पश्चिम एशिया में ईरान पर अमेरिका-इजाराइल के हमलों के कारण देश में पैदा हुए एलपीजी संकट का सीधा असर रसोई पर पड़ रहा है। ऐसे समय में केरोसीन तेल एलपीजी का विकल्प बनकार सामने आया। लोगों को हो रही परेशानी को देखते हुए सरकार ने केरोसिन (मिट्टी का तेल) मुहैया कराने का फैसला लिया। केरोसीन की बिक्री शुरू होते ही लोगों ने पुराने स्टोव का जुगाड़ करना शुरू कर दिया। हालांकि बाजार में केरोसिन से चलने वाले स्टोव मिलना मुश्किल हो रहा है। ईंधन संकट के बीच होटल मालिकों ने खाने की कीमत 20 फीसदी बढ़ा दी।
महाराष्ट्र सरकार ने गैस सिलेंडर की किल्लत के बीच केरोसिन बांटने का फैसला लिया है। अब सरकारी राशन की दुकानों पर एक राशन कार्ड यानी एक परिवार को 3 लीटर केरोसिन मिलेगा। जिससे अगर सिलेंडर ना मिले तो जरुरतमंद परिवार के घर चूल्हे जलते रहे। गौरतलब है कि हाल के वर्षों में एलपीजी की व्यापक उपलब्धता और अदालत के निर्देशों के कारण राज्य में केरोसिन का वितरण सीमित कर दिया गया था। इसके तहत उन परिवारों को केरोसिन की आपूर्ति प्रतिबंधित थी जिनके पास पहले से एलपीजी सिलेंडर मौजूद हैं।
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केरोसिन की उपलब्धता बढ़ते ही राज्य में केरोसिन स्टोव की मांग बढ़ गई। लेकिन बाजार में स्टोव का टोटा है। पिछले कुछ दिनों में मुंबई के दादर, कुर्ला और अंधेरी जैसे व्यस्त बाजारों में बर्तनों और घरेलू उपकरणों की दुकानों पर केरोसिन स्टोव और प्राइमस फिर से सज गए हैं। दुकानदारों का कहना है कि जहां महीने भर पहले तक कोई स्टोव के बारे में पूछता तक नहीं था, वहीं अब प्रतिदिन दर्जनों ग्राहक स्टोव खरीदने पहुंच रहे हैं। इंडक्शन कुकटॉप्स की बिक्री तो बढ़ी ही है, लेकिन बिजली की लागत और बर्तन बदलने की झंझट से बचने के लिए मध्यम और निम्न वर्ग के लोग पारंपरिक केरोसिन स्टोव को प्राथमिकता दे रहे हैं।
मुंबई से सटे भायंदर जो कभी स्टोव निर्माताओं का प्रमुख अड्डा हुआ करता था वहां के दुकानदारों का कहना है कि पिछले कुछ सालों से स्टोव और अंगीठी का चलन लगभग खत्म हो चुका था, अब अचानक मांग बढ़ने से उनकी आपूर्ति कर पाना मुश्किल हो रहा है। एक महीना पहले कोई भुला बिसार स्टोव की मांग करता था लेकिन इस समय हर दिन सैकड़ों लोग स्टोव मांग रहे हैं। स्टोव मरम्मत का काम करने वाले प्रतीक जैन कहते हैं कि लोग पुराने स्टोव लेकर आ रहे हैं। वह कहते हैं कि दरअसल लोगों के अंदर भय है कि आगे चलकर स्थिति और भी खराब हो सकती है जिसकी लोग तैयारी में जुटे हैं जिसके कारण स्टोव की मांग कई गुणा ज्यादा बढ़ गई है।
स्टोव निर्माता और विक्रेताओं का कहना है यह मांग सीमित है इसीलिए कोई भी आपूर्ति बढ़ाने का जोखिम नहीं लेना चाह रहा है ऐसे में बाजार में स्टोव की कीमत बढ़ी हुई है। महाराष्ट्र स्टील एंड प्लास्टिक के श्रवण सिंह कहते हैं कि स्टॉक न होने के कारण स्टोव की कोई तय कीमत नहीं बची है। कुछ दिनों पहले लोहे का स्टोव 300-400 रुपये और पीतल का स्टोव 1200 से 1500 रुपये में बिकता था। दुकानदारों की माने तो अभी भी स्टोव की मांग छोटे दुकानदारों और झुग्गीबस्ती में रहने वाले लोगों के बीच से आ रही है।
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बढ़ते खर्चों और कमर्शियल गैस सिलेंडर मंहगा होने के कारण होटल और रेस्टोरेंट मालिको ने कीमतें बढ़ा दी है। होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया (HRAWI) के मुताबिक, फरवरी के आखिर से चल रहे युद्ध की वजह से रेस्टोरेंट चलाना अब घाटे का सौदा साबित हो रहा है। इस युद्ध की वजह से ईंधन और बाकी जरूरी चीजों की कीमतें आसमान छू रही हैं। जिससे उनका लागत खर्च करीब 20 फीसदी बढ़ गया है।
एसोसिएशन के प्रवक्ता प्रदीप शेट्टी का कहना है कि फरवरी के अंत से ही सेक्टर दबाव में है। बार-बार काम बंद तो कभी मेन्यू में बदलाव करना पड़ रहा है। खाना पकाने के दूसेर विकल्पों को अपनाने की वजह से होटल चलाने का खर्च बहुत बढ़ गया है, जिसे अब और झेलना मुमकिन नहीं है, अतः मजबूरी में कीमतें 20 फीसदी बढ़ानी पड़ रही है।
मुंबई और आसपास के इलाकों में करीब 15 रुपये का मिलने वाला वड़ा पाव की कीमत बढ़कर 25 रुपये हो गई। समोसा की औसत कीमत 25 रुपये कर दी गई। 25-30 रुपये प्लेट मिलने वाली इडली के दाम बढ़कर 40 रुपये प्रति पहुंच गए। इंडस्ट्री के लोगों का कहना है कि हालात जल्द नहीं सुधरे, तो कीमतों में अभी और बढ़ोतरी हो सकती है। बड़े होटल तो कुछ वक्त तक कीमतों के बढ़ने से रोक सकते हैं लेकिन हर दिन सामान खऱीद कर बेचने वाले तो एक दिन भी नहीं रुकने वाले हैं। वह बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर ही डालने वाले हैं।