ब्रोकरेज कंपनियां कारोबार के हिसाब से देश के सबसे बड़े शेयर बाजार- नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई)- की लिस्टिंग से पहले उसमें अपनी हिस्सेदारी कम कर रही हैं। एनएसई में कारोबारी सदस्यों और सहयोगियों की हिस्सेदारी मार्च 2019 के अपने उच्चतम स्तर करीब 53.9 फीसदी से गिरकर मार्च 2026 तक 35.6 फीसदी रह गई है। मौजूदा हिस्सेदारी मार्च 2016 से शुरू होने वाले साल के आखिर के आंकड़ों के मुकाबले अब तक का सबसे निचला स्तर है। एनएसई अपने आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) की तैयारी कर रहा है, जिसके लिए कई सालों से कमर कसता आ रहा है।
पहले स्टॉक एक्सचेंज का मालिकाना हक और उनका संचालन स्टॉक ब्रोकरों के हाथों में होता था। 2000 के दशक की शुरुआत में सरकार ने डीम्युचुअलाइजेशन प्रक्रिया के दौरान ट्रेडिंग अधिकारों को एक्सचेंज के संचालन से अलग करने पर जोर दिया। ऐसा हितों के टकराव से बचने के लिए किया गया था, जहां ब्रोकर अपने फायदे के लिए शेयर बाजार के कामकाज को प्रभावित कर सकते थे।
ब्रोकरों को स्टॉक एक्सचेंज में मालिकाना हिस्सेदारी तो दी गई, लेकिन इसके साथ ही उनके संचालन में उनकी भूमिका को धीरे-धीरे कम कर दिया गया। एनएसई की स्थापना एक डीम्युचुअलाइज्ड संस्था के तौर पर हुई थी। इसलिए, जब अन्य एक्सचेंजों के लिए डीम्युचुअलाइजेशन अनिवार्य किया गया, तब तक एनएसई में ब्रोकरों का मालिकाना हक और एक्सचेंज का संचालन पहले ही अलग-अलग किया जा चुका था।
आनंद राठी समूह के संस्थापक व चेयरमैन और बीएसई के पूर्व अध्यक्ष आनंद राठी के अनुसार, ब्रोकरों के हित स्टॉक एक्सचेंजों के साथ जुड़े रहते हैं। वे अपने फीडबैक तथा बाजार में क्लाइंट लाकर स्टॉक एक्सचेंजों के विकास में अपनी भूमिका निभाते रह सकते हैं।
उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में ट्रेडिंग वॉल्यूम में भारी बढ़ोतरी के बावजूद ब्रोकरों के फेल होने की घटनाएं बहुत कम हुई हैं। इसका श्रेय भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के समय पर किए गए नियामकीय हस्तक्षेपों को जाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि 20-30 साल पहले की तुलना में भारतीय बाजारों ने कितनी प्रगति की है। साथ ही यह भी दिखाता है कि दुनिया के बाकी बाजारों की तुलना में यहां के मानक कितने ऊंचे हो गए हैं। उन्होंने कहा, मुझे लगता है कि कुल मिलाकर हमारा इकोसिस्टम बहुत आगे है।
चूड़ीवाला सिक्योरिटीज के प्रबंध निदेशक आलोक चूड़ीवाला ने कहा कि हितों के टकराव से बचने के उपायों ने बाजार और स्टॉक एक्सचेंजों को बेहतर ढंग से चलाने में मदद की है। वह 2001 से 2005 के बीच बीएसई के निदेशक थे,। यह वह समय था जब बीएसई डीम्युचुअलाइजेशन की ओर बढ़ रहा था। उन्होंने कहा, यह समय की कसौटी पर खरा उतरा है और एक्सचेंज अब बेहतर ढंग से संचालित होते हैं।
2019 तक हिस्सेदारी में हुई बढ़ोतरी का श्रेय भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) द्वारा 2019 में आईडीबीआई बैंक में 51 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने को दिया जा सकता है। बैंक को एक ट्रेडिंग सदस्य के रूप में वर्गीकृत किया गया था। जब एलआईसी ने आईडीबीआई में हिस्सेदारी खरीदी तो उसे ट्रेडिंग सदस्य के सहयोगी के रूप में वर्गीकृत किया गया। परिणामस्वरूप ट्रेडिंग सदस्यों की श्रेणी के रूप में कुल हिस्सेदारी बढ़कर 53 फीसदी से अधिक हो गई।
एनएसई की फाइलिंग से पता चलता है कि इसके बाद सेबी ने एलआईसी से अपनी हिस्सेदारी 4.89 फीसदी कम करने को कहा, ताकि यह उस नियम के अनुरूप हो जाए जिसके तहत ट्रेडिंग सदस्य की हिस्सेदारी 49 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए। ट्रेडिंग सदस्यों और सहयोगियों की हिस्सेदारी लगातार और भी कम होती गई है। अब यह अपने मौजूदा न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है।
दिलचस्प यह है कि मार्च 2026 तक शेयरधारकों की संख्या बढ़कर 2,974 हो गई है, जिससे संकेत मिलता है कि अब अधिक संख्या में ब्रोकर और सहयोगी संस्थाओं की इसमें हिस्सेदारी है। हालांकि मूल्य के संदर्भ में ट्रेडिंग सदस्यों की श्रेणी ने 2019 के अपने उच्चतम स्तर से अपनी हिस्सेदारी में 18 फीसदी से अधिक की कटौती की है।
फिनसेक लॉ एडवाइजर्स में मैनेजिंग पार्टनर संदीप पारेख 2006 में डीम्युचुअलाइजेशन के बाद क्षेत्रीय स्टॉक एक्सचेंजों के भविष्य का अध्ययन करने वाली नियामकीय समिति का हिस्सा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि एक्सचेंजों को पहले प्रभावित करने वाले टकरावों को इस एक कदम से सुलझा लिया गया है कि ट्रेडिंग सदस्यों को स्टॉक एक्सचेंज के बोर्ड में शामिल होने की अनुमति नहीं है। इस तरह वे उसके कामकाज को प्रभावित नहीं कर सकते। उनकी हिस्सेदारी भी व्यक्तिगत आधार पर सभी शेयरधारकों की तरह 5 फीसदी तक सीमित है। सभी ट्रेडिंग सदस्यों की कुल हिस्सेदारी 49 फीसदी से अधिक नहीं हो सकती, भले ही उन्हें बोर्ड से दूर रखा गया हो।
कुछ अंतरराष्ट्रीय एक्सचेंज अभी भी ट्रेडिंग सदस्यों को बोर्ड में जगह देते हैं, जैसे सीएमई ग्रुप, जो शिकागो मर्केंटाइल एक्सचेंज (सीएमई) को चलाता है। पारेख ने कहा, वैश्विक स्तर पर इस पर कोई रोक नहीं है।