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सिनेमा से सियासत का सफर: क्या MGR की तरह एक दशक तक राज करेंगे ‘थलपति’? 59 साल बाद टूटा द्रविड़ दलों का तिलस्म

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अभिनेता विजय की जीत ने एमजीआर के सुनहरे दौर की यादें ताजा कर दी हैं। 59 वर्षों में पहली बार किसी गैर-द्रविड़ पार्टी ने तमिलनाडु की सत्ता पर कब्जा जमाया है

Last Updated- May 04, 2026 | 11:23 PM IST
thalapathy vijay
थलापति 'विजय'

चुनाव से पहले अभिनेता विजय ने तमिलनाडु में चल रही हलचल को ‘ह्विसिल रिवोल्यूशन’ करार दिया था और लोगों से अपनी पार्टी के ह्विसिल चिह्न का समर्थन करने की अपील की थी। अब जब उनकी पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (टीवीके) के फोर्ट सेंट जॉर्ज (तमिलनाडु का विधान सभा भवन)पर काबिज होने जा रही है, ऐसे में एम जी रामचंद्रन (एमजीआर) और विजय के बीच तुलना करने की स्पष्ट वजह मिल जाती है।

एमजीआर ने भी वर्ष 1977 के विधान सभा चुनाव में प्रशंसकों के प्यार को एक संस्थागत राजनीतिक मशीन में बदलकर भारी जीत हासिल की थी। पिछले 59 वर्षों में यह पहली बार होगा कि कोई गैर-द्रविड़ पार्टी की सरकार सत्ता में आ रही है। 17 अक्टूबर, 1972 को अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) की स्थापना के बाद करिश्माई नेता ने 1987 में अपनी मृत्यु तक एक दशक तक राज्य पर शासन किया। उनकी तुलना तेलुगु के दिग्गज अभिनेता से राजनेता बने एन टी रामा राव (एनटीआर) से की जाती है जिन्होंने मार्च 1982 में तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) की स्थापना के महज नौ महीने बाद 1983 के आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनावों में सत्ता संभाली।

तमिल लेखक और कार्यकर्ता मालन नारायणन कहते हैं,‘बेशक विजय की जीत की तुलना एमजीआर की जीत से की जा सकती है। एमजीआर और विजय दोनों को फिल्म प्रशंसकों की पार्टी चलाने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा। फर्क सिर्फ इतना है कि एमजीआर को वर्ष 1972 से वर्ष 1977 तक अपनी पार्टी को मजबूत करने के लिए पर्याप्त समय मिला और उन्होंने पहले भी चुनाव लड़े थे।’

विजय ने तमिलनाडु की राजनीति में जीत का परचम ऐसे समय में लहराया है जब रजनीकांत और कमल हासन जैसे दिग्गज स्टार भी राजनीति में अपनी छाप छोड़ने में असफल रहे। राजनीति में कदम रखने वाले तमिल फिल्म सितारों की सूची में एस एस राजेंद्रन, शिवाजी गणेशन, जयललिता और कैप्टन विजयकांत जैसे दिग्गज भी शामिल हैं। जयललिता तो एक बड़ी राजनीतिक हस्ती बन गईं वहीं प्रभाव डालने वाले एकमात्र अन्य अभिनेता-राजनेता विजयकांत थे जो विपक्ष के नेता बने।

विजय ने आधिकारिक तौर पर फरवरी 2024 में अपनी राजनीतिक पार्टी की शुरुआत की। हालांकि, राजनीति में उनका प्रवेश अचानक नहीं हुआ बल्कि  उन्होंने वर्ष 2009 से ही इसकी तैयारी शुरू कर दी थी। तब उन्होंने अपना फैन क्लब – विजय मक्कल इयक्कम (वीएमआई) की शुरुआत की थी। वर्ष 2011 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने दिवंगत जे जयललिता के नेतृत्व वाली एआईएडीएमके का समर्थन किया था। हालांकि, उन्होंने दिल्ली के रामलीला मैदान में जन लोकपाल विधेयक के लिए भूख हड़ताल कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे से मिलकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया। उनकी फिल्में जैसे ‘मर्सल’ और ‘थलाइवा’ में भी राजनीतिक संदेश थे।

दिलचस्प बात यह है कि वर्ष 2017 में मर्सल की रिलीज के दौरान ही विजय ने आधिकारिक तौर पर अपनी उपाधि इलैयाथलपति (युवा कमांडर) से बदल कर थलपति (कमांडर) कर ली थी। वर्ष 2021 के स्थानीय निकाय चुनावों में भी उन्हें कुछ राजनीतिक सफलता मिली जब वीएमआई ने 169 में से 115 सीटों (68 प्रतिशत) पर जीत हासिल की। पूर्ण बहुमत न होने के बावजूद लगभग 110 सीटें विजय को सरकार बनाने की ताकत आराम से देंगी।

टीवीके के प्रवक्ता फेलिक्स गेराल्ड ने मीडिया से कहा,‘इस सफलता के पीछे हमारे नेता का पूर्ण योगदान है। लोगों को उन पर भरोसा था। हमें इस रुझान की उम्मीद थी। हम पहले दिन से ही कहते आ रहे थे कि टीवीके सरकार बनाएगी।’ एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक ने कहा कि एमजीआर ने वामपंथी दलों के साथ समझ-बूझ से गठबंधन तैयार किए थे और विजय को भी केंद्र के साथ किसी भी तरह के टकराव से बचते हुए ऐसे ही गठबंधन बनाने चाहिए। एमजीआर से तुलना के बीच वह राजनीतिक मंच पर भी ऐतिहासिक छाप छोड़ने में सफल रहे हैं।

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First Published - May 4, 2026 | 11:18 PM IST

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