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युद्ध का सीधा असर भारत पर! Moody’s ने घटाई GDP ग्रोथ, 6% पर पहुंचा अनुमान; महंगाई बढ़ने की चेतावनी

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पश्चिम एशिया के तनाव और महंगे आयात के कारण भारत की आर्थिक वृद्धि धीमी पड़ने और महंगाई बढ़ने की आशंका है।

Last Updated- April 05, 2026 | 1:16 PM IST
Moody's
Representative image

रेटिंग एजेंसी मूडीज (Moody’s) ने चालू वित्त वर्ष के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया है। पहले यह अनुमान 6.8 प्रतिशत था। एजेंसी का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है, जिससे विकास की रफ्तार धीमी हो सकती है और महंगाई बढ़ने का खतरा है।

मूडीज की रिपोर्ट के अनुसार, अगर यह तनाव लंबा खिंचता है तो खासतौर पर एलपीजी की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। इससे घरों में गैस की कमी, ईंधन और परिवहन खर्च में बढ़ोतरी हो सकती है। इसका असर खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर भी पड़ेगा, क्योंकि भारत उर्वरकों के लिए आयात पर काफी निर्भर है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत अपनी जरूरत का करीब 55 प्रतिशत कच्चा तेल और 90 प्रतिशत से ज्यादा एलपीजी पश्चिम एशिया से आयात करता है। ऐसे में वहां की स्थिति का सीधा असर देश पर पड़ता है।

मूडीज ने यह भी कहा कि फिलहाल महंगाई काबू में है, लेकिन वैश्विक हालात के कारण इसमें बढ़ोतरी का जोखिम बढ़ गया है। एजेंसी ने अनुमान जताया है कि वित्त वर्ष 2027 में औसत महंगाई दर 4.8 प्रतिशत रह सकती है, जो 2026 में 2.4 प्रतिशत थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, अगर महंगाई बढ़ती है और अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रहती है तो आने वाले समय में ब्याज दरों को स्थिर रखा जा सकता है या जरूरत पड़ने पर धीरे-धीरे बढ़ाया भी जा सकता है। यह फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि वैश्विक तनाव कितने समय तक बना रहता है और उसका असर ईंधन व खाद्य कीमतों पर कितना पड़ता है।

मध्य पूर्व में जारी सैन्य तनाव का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता दिख रहा है। अलग अलग रिपोर्ट्स में अनुमान लगाया गया है कि आने वाले समय में देश की आर्थिक वृद्धि दर कुछ धीमी हो सकती है।

Moody’s की 31 मार्च की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.8 प्रतिशत से घटकर करीब 6 प्रतिशत रह सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि महंगाई और बढ़ती लागत के कारण निजी खपत कमजोर हो सकती है। इसके साथ ही औद्योगिक गतिविधियों में नरमी और निवेश की रफ्तार में भी कमी देखने को मिल सकती है।

वहीं, Organisation for Economic Co-operation and Development ने भी अपने आकलन में कहा है कि चालू वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत से घटकर 6.1 प्रतिशत तक आ सकती है।

EY की इकोनॉमी वॉच रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर पश्चिम एशिया का तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वृद्धि दर में करीब 1 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। साथ ही खुदरा महंगाई दर में करीब 1.5 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती है।

घरेलू रेटिंग एजेंसी ICRA का भी मानना है कि महंगे ऊर्जा दाम और सप्लाई को लेकर चिंता के चलते FY27 में विकास दर घटकर करीब 6.5 प्रतिशत रह सकती है।

हालांकि, रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि सरकार का इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार जोर और व्यापार से जुड़ी बाधाओं में धीरे धीरे ढील निवेश को कुछ हद तक सहारा देती रहेगी।

भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़ी ताजा रिपोर्ट में अच्छी और चुनौतीपूर्ण दोनों तरह की तस्वीर सामने आई है।

रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.5 प्रतिशत रही, जो 2024 के 7.2 प्रतिशत से ज्यादा है। यह दर G-20 देशों में सबसे ऊंची मानी जा रही है। इस तेजी के पीछे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में मजबूत सुधार को मुख्य वजह बताया गया है।

हालांकि, वैश्विक हालात भारत के लिए चिंता बढ़ा रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि कच्चे तेल, गैस और खाद की कीमतें ऊंची बनी रहने से सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा। इससे सरकारी खर्च बढ़ेगा और राजस्व पर भी दबाव पड़ेगा।

बताया गया है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में करीब 50 प्रतिशत तक उछाल आया है। इसका असर भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों पर साफ दिख रहा है।

सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में की गई कटौती से भी टैक्स वसूली पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है। इसके साथ ही महंगे कच्चे माल के कारण लोगों का खर्च कम हो रहा है और कंपनियों का मुनाफा भी दबाव में है। इससे जीएसटी और कॉरपोरेट टैक्स से मिलने वाली आय पर असर पड़ सकता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बढ़ते खर्च और कमजोर राजस्व के कारण सरकार के लिए वित्तीय घाटा कम करने की रफ्तार धीमी पड़ सकती है, जब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते।

वहीं, सरकार का लक्ष्य है कि 2030-31 तक केंद्रीय कर्ज को घटाकर जीडीपी के करीब 50 प्रतिशत तक लाया जाए, जो फिलहाल 2024-25 में लगभग 57 प्रतिशत है। इस दिशा में धीरे-धीरे सुधार की उम्मीद जताई गई है।

बाहरी मोर्चे पर स्थिति कुछ हद तक संतुलित दिख रही है। 2025 में चालू खाता घाटा घटकर करीब 0.4 प्रतिशत रहा, जो पिछले साल 0.9 प्रतिशत था। अनुमान है कि 2026 और 2027 में यह 1 से 1.5 प्रतिशत के बीच रह सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, निर्यात में धीरे-धीरे बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन कच्चे तेल और कच्चे माल के आयात ज्यादा रहने से इसका असर संतुलित हो रहा है।

रेटिंग एजेंसी का कहना है कि भारत के वस्तु और सेवा निर्यात फिलहाल लगभग स्थिर रह सकते हैं। वहीं, पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और वैश्विक स्तर पर बढ़ती कमोडिटी कीमतों के कारण आयात बढ़ने की संभावना है। इससे देश का चालू खाता घाटा बढ़ सकता है।

एजेंसी के मुताबिक, भारत को अब उर्वरक और गैस जैसी जरूरी चीजों के लिए दूसरे विकल्प तलाशने पड़ सकते हैं, जो पहले से महंगे हो सकते हैं। इससे आयात पर खर्च और बढ़ेगा।

पश्चिम एशिया भारत के कृषि उत्पादों के लिए एक बड़ा बाजार है। वहां व्यापार में रुकावट आने से भारतीय उत्पादों की मांग प्रभावित हो सकती है। इसका असर भी चालू खाता घाटे पर पड़ेगा।

इसके अलावा, विदेश से आने वाले पैसे यानी रेमिटेंस को लेकर भी चिंता जताई गई है। कुल रेमिटेंस का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी देशों से आता है, ऐसे में वहां की स्थिति बिगड़ने पर भारत पर असर पड़ सकता है।

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First Published - April 5, 2026 | 1:03 PM IST

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