March 2026 WPI inflation India: भारत में थोक कीमतें मार्च महीने में सालाना आधार पर 3.88 प्रतिशत बढ़ गईं, जो तीन साल से ज्यादा समय में सबसे तेज बढ़ोतरी है। सरकार की तरफ जारी आंकड़ों के अनुसार, तेल, खाने-पीने की चीजों और मैन्युफैक्चर्ड सामान की कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से मार्च के दौरान महंगाई बढ़ी है। यह आंकड़ा फरवरी के 2.13 प्रतिशत से ज्यादा है और अर्थशास्त्रियों के 3.04 प्रतिशत के अनुमान से भी ऊपर रहा। थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित महंगाई दर पिछले महीने 2.13 प्रतिशत थी, जबकि पिछले साल मार्च में यह 2.25 प्रतिशत रही थी।
उद्योग मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि मार्च 2026 में महंगाई की सकारात्मक दर मुख्य रूप से कच्चे पेट्रोलियम और नैचुरल गैस, अन्य मैन्युफैक्चर्ड उत्पादों, गैर-खाद्य वस्तुओं, बेसिक मेटल्स और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण रही है।
डब्ल्यूपीआई के आंकड़ों के अनुसार, ईंधन और बिजली श्रेणी में महंगाई फरवरी के -3.78 प्रतिशत से बढ़कर मार्च में 1.05 प्रतिशत हो गई। कच्चे पेट्रोलियम में महंगाई मार्च में तेजी से बढ़कर 51.57 प्रतिशत हो गई, जबकि फरवरी में इसमें 1.29 प्रतिशत की गिरावट थी।
मैन्युफैक्चर्ड उत्पादों में महंगाई मार्च में बढ़कर 3.39 प्रतिशत हो गई, जो फरवरी में 2.92 प्रतिशत थी। हालांकि, खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी की रफ्तार कुछ धीमी हुई और यह मार्च में 1.90 प्रतिशत रही, जो फरवरी में 2.19 प्रतिशत थी। सब्जियों के मामले में महंगाई मार्च में घटकर 1.45 प्रतिशत रह गई, जबकि फरवरी में यह 4.73 प्रतिशत थी।
अमेरिका-इजराइल के ईरान पर हमले के बाद पश्चिम एशिया में जारी संकट के चलते वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। 28 फरवरी से शुरू हुए इस संकट के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हो चुकी है। सरकार ने 26 मार्च को पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी, ताकि तेल कंपनियां बढ़ी हुई कच्चे तेल की कीमतों का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर न डालें।
खाद्य वस्तुओं और ईंधन की कीमतों में तेजी के कारण देश में खुदरा महंगाई दर मार्च में बढ़कर 3.4 प्रतिशत हो गई, जो फरवरी में 3.21 प्रतिशत थी। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) की ओर से सोमवार को जारी आंकड़ों से यह पता चलता है।
मार्च में आए आंकड़े अद्यतन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) श्रृंखला के तीसरे आंकड़े हैं। अगर एनएसओ द्वारा जारी पिछली श्रृंखला के आंकड़ों से तुलना की जाए तो महंगाई दर 13 महीने के उच्च स्तर पर है। इलके पहले मार्च 2025 में महंगाई दर इससे अधिक 3.56 प्रतिशत पर थी।
केयरएज रेटिंग्स की चीफ इकोनॉमिस्ट रजनी सिन्हा का कहना है कि भारत की थोक महंगाई (WPI) मार्च में बढ़कर 3.9% हो गई, जो अनुमान से ज्यादा है। पूरे साल का औसत 0.7% रहा। इसमें सबसे ज्यादा बढ़ोतरी प्राइमरी आर्टिकल्स में 6.4% की रही, इसके बाद मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स 3.4% और फ्यूल व पावर 1.1% तक बढ़े।
उनका कहना है कि महंगाई के आंकड़ों से साफ है कि पश्चिम एशिया संकट का असर ज्यादा दिखाई दे रहा है। फरवरी के मुकाबले इसमें 1.7 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई, जबकि रिटेल महंगाई (CPI) में सिर्फ 0.2 प्रतिशत अंक की हल्की बढ़ोतरी हुई थी। यह अंतर इसलिए है क्योंकि थोक स्तर पर डीजल और अन्य कमर्शियल ईंधन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई, जबकि पेट्रोल और डीजल की रिटेल कीमतें स्थिर रहीं। रिफाइनरियों ने मार्च में डीजल की थोक कीमतों में 25% से ज्यादा की बढ़ोतरी की। इसी तरह घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत 60 रुपये बढ़ी, जबकि कमर्शियल सिलेंडर में कुल मिलाकर 310 रुपये की बड़ी बढ़ोतरी हुई।
रजनी सिन्हा के मुताबिक, थोक महंगाई दर में यह तेज बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि आगे चलकर इसका असर रिटेल महंगाई पर भी पड़ सकता है। पश्चिम एशिया संकट जल्दी खत्म हो जाए, तब भी FY27 में कच्चे तेल की औसत कीमत 85 से 90 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहने की संभावना है। महंगे तेल का बोझ घरों, सरकार और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के बीच बांटा जाएगा। अभी तक OMCs को बेहतर रिफाइनिंग मार्जिन का फायदा मिला है और अनुमान है कि वे 100-105 डॉलर प्रति बैरल तक के ब्रेंट क्रूड को संभाल सकती हैं। हालांकि, रिटेल उपभोक्ताओं पर इसका सीधा असर सीमित रहेगा, लेकिन इनपुट लागत बढ़ने से अप्रत्यक्ष असर जरूर पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि इसके अलावा, इस साल अल-नीनो की संभावना भी ज्यादा है, जिससे खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा है। हमारा अनुमान है कि FY27 में WPI महंगाई औसतन 5% के आसपास रह सकती है, अगर ब्रेंट क्रूड की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल रहती है। नीतिगत स्तर पर, उम्मीद है कि RBI ब्याज दरों में फिलहाल कोई बदलाव नहीं करेगा। विकास से जुड़ी चिंताओं के चलते RBI जल्दबाजी में रेट साइकिल नहीं बदलेगा। हालांकि, अगर ग्रोथ उम्मीद से काफी कम होती है, तो वित्त वर्ष के अंत में दरों में कटौती की संभावना पर विचार किया जा सकता है।