अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की उम्मीद बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिली है। शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड करीब 4 प्रतिशत टूटकर 87 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया। जानकारों का कहना है कि अगर दोनों देशों के बीच बात बन जाती है और इलाके में तनाव कम हो जाता है, तो तेल के दाम और नीचे आ सकते हैं।
रेटिंग एजेंसी फिच का मानना है कि तेल की कीमतें अब इस बात पर टिकी हैं कि होर्मुज जलडमरूमध्य कब तक फिर से पूरी तरह खुलता है। एजेंसी का अनुमान है कि जुलाई के आखिर तक यह रास्ता खुल सकता है। अगर ऐसा होता है तो बाजार में तेल की सप्लाई बढ़ जाएगी और साल के आखिर तक दामों पर दबाव बन सकता है।
फिच के मुताबिक मई से जुलाई के बीच ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत 100 से 110 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है। इसके बाद अगस्त में यह करीब 80 डॉलर और सितंबर से 70 डॉलर प्रति बैरल तक आ सकती है।
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से पहले फरवरी 2026 में ब्रेंट क्रूड करीब 70 डॉलर प्रति बैरल था। लेकिन जैसे-जैसे हालात बिगड़े, तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर 125 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। अब जब युद्ध खत्म होने और बातचीत से हल निकलने की उम्मीद जगी है, तो तेल फिर से 100 डॉलर के नीचे आ गया है।
फिच के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट की वजह से रोजाना करीब 1.5 करोड़ बैरल कच्चे तेल और 50 लाख बैरल तेल उत्पादों की आवाजाही प्रभावित हुई। यह दुनिया की कुल तेल खपत का लगभग पांचवां हिस्सा है। इस रास्ते से सऊदी अरब, यूएई, इराक, कुवैत और ईरान का तेल दुनिया के बाजारों तक पहुंचता है। भारत और चीन इन तेल खेपों के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हैं।
मिराए एसेट शेयरखान के रिसर्च एनालिस्ट मोहम्मद इमरान का कहना है कि इलाके में तनाव कम होने, तेल सप्लाई के रास्ते खुलने और खाड़ी देशों से ज्यादा तेल आने की उम्मीद ने बाजार को राहत दी है। उनका मानना है कि तेल में जो तेजी सिर्फ युद्ध की वजह से आई थी, वह अब धीरे-धीरे खत्म हो रही है।
उनके मुताबिक अगर आगे किसी खबर की वजह से तेल में अचानक उछाल आता भी है, तो निवेशक उसे मुनाफावसूली का मौका मान सकते हैं क्योंकि बाजार अब फिर से मांग और सप्लाई के असली आंकड़ों पर ध्यान देने लगा है।
तेल की कीमतों पर दबाव की एक बड़ी वजह चीन भी है। दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक चीन इन दिनों पहले जितना तेल नहीं खरीद रहा। राबोबैंक की रिपोर्ट के मुताबिक मई में चीन का समुद्री रास्ते से तेल आयात घटकर 67 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया, जो पिछले 10 साल का सबसे निचला स्तर है।
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कम मुनाफा, महंगा कच्चा तेल और सप्लाई को लेकर अनिश्चितता के कारण चीन की सरकारी और निजी रिफाइनरियां भी उत्पादन घटा रही हैं। इसकी वजह से देश में तेल की खपत और रिफाइनिंग दोनों कमजोर हुई हैं।
चीन की कमजोर मांग को देखते हुए राबोबैंक ने तेल की कीमतों को लेकर अपना अनुमान कम कर दिया है। बैंक अब 2026 की तीसरी तिमाही में ब्रेंट क्रूड का औसत भाव 103 डॉलर और चौथी तिमाही में 93 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान लगा रहा है। वहीं 2027 के लिए भी अनुमान घटाकर 85 डॉलर प्रति बैरल कर दिया गया है।