 32.5 अरब डॉलर था। सर्विसेज ट्रेड सरप्लस करीब 17.7 अरब डॉलर रहा। इससे सामान व्यापार घाटे के दबाव को कम करने में मदद मिल रही है और चालू खाते की स्थिति को सहारा मिल रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम एशिया में तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़ी दिक्कतों के बावजूद इस क्षेत्र को भारत का निर्यात लगभग स्थिर रहा। मई में पश्चिम एशिया को भारत का निर्यात 5.3 अरब डॉलर रहा, जबकि पिछले साल यह 5.4 अरब डॉलर था। ओमान के बंदरगाहों के जरिए वैकल्पिक रूट का इस्तेमाल करने से व्यापार पर बड़ा असर नहीं पड़ा।

Trade Deficit: आयात में भी तेज बढ़ोतरी

मई में भारत का सामान आयात बढ़कर 73.4 अरब डॉलर हो गया, जबकि पिछले साल मई में यह 60.9 अरब डॉलर था। यानी आयात में सालाना आधार पर 20.6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। इसकी सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल और कमोडिटी की ऊंची कीमतें रहीं। अप्रैल के मुकाबले आयात में करीब 2 फीसदी की मामूली बढ़ोतरी हुई।

कच्चा तेल और सोना बढ़ा रहे दबाव

मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट के अनुसार मई में कच्चे तेल और उससे जुड़े उत्पादों का आयात 54 फीसदी बढ़कर 22.7 अरब डॉलर पर पहुंच गया। इसकी वजह ग्लोबल मार्केट में तेल की ऊंची कीमतें और देश में ऊर्जा की मांग रही। वहीं सोने का आयात भी 34 फीसदी बढ़कर 3.4 अरब डॉलर रहा। हालांकि अप्रैल में सोने का आयात 5.6 अरब डॉलर था, इसलिए महीने-दर-महीने आधार पर इसमें कमी आई है।

Trade Deficit: घरेलू मांग भी मजबूत

रिपोर्ट के मुताबिक नॉन-ऑयल और नॉन-गोल्ड आयात मई में 47.3 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 8.6 फीसदी ज्यादा है। इससे संकेत मिलता है कि देश में घरेलू मांग मजबूत बनी हुई है। यानी तेल और सोने को अलग कर दें, तब भी आयात में बढ़ोतरी दिख रही है।

मोतीलाल ओसवाल का मानना है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच हालिया समझौते से तनाव कम होता है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फिर से सामान्य तरीके से खुलता है, तो भारत को राहत मिल सकती है। इससे कच्चे तेल की कीमतें, माल ढुलाई खर्च और बीमा लागत कम हो सकती है। इसका असर आयात बिल पर पड़ेगा और व्यापार घाटा कम हो सकता है।

Trade Deficit: अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर नजर

रिपोर्ट के मुताबिक भारत और अमेरिका के बीच व्यापार बातचीत आगे बढ़ना भी भारत के लिए सकारात्मक हो सकता है। अगर जुलाई के मध्य तक अंतरिम व्यापार समझौता होता है, तो भारतीय सामानों को अमेरिकी बाजार में बेहतर पहुंच मिल सकती है। इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग गुड्स, दवाओं और सर्विसेज एक्सपोर्ट में मजबूती जारी रहने से वित्त वर्ष 2027 तक निर्यात को सहारा मिल सकता है।

हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बाहरी जोखिम अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। अगर पश्चिम एशिया में तनाव फिर बढ़ता है, अमेरिका के साथ व्यापार बातचीत में देरी होती है या कच्चे तेल और कमोडिटी की कीमतें फिर चढ़ती हैं, तो भारत का व्यापार घाटा और बढ़ सकता है। मजबूत सर्विसेज एक्सपोर्ट और विदेशों से आने वाली रकम यानी रेमिटेंस भारत को सहारा देते रहेंगे, लेकिन वित्त वर्ष 2027 में भारत के बाहरी संतुलन के लिए कच्चे तेल की कीमतें सबसे अहम रहेंगी।

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First Published - June 16, 2026 | 11:35 AM IST

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