हरियाणा और पंजाब की विभिन्न अनाज मंडियों में मौसमी हलचल शुरू हो चुकी है। सरकारी खरीद के लिए किसान अपनी रबी फसल, खास तौर पर सरसों और गेहूं को लेकर मंडियों में पहुंचने लगे हैं। आम तौर पर इन महीनों में किसान अपनी उपज बेचकर कमाई करते है मगर इस बार किसानों के मन में अनिश्चितता का खटका लगा हुआ है। पश्चिम एशिया संकट के कारण उर्वरकों की आपूर्ति में व्यवधान का संकट अब करोड़ों भारतीय किसानों की दहलीज तक पहुंचता दिख रहा है।
हरियाणा के करनाल के किसान राम प्रसाद कुमार कहते हैं, ‘इस सीजन का गेहूं तो हो गया लेकिन आने वाली मक्का, धान और आलू की फसल को लेकर चिंता है।’ लुधियाना की खन्ना मंडी में किसान बलजीत सिंह अपने गांव में संकट की आहट महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘हमारे गांव में डीएपी और यूरिया का ट्रक पिछले तीन महीने से नहीं आया। अगर यही हाल रहा तो हमें 50 से 60 किलोमीटर दूर जाकर खरीदना होगा या फिर आने वाले महीनों के लिए एकमुश्त खरीद करनी पड़ेगी। डीजल की खपत को लेकर भी हम सतर्क हैं।’
उर्वरक के थोक विक्रेता भी इसी तरह की चिंता जता रहे हैं। गोहाना मंडी में एक उर्वरक डीलर ने कहा, ‘मार्च-अप्रैल वह समय होता है जब हम जून से बढ़ने वाली मांग के लिए उर्वरक का भंडारण करते हैं। इस साल आपूर्ति कुछ धीमी लग रही है।’ कुरुक्षेत्र के आपूर्तिकर्ता भूपेश गुप्ता भी स्टॉक में कमी का संकेत देते हैं। वे कहते हैं, ‘मेरे करीब 80 फीसदी ग्राहक अगले 8 से 9 महीनों के लिए उर्वरक खरीदना चाहते हैं। अभी मेरे पास स्टॉक है लेकिन यह जल्द खत्म हो जाएगा और पिछले 2 से 3 महीनों से नया माल नहीं आया है।’ 30 मार्च को रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव अपर्णा शर्मा ने संवाददाताओं को बताया था कि युद्ध से पहले खाड़ी क्षेत्र से यूरिया आयात का 20 से 30 फीसदी और डीएपी आयात का लगभग 30 फीसदी हिस्सा आता था। मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2025-26 के अप्रैल–जनवरी के दौरान डीएपी और यूरिया का आयात करीब 1.49 करोड़ टन रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 91.7 लाख टन से काफी अधिक है। केवल यूरिया का आयात 83.3 फीसदी बढ़ा है जबकि सरकार आयात स्रोतों में विविधता लाने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रही है। लेकिन किसानों और विक्रेताओं में निर्बाध आपूर्ति को लेकर आशंका बनी हुई है।
खन्ना मंडी के एक किसान ने कहा, ‘सुना है कि यूरिया संयंत्र कम क्षमता पर चल रहे हैं और कुछ समय से पहले बंद हो गए हैं। ऐसी खबरें गांवों में घबराहट पैदा करती हैं।’ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पंजाब के बठिंडा और नांगल में नैशनल फर्टिलाइजर लिमिटेड के संयंत्र तय समय से पहले बंद हो गए हैं। आम तौर पर ये संयंत्र अप्रैल में उत्पादन का लक्ष्य पूरा करने के बाद बंद होते हैं।
उर्वरक मंत्रालय के अनुसार मार्च में घरेलू यूरिया उत्पादन 24 लाख टन के औसत से घटकर 18 लाख टन रह गया। सरकार ने शनिवार को घोषणा की कि सोमवार से यूरिया संयंत्रों को गैस आपूर्ति उनकी औसत खपत के 90 फीसदी तक बढ़ाई जाएगी। फिलहाल वे पिछले छह महीनों के औसत के 70से 75 फीसदी पर काम कर रहे हैं। खन्ना मंडी के एक अन्य विक्रेता का कहना है, ‘आने वाले महीनों में संभव है कि स्थिति सुधर जाए लेकिन किसानों तक आपूर्ति सामान्य होने में लगभग एक साल लग सकता है।’
अग्रिम खरीद किसानों पर अचानक वित्तीय बोझ भी डाल रही है। गोहाना के किसान मनदीप सिंह कहते हैं, ‘मैंने इस संकट के लिए पैसों का बंदोबस्त पहले से नहीं किया था। जून में होने वाली गेहूं की अगली फसल के लिए 5 एकड़ जमीन पर डीएपी के लिए ही करीब 25,000 रुपये तत्काल चाहिए। यूरिया के लिए करीब 4,000 रुपये और लगेंगे।’ डीएपी की कीमत लगभग 1,350 रुपये प्रति बोरी (50 किलो) है और यूरिया 266.50 रुपये प्रति बोरी है।
विक्रेताओं का कहना है कि यह स्थिति छोटे किसानों के लिए अधिक कठिन हो सकती है। करनाल मंडी के उर्वरक डीलर संदीप कुमार कहते हैं, ‘जो किसान फसल के मौसम के आधार पर खरीद करते हैं, उन्हें ज्यादा परेशानी हो सकती है। फिलहाल हम भविष्य की उपलब्धता की गारंटी नहीं दे सकते।’
हालांकि विक्रेता यह भी मानते हैं कि अभी कम मांग वाला मौसम होने से उन्हें स्टॉक बढ़ाने का समय मिल रहा है। करनाल मंडी के कुमार ने कहा कि जून के बाद मांग चरम पर होगी। उम्मीद है तब तक स्थिति सुधरेगी और सरकार आपूर्ति श्रृंखला संभाल लेगी। खन्ना मंडी में 30 वर्षों से उर्वरक डीलर का काम कर रहे प्रदीप गुप्ता का मानना है कि वर्तमान संकट का वास्तविक प्रभाव अभी सामने आना बाकी है। वे कहते हैं, ‘यह कहना गलत होगा कि अभी उर्वरक उपलब्ध नहीं हैं। हमारे पास स्टॉक है और कुछ आ भी रहा है। लेकिन पिछले वर्षों में मैंने देखा है कि चरम मांग के समय इसकी किल्लत हो जाती है। इस बार स्थिति और खराब हो सकती है।’
व्यापारियों के अनुसार जब अधिक किसान अपनी फसल मंडियों में लाकर बेचेंगे और उनके हाथ में नकदी आएगी तब आपूर्ति की वास्तविक स्थिति कुछ हद तक स्पष्ट हो सकेगी।
घबराहट, जमाखोरी और थोक खरीद ये शब्द लगभग हर मंडी में सुनाई दे रहे हैं। तरावड़ी में इफको के प्रभारी जयप्रकाश खड़िया कहते हैं, ‘किसान उर्वरकों की संभावित कमी को लेकर सजग हैं। जब वे थोक खरीद के लिए आते हैं तो हम उन्हें स्टॉक दिखाकर भरोसा दिलाते हैं।’ वे कहते हैं, ‘कुछ निजी फर्में कीमत बढ़ने की उम्मीद में स्टॉक रोककर रख सकती हैं। जाहिर है जमाखोरी हो रही है।’ थोक खरीद पर वे कहते हैं कि किसान को समझाया जाता है कि प्रति एकड़ 2 से 3 बोरी डीएपी पर्याप्त है लेकिन वे 4 से 5 बोरी तक खरीद लेते हैं जो केवल आलू जैसी कुछ फसलों के लिए जरूरी होता है। हरियाणा के व्यापारियों ने बताया कि डीएपी की बिक्री 3 बोरी प्रति एकड़ तक सीमित रखने की सलाह भी मिली है। एक किसान ने कहा, ‘जब जरूरत पड़ेगी तब उर्वरक जुटाने का समय नहीं मिलेगा। फसल इतना समय नहीं देती। अगर देर हो गई और नुकसान हुआ तो क्या मुआवजा मिलेगा?’
पटियाला मंडी के व्यापारी और राष्ट्रीय उर्वरक संघ पंजाब के सदस्य धरम पटेल का कहना है कि उर्वरकों की कीमतों में हल्की बढ़ोतरी से उपयोग सीमित हो सकता है। कई वर्षों से कीमतें स्थिर हैं जिससे किसान सहज हो गए हैं और कभी-कभी जरूरत से ज्यादा खरीद लेते हैं जो आपूर्ति पर दबाव डालता है। डीएपी के विकल्प के बारे में चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि ट्रिपल सुपर फॉस्फेट (टीएसपी), एनपीके और सिंगल सुपर सल्फेट (एसएसपी) की कमी नहीं है लेकिन किसान डीएपी और यूरिया को ही प्राथमिकता देते हैं। कीटनाशकों की कीमतें जो सरकारी नियंत्रण में नहीं आतीं, पिछले 2 से 3 हफ्तों में 20 फीसदी से अधिक बढ़ चुकी हैं। करनाल के एक थोक विक्रेता के अनुसार 31 मार्च को कंपनियों ने अपने खाते बंद किए हैं। नए सीजन की बुकिंग शुरू होने पर कीमतें और बढ़ सकती हैं। कुछ किसान और खुदरा विक्रेता आरोप लगाते हैं कि थोक विक्रेता मांग की कमी दिखाकर कीमतों में हेरफेर कर रहे हैं। कुरुक्षेत्र के गुप्ता कहते हैं, ‘तेल-आधारित कीटनाशकों की कीमत बढ़ना समझ आता है लेकिन अन्य उत्पादों के दाम भी बढ़ रहे हैं।’
किसानों का संकट केवल उर्वरकों तक सीमित नहीं है। कुछ इलाकों में ईंधन की संभावित कमी की आशंका में वे डीजल भी खरीदकर रख रहे हैं। पटियाला मंडी आए किसान अमरजीत सिंह कहते हैं, ‘छोटे किसान डर के कारण डीजल जमा कर रहे हैं जबकि कंटेनर में रखा डीजल ट्रैक्टर को नुकसान पहुंचाता है। लेकिन मजबूरी है क्योंकि हमारी 90 फीसदी मशीनें डीजल पर चलती हैं।’