दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला दिया है कि शेयर पुनर्खरीद को कंपनियों के लिए आय नहीं माना जाएगा और इस वजह से उन पर कर नहीं लगेगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से कंपनियों के पुनर्गठन और पूंजी प्रबंधन में स्पष्टता आएगी, खासकर उस लेन-देन में जिसमें डिस्काउंटेड वैल्यूएशन शामिल हैं।
खेतान ऐंड कंपनी में पार्टनर राहुल जैन ने कहा, दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले से किसी भारतीय कंपनी द्वारा शेयरों की पुनर्खरीद के संदर्भ में बेवजह के मसले सुलझ गए हैं। तथ्य यह है कि पुनर्खरीद के परिणामस्वरूप शेयरों को रद्द किया जाता है, न कि कंपनी द्वारा शेयरों को ‘प्राप्त’ किया जाता है। इस फैसले से ऐसी ही परिस्थितियों में भारतीय कंपनियों द्वारा अपनाई गई कर मुक्त स्थिति को और मजबूती मिलनी चाहिए। संशोधित कर प्रावधानों के तहत शेयरधारक पुनर्खरीद पर होने वाले लाभ (अगर कोई हो) पर कर देने के लिए उत्तरदायी है, जिसके लिए उचित बाजार मूल्य (एफएमवी) के मानदंडों का पालन आवश्यक है।
1 अप्रैल से पुनर्खरीद से होने वाला लाभ निवेशकों के लिए पूंजीगत लाभ के तौर पर करयोग्य होगा। जैन ने कहा, निष्कर्ष यह है कि उचित बाजार मूल्य से कम कीमत पर की गई पुनर्खरीद कंपनी के लिए कोई कर देनदारी नहीं बननी चाहिए। लेकिन शेयरधारकों के लिए पूंजीगत लाभ की गणना करने में यह प्रासंगिक बनी रहेगी।
यह मामला ग्लोब कैपिटल मार्केट के खिलाफ आकलन की कार्यवाही से जुड़ा है। कर निर्धारण वर्ष 2018–19 में कंपनी ने 28.6 लाख इक्विटी शेयर 313.40 रुपये प्रति शेयर की दर से वापस खरीदे जबकि आयकर अधिनियम 1962 के नियम 11यूए के तहत इनका उचित बाजार मूल्य 370.46 रुपये था।
कर निर्धारण अधिकारी ने पुनर्खरीद को उचित बाजार मूल्य से कम पर संपत्ति का अधिग्रहण मानते हुए 16.33 करोड़ रुपये की अंतर वाली राशि को कंपनी की आय में जोड़ दिया। आयकर आयुक्त (अपील) ने इस बढ़ोतरी को हटा दिया और कहा कि यह लेन-देन शेयरों की खरीद न होकर शेयर पूंजी में कमी था।
इस राय को आयकर अपील ट्रिब्यूनल ने सही ठहराया, जिसके बाद कर विभाग ने हाई कोर्ट का रुख किया। हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि कर निर्धारण अधिकारी की यह राय कि पुनर्खरीद को मुनाफा या डीम्ड इनकम माना जाए, कानून की नज़र में साफ तौर पर गलत और बेबुनियाद है। सिरिल अमरचंद मंगलदास में पार्टनर कुणाल सावानी ने कहा कि यह फैसला उन पुनर्खरीद के लिए भी व्याख्या का काम करता है,जो बाजार मूल्य से कम कीमत पर की जाती है। यह अक्सर विवादों के निपटारे, स्टार्टअप के पुनर्गठन और निवेशकों के बाहर निकलने के मामलों में आम बात है।
उन्होंने कहा, ऐसे मामलों में पुनर्खरीद अक्सर आपसी सहमति से तय वाणिज्यिक शर्तों के आधार पर होते हैं और प्रीमियम पुनर्खरीद के विपरीत शेयरों को बाजार मूल्य से कम कीमत पर वापस खरीदना कोई असामान्य बात नहीं है। ऐसे लेन-देनों का मकसद हमेशा पूंजी कम करना नहीं होता, ये अक्सर विवादों को सुलझाने या बातचीत के जरिये बाहर निकलने का रास्ता बनाने के साधन के तौर पर काम करते हैं। इसलिए, कंपनियों के लिए आयकर अधिनियम की धारा 56(2)(x) की प्रयोज्यता का आकलन करना बेहद ज़रूरी है। इस फैसले से साफ होता है कि कोई भी कंपनी पुनर्खरीद के जरिये अपने ही शेयर वापस खरीदकर कोई आय अर्जित नहीं कर सकती।
एजेडबी ऐंड पार्टनर्स में सीनियर पार्टनर हरदीप सचदेवा ने कहा, कारोबारी सुगमता के नजरिये से कर का ढांचा आसान और समान होना चाहिए। जो कंपनियां पुनर्खरीद कर रही हैं, उन पर कर नहीं लगना चाहिए जबकि शेयरधारकों पर सिर्फ पूंजीगत लाभ के नियमों के तहत ही कर लगना चाहिए। इस मामले में प्रवर्तक, आम शेयरधारकों या संस्थागत निवेशकों के साथ किसी भी तरह का अलग कर बर्ताव गलत है और इससे बेवजह की मुश्किलें पैदा होती हैं।