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FPIs की बिकवाली 1 लाख करोड़ रुपये के पार, घरेलू निवेशकों ने संभाली स्थिति

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घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) ने इस अवधि में 1.13 लाख करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया है, जिससे सूचकांकों की ज्यादा गिरावट रोकने में मदद मिली है

Last Updated- March 23, 2026 | 10:21 PM IST
FPI

पश्चिमी एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने इस साल मार्च में रिकॉर्ड 1.04 लाख करोड़ रुपये (11.28 अरब डॉलर) की निकासी की है। यह जानकारी एनएसडीएल पर उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों से मिली। इससे पहले अक्टूबर 2024 में एफपीआई ने मुख्य रूप से सस्ते चीनी शेयरों की ओर रणनीतिक झुकाव, घरेलू शेयरों के ऊंचे मूल्यांकन और भू-राजनीतिक तनाव के कारण शेयर बाजार से 94,017 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी की थी। आंकड़ों से पता चलता है कि इस कारण बीएसई सेंसेक्स और निफ्टी-50 में मार्च में अब तक 10.6 फीसदी की गिरावट आई है।

एक्सचेंज के आंकड़ों से जाहिर होता है कि इससे उलट घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) ने इस अवधि में 1.13 लाख करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया है, जिससे सूचकांकों की ज्यादा गिरावट रोकने में मदद मिली है। इस तरह घरेलू संस्थानों ने सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) में आए निरंतर निवेश की मदद से अपनी खरीदारी का सिलसिला 32 वें महीने में पहुंचा दिया है।

विश्लेषकों का कहना है कि पश्चिम एशिया में युद्ध के बाद वैश्विक शेयर बाजारों में आई कमजोरी, रुपये के लगातार अवमूल्यन और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण भारत की वृद्धि दर और कंपनियों की आय पर संभावित असर की आशंकाओं ने विदेशी निवेशकों (एफपीआई) की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि, उनका मानना ​​है कि कच्चे तेल की कीमतें स्थिर होने और युद्ध संबंधी आशंकाएं कम होने के बाद यह बिकवाली धीमी पड़ जाएगी।

3पी इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के मुख्य निवेश अधिकारी (सीआईओ) और फंड मैनेजर प्रशांत जैन ने अपने पोर्टफोलियो रणनीतिकार और सह-फंड मैनेजर अश्विनी कुमार के साथ मिलकर लिखे नोट में कहा है, पिछले वर्ष अन्य उभरते बाजारों की तुलना में भारत का बेहद खराब प्रदर्शन, उभरते बाजारों पर भारत के प्रीमियम का सामान्यीकरण, एफआईआई की अंडरवेट स्थिति, भारत की अर्थव्यवस्था का आकार, मजबूत वृद्धि की संभावनाएं और मजबूत आर्थिक हालात समय के साथ एफआईआई को न केवल बेचने से रोकने बल्कि खरीदने के लिए भी प्रोत्साहित करेंगी।

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के मुख्य निवेश रणनीतिकार वीके विजयकुमार ने कहा, पिछले अठारह महीनों में अन्य बाजारों, चाहे विकसित हों या उभरते, की तुलना में भारत से मिले कम मुनाफे के कारण ही विदेशी निवेशकों ने भारत के प्रति उदासीनता दिखाई है।

अगर उनकी निरंतर बिकवाली की रणनीति में बदलाव लाना है, तो घरेलू कंपनियों की आय में सुधार के स्पष्ट संकेत मिलने चाहिए। मौजूदा अनिश्चित परिस्थितियों में इसमें समय लगेगा। उन्होंने कहा कि भारत के प्रति विदेशी निवेशकों का पूर्णतः नकारात्मक रुख इस तथ्य से भी स्पष्ट है कि वे मूल्यांकन की परवाह किए बिना अंधाधुंध तरीके से शेयर बेच रहे हैं।

उन्होंने कहा, वित्तीय सेवा क्षेत्र अच्छा प्रदर्शन कर रहा है और मूल्यांकन उचित है। इसके बावजूद, एफपीआई ने बड़े पैमाने पर (15 मार्च को समाप्त पखवाड़े में 31,831 करोड़ रुपये) शेयर बेचे हैं, क्योंकि यह उनकी कुल संपत्ति का करीब 32 फीसदी है। इस क्षेत्र में तरलता है, जिससे बेचना और बाहर निकलना आसान हो जाता है। एफपीआई की बिकवाली में कमी तभी आएगी, जब यह संकट समाप्त होगा और बाजार में सामान्य स्थिति लौट आएगी।

अल्फानीति फिनटेक के सह-संस्थापक और निदेशक यू आर भट को उम्मीद है कि आगे चलकर युद्ध संबंधी चिंताओं और कच्चे तेल की कीमतों के ऊंचे रहने के कारण डीआईआई की खरीदारी भी धीमी हो जाएगी।

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First Published - March 23, 2026 | 10:07 PM IST

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