उत्तर भारत के मैदानी इलाकों से लेकर मध्य भारत के पठारों और राजस्थान के रेगिस्तान तक, आसमान से बरसती आग अब सिर्फ मौसम का मिजाज नहीं रह गई है। यह भारत की अर्थव्यवस्था के पहियों को जाम करने वाली एक बड़ी मार बन चुकी है। लगातार आते भीषण हीटवेव (लू) के थपेड़ों ने देश में काम करने वाले मजदूरों की क्षमता को तोड़ा है, बिजली ग्रिडों पर दबाव बढ़ाया है और अस्पतालों में मरीजों की लाइनें लंबी कर दी हैं।
चुनौती सिर्फ बदलता मौसम नहीं है, बल्कि इस चुनौती से निपटने के लिए मिलने वाला पैसा है। एक तरफ भारत जैसे विकासशील देशों पर जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) का सबसे सीधा और घातक असर हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ इस संकट से बचने के लिए जो ‘क्लाइमेट फाइनेंस’ (जलवायु कोष) मिलना चाहिए, वह इतना महंगा है कि गरीब और विकासशील देशों की पहुंच से बाहर होता जा रहा है। दुनिया के इस विरोधाभास ने एक अजीब स्थिति पैदा कर दी है, जो देश मौसम की मार से सबसे ज्यादा टूटे हैं, उन्हें ही खुद को बचाने के लिए सबसे महंगी कीमत चुकानी पड़ रही है।
विकासशील देशों को उम्मीद थी कि अमीर देश इस संकट की घड़ी में उनकी आर्थिक मदद करेंगे, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। वैश्विक स्तर पर मिलने वाला क्लाइमेट फाइनेंस अब राहत देने के बजाय विकासशील देशों को कर्ज के दलदल में धकेल रहा है। अक्टूबर 2025 में आई ऑक्सफैम और केयर क्लाइमेट जस्टिस सेंटर की एक साझा रिपोर्ट चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, विकासशील देशों को क्लाइमेट फाइनेंस के रूप में मिलने वाले हर 5 डॉलर के बदले 7 डॉलर कर्ज की किस्तों और ब्याज के रूप में वापस चुकाने पड़ रहे हैं।
आज की तारीख में दुनिया भर के क्लाइमेट फाइनेंस का लगभग दो-तिहाई हिस्सा (65 फीसदी) बिना किसी छूट या रियायत के, सामान्य ब्याज दरों पर दिए जाने वाले लोन के रूप में आ रहा है। इसे अमीर देशों की ‘क्राइसिस प्रॉफिटियरिंग’ यानी आपदा में मुनाफाखोरी कहा जा रहा है। इस रवैये ने ग्लोबल साउथ (विकासशील और गरीब देशों) पर कर्ज का बोझ बढ़ाकर 3.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचा दिया है।
अगर आंकड़ों को और गहराई से समझें, तो अकेले साल 2022 में विकासशील देशों को क्लाइमेट एक्शन के नाम पर 62 अरब डॉलर का कर्ज दिया गया, लेकिन इसके बदले उन्हें 88 अरब डॉलर वापस करने हैं। यानी कर्ज देने वाले अमीर देशों को सीधे-सीधे 42 फीसदी का ‘मुनाफा’ हो रहा है।
अमीर देश दावा करते हैं कि उन्होंने 2022 में 116 अरब डॉलर की मदद पहुंचाई, लेकिन रिपोर्ट कहती है कि इसकी जमीनी और वास्तविक कीमत महज 28 से 35 अरब डॉलर ही थी, जो कि उनके बड़े-बड़े वादों के एक तिहाई हिस्से से भी कम है।
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विकासशील देशों को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार में हमेशा ‘जोखिम भरा’ माना जाता है। इसी धारणा की वजह से इन देशों के लिए कर्ज लेना बेहद महंगा हो जाता है। साफ-सुथरी ऊर्जा (क्लीन एनर्जी) के क्षेत्र में यह अंतर साफ दिखाई देता है।
सेंटर फॉर साइंसेज एंड एनवायरनमेंट (CSE) की डिप्टी प्रोग्राम मैनेजर सेहर रहेजा के अनुसार, उभरते बाजारों और विकासशील देशों के बीच भारत में ग्रिड-स्तरीय रिन्यूएबल एनर्जी (नवीकरणीय ऊर्जा) प्रोजेक्ट्स के लिए पूंजी की लागत भले ही सबसे कम हो, लेकिन फिर भी यह विकसित और अमीर देशों की तुलना में करीब 80 फीसदी ज्यादा है।
उदाहरण के लिए, अमेरिका या जर्मनी जैसे देशों में अगर कोई ग्रीन प्रोजेक्ट शुरू होता है, तो उन्हें महज 3 से 5 फीसदी की ब्याज दर पर कर्ज मिल जाता है। इसके विपरीत, भारत में उसी तरह के प्रोजेक्ट के लिए कंपनियों और सरकार को 11 फीसदी से भी ज्यादा की दर पर लोन उठाना पड़ता है। वहीं, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका और जाम्बिया जैसे देशों में, जिनकी क्रेडिट रेटिंग और कमजोर है, यह दरें आसमान छू रही हैं।
संयुक्त राष्ट्र की ‘फाइनेंसिंग फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट रिपोर्ट 2024’ भी इस बात की तस्दीक करती है कि विकासशील देश अपने सरकारी कर्ज (सोवरेन डेट) पर अमीर देशों की तुलना में दोगुना ब्याज दे रहे हैं। भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था के बावजूद उसकी कम सोवरेन क्रेडिट रेटिंग इस कर्ज को महंगा बनाती है। हालांकि, भारत सरकार ने गारंटियों और बिजली खरीद समझौतों (PPA) के जरिए इस जोखिम को कम करने की कोशिश की है, लेकिन ये प्रयास वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की गहरी और पुरानी असमानताओं को अकेले नहीं बदल सकते।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के दो तरीके होते हैं, पहला ‘मिटिगेशन’ (जैसे सोलर पैनल लगाना ताकि प्रदूषण कम हो) और दूसरा ‘एडॉप्टेशन’ (जैसे गर्मी से बचने के लिए बुनियादी ढांचा बनाना, पानी की सुरक्षा और खेती को मौसम के अनुकूल ढालना)। निवेशकों का पूरा ध्यान मिटिगेशन पर रहता है क्योंकि वहां निवेश के बाद तुरंत मुनाफा या रिटर्न दिखने लगता है। यही वजह है कि कुल क्लाइमेट फाइनेंस का सिर्फ 33 फीसदी हिस्सा ही एडॉप्टेशन प्रोजेक्ट्स को मिल पा रहा है। इसका खामियाजा भारत को भुगतना पड़ रहा है, क्योंकि उसे इस समय सबसे ज्यादा जरूरत हीटवेव से निपटने, पानी बचाने और खेती को बचाने की है, जिसके लिए पैसा ही नहीं मिल रहा।
भारत के राज्यों के स्तर पर देखें तो जरूरतें बहुत बड़ी हैं। क्लाइमेट पॉलिसी इनिशिएटिव के मई 2026 की एक स्टडी के मुताबिक, भारत के सिर्फ छह राज्यों को 2021 से 2030 के बीच एडॉप्टेशन के लिए हर साल 444.7 अरब रुपये की जरूरत है। लेकिन सच्चाई यह है कि आर्थिक सुस्ती और कोविड-19 महामारी की मार के बाद से राज्य सरकारों के अपने खजाने खाली हैं। इसके ऊपर से कर्ज लेने के नए कड़े नियम और पुराने कर्ज को कम करने के दबाव ने राज्यों के हाथ बांध दिए हैं, जिससे वे चाहकर भी इस गैप को नहीं भर पा रहे हैं।
वैश्विक स्तर पर भी हालात बदतर हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की एडॉप्टेशन गैप रिपोर्ट 2024 के अनुसार, विकासशील देशों को मिलने वाला अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक एडॉप्टेशन फंड 2021 के 22 अरब डॉलर से बढ़कर 2022 में 28 अरब डॉलर तो हुआ, लेकिन सालाना जरूरत 187 अरब से 359 अरब डॉलर के बीच है। अगर ग्लासगो सम्मेलन के वादे के मुताबिक 2025 तक इस फंड को दोगुना भी कर दिया जाए, तब भी जरूरत का सिर्फ 5 फीसदी हिस्सा ही पूरा हो पाएगा। सबसे गरीब देशों को इस सार्वजनिक फंड का केवल 19.5 फीसदी और छोटे द्वीपीय देशों को महज 2.9 फीसदी हिस्सा मिला, और वह भी ज्यादातर लोन की शक्ल में था।
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अब भीषण गर्मी पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि सीधे देश की GDP से जुड़ा आर्थिक संकट बन चुकी है। लंबी और जानलेवा लू के कारण लोग खेतों और फैक्ट्रियों में काम नहीं कर पा रहे हैं, फसलों का उत्पादन घट रहा है, कूलिंग (एसी-कूलर) के लिए बिजली की मांग रिकॉर्ड तोड़ रही है और लोग बीमार पड़ रहे हैं।
काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) के फेलो डॉ. विश्वास चितले के अनुसार, मजबूत अल नीनो के कारण बनने वाले हीटवेव के हालात साल 2026 में भारत की GDP में से 2.5 फीसदी तक की कटौती कर सकते हैं।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि गर्मी से होने वाला यह आर्थिक नुकसान अब अस्थायी नहीं रहा, बल्कि यह देश के आर्थिक ढांचे का हिस्सा बनता जा रहा है। मैकिन्से एंड कंपनी के अनुमानों का हवाला देते हुए सीएसई (CSE) की प्रोग्राम मैनेजर (सस्टेनेबल हैबिटैट प्रोग्राम) मिताशी सिंह बताती हैं कि इस दशक के अंत तक गर्मी के कारण होने वाले प्रोडक्टिविटी लॉस (उत्पादकता का नुकसान) की वजह से भारत को अपनी GDP का 4.5 फीसदी तक यानी लगभग 150 से 250 अरब डॉलर का भारी-भरकम नुकसान उठाना पड़ सकता है।
सबसे ज्यादा चिंता श्रम उत्पादकता (लेबर प्रोडक्टिविटी) को लेकर है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की रिपोर्ट ‘वर्किंग ऑन अ वार्मर प्लैनेट’ बताती है कि भारत ने केवल 2023 में अत्यधिक गर्मी के कारण 181 अरब संभावित कामकाजी घंटे खो दिए। इस वजह से देश को 141 अरब डॉलर की आय का नुकसान हुआ, जिसमें से 71.9 अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान अकेले कृषि क्षेत्र को हुआ।
डॉ. चितले कहते हैं कि जब इतने बड़े पैमाने पर कामकाजी घंटे बर्बाद होते हैं, तो वे देश की आर्थिक तरक्की को सीधे रोक देते हैं। तापमान में हर 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी के साथ औद्योगिक उत्पादकता में 2 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान है, जो भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ा झटका है।
भारत के शहरों के पास इस समय इतनी वित्तीय ताकत नहीं है कि वे भीषण गर्मी से निपटने के लिए खुद बुनियादी ढांचा तैयार कर सकें। शहरी क्लाइमेट फाइनेंस आज भी पूरी तरह से केंद्र और राज्य सरकारों से मिलने वाले अनुदान (ग्रांट्स) पर टिका हुआ है। डॉ. विश्वास चितले के मुताबिक, उभरते बाजारों और विकासशील देशों के शहरों को 2030 तक हर साल एडॉप्टेशन के लिए 147 अरब डॉलर की जरूरत है। दुनिया के सबसे ज्यादा गर्मी झेलने वाले शहरों और आबादी के लिए यह आंकड़ा सिर्फ एक कमी नहीं दिखाता, बल्कि यह साफ इशारा है कि शहरों के लिए क्लाइमेट फाइनेंस के पूरे मॉडल को अब नए सिरे से बदलने का समय आ गया है।
हालांकि, नीतिगत मोर्चे पर कुछ बड़े कदम उठाए जा रहे हैं। 16वें वित्त आयोग ने सिफारिश की है कि हीटवेव को अब ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित किया जाए। इस एक कदम से राज्यों के लिए साल 2026 से 2031 के बीच शमन कोष (मिटिगेशन फंड्स) से करीब 40,000 करोड़ रुपये का रास्ता साफ हो सकता है।
इसके साथ ही, भारत ने साल 2019 में ही ‘इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान’ (ICAP) लॉन्च किया था, जिसका खाका साल 2037-38 तक की जरूरतों को ध्यान में रखकर खींचा गया है। इसका मकसद कूलिंग की मांग को कम करना, ऊर्जा दक्षता (एनर्जी एफिशिएंसी) बढ़ाना, पर्यावरण के अनुकूल रेफ्रिजरेंट्स का इस्तेमाल करना और हर सेक्टर में आधुनिक तकनीकों को पहुंचाना है।
लेकिन यहां भी घूम-फिरकर बात पैसे पर ही आकर अटक जाती है। विश्व बैंक के एक विश्लेषण के मुताबिक, भारत के कूलिंग सेक्टर में निवेश के बड़े मौके मौजूद हैं, लेकिन भारी पूंजी लागत (हाई कैपिटल कॉस्ट) के कारण वे मौके जमीन पर नहीं उतर पा रहे हैं। जब तक देश को आसान और किफायती दरों पर फाइनेंस नहीं मिलेगा, तब तक बड़े पैमाने पर एनर्जी-एफिशिएंट कूलिंग सिस्टम, गर्मी झेलने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर और समय पर चेतावनी देने वाले अर्ली वार्निंग नेटवर्क्स को पूरे देश में लागू करना एक बेहद कठिन चुनौती बना रहेगा।