सरकार ने खरीफ सीजन के लिए खाद पर सब्सिडी बढ़ा दी है, लेकिन इससे कंपनियों को पूरी राहत नहीं मिली है। एंटीक स्टॉक ब्रोकरेज की रिपोर्ट कहती है कि हालात अभी भी चुनौती भरे हैं। कच्चे माल की कीमतें इतनी ज्यादा हैं कि कंपनियों का खर्च कम नहीं हो पा रहा। यानी सरकार ने मदद तो की है, लेकिन दबाव अभी भी बना हुआ है।
सरकार ने नाइट्रोजन, फॉस्फेट और सल्फर पर सब्सिडी करीब 10 प्रतिशत बढ़ाई है, जबकि पोटाश की दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया। इस फैसले से सरकार का खर्च भी बढ़ गया है। पहली छमाही में करीब 415 अरब रुपये खर्च होंगे, जो पिछले साल से ज्यादा है। पूरे साल के लिए गैर-यूरिया खाद पर 540 अरब रुपये का बजट रखा गया है। डीएपी पर सब्सिडी भी बढ़ाई गई है, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक यह बढ़ोतरी अभी भी पूरी तरह पर्याप्त नहीं है।
असल दिक्कत कच्चे माल की कीमतों में है। फॉस्फोरिक एसिड की कीमत करीब 1300 डॉलर प्रति टन के आसपास स्थिर है, जिससे थोड़ी राहत है। लेकिन अमोनिया और सल्फर की कीमतों में तेज उछाल आया है। अमोनिया करीब 30 प्रतिशत और सल्फर करीब 21 प्रतिशत महंगा हो गया है। भारत इन कच्चे माल के लिए काफी हद तक बाहर के देशों पर निर्भर है। ऐसे में जैसे ही मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ता है, कीमतें बढ़ जाती हैं और कंपनियों का खर्च बढ़ जाता है।
रिपोर्ट साफ कहती है कि कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बना रहेगा, खासकर साल की पहली छमाही में। अगर कंपनियां खाद के दाम नहीं बढ़ातीं, तो उनका मार्जिन कम हो सकता है। सीधी भाषा में कहें तो कंपनियों के पास दो ही रास्ते हैं, या तो कम मुनाफे में काम करें या फिर कीमत बढ़ाएं। इसलिए आगे चलकर खाद के दाम बढ़ने की संभावना बन रही है।
हर कंपनी की स्थिति एक जैसी नहीं है। जिन कंपनियों के पास खुद का कच्चा माल है या जो अपनी सप्लाई चेन को अच्छे से कंट्रोल करती हैं, उन्हें ज्यादा फायदा होगा। कोरोमंडल इंटरनेशनल और पारादीप फॉस्फेट जैसी कंपनियां इस मामले में मजबूत स्थिति में हैं। इन्हें फॉस्फोरिक एसिड के स्थिर भाव और रॉक फॉस्फेट की कीमतों में आई गिरावट का फायदा मिल सकता है।
जो कंपनियां पूरी तरह आयात पर निर्भर हैं, उनके लिए हालात मुश्किल हैं। डीएपी की कीमतें अभी भी करीब 780 डॉलर प्रति टन के आसपास बनी हुई हैं, जिससे इन कंपनियों की लागत ज्यादा बनी हुई है। ऐसी कंपनियों के लिए मुनाफा बचाना आसान नहीं होगा और उन्हें ज्यादा दबाव झेलना पड़ सकता है।
अगर मिडिल ईस्ट का तनाव कम होता है, तो कच्चे माल की कीमतें भी धीरे-धीरे नीचे आ सकती हैं। इससे कंपनियों को राहत मिलेगी और मुनाफा सुधर सकता है। लेकिन फिलहाल के हालात में पहली छमाही तक दबाव बना रह सकता है और कंपनियों को सावधानी से काम करना होगा।