Fuel Price Hike: पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें अब ऑनलाइन फूड डिलीवरी और क्विक कॉमर्स कंपनियों के लिए नई टेंशन बनती दिख रही हैं। ईंधन महंगा होने का सीधा असर डिलीवरी खर्च पर पड़ता है और इसका बोझ कंपनियों, ग्राहकों और डिलीवरी पार्टनर्स तीनों पर आ सकता है। फिलहाल कंपनियां इस दबाव को संभालने की स्थिति में दिख रही हैं, लेकिन अगर आने वाले महीनों में तेल की कीमतें और बढ़ती हैं तो डिलीवरी चार्ज, प्लेटफॉर्म फीस और दूसरे शुल्क बढ़ सकते हैं। इससे ग्राहकों की जेब पर भी असर पड़ने की आशंका है।
इसी बीच, एलारा कैपिटल ने कहा है कि ईटरनल (Eternal) इस चुनौती से निपटने में स्विगी (Swiggy) से बेहतर स्थिति में है। ब्रोकरेज ने ईटरनल पर ‘Buy’ रेटिंग बरकरार रखते हुए 400 रुपये का टारगेट रखा है, जबकि स्विगी के लिए 360 रुपये का टारगेट दिया है।
विश्लेषकों का कहना है कि ईटरनल के ग्राहक ज्यादा प्रीमियम कैटेगरी के हैं और कीमत बढ़ने का असर उन पर कम पड़ता है। ऐसे में कंपनी जरूरत पड़ने पर प्लेटफॉर्म फीस, डिलीवरी चार्ज या हैंडलिंग फीस बढ़ाकर अतिरिक्त लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों से वसूल सकती है। वहीं, स्विगी के ग्राहकों को ज्यादा कीमतें जल्दी प्रभावित कर सकती हैं।
हाल में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब 4 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है। इसका असर सीधे डिलीवरी लागत पर पड़ेगा क्योंकि फूड डिलीवरी और क्विक कॉमर्स का बड़ा हिस्सा बाइक और स्कूटर पर निर्भर है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 में ईटरनल करीब 2.7 अरब ऑर्डर और स्विगी करीब 1.4 अरब ऑर्डर संभाल सकती हैं। ऐसे में हर ऑर्डर पर थोड़ी-सी लागत बढ़ने का मतलब सालाना स्तर पर बड़ा खर्च बन सकता है।
विश्लेषकों के मुताबिक, क्विक कॉमर्स में एक ऑर्डर की डिलीवरी लागत करीब 35 से 50 रुपये तक बैठती है, जबकि फूड डिलीवरी में यह खर्च 55 से 60 रुपये तक हो सकता है। अगर इसमें ईंधन की हिस्सेदारी जोड़ें, तो अभी की बढ़ोतरी से प्रति ऑर्डर करीब 44 पैसे का अतिरिक्त असर पड़ सकता है।
अगर आने वाले 3 से 6 महीनों में तेल की कीमतें 10 रुपये प्रति लीटर तक और बढ़ती हैं, तो यह असर बढ़कर 1 से 1.2 रुपये प्रति ऑर्डर तक पहुंच सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि स्विगी पर असर ज्यादा पड़ सकता है क्योंकि उसका क्विक कॉमर्स कारोबार अभी उतना मुनाफे में नहीं है। साथ ही कंपनी के पास लागत बढ़ने की स्थिति में ज्यादा सुरक्षा नहीं है। दूसरी तरफ, ईटरनल का कारोबार बड़ा है और उसे विज्ञापनों से भी अच्छी कमाई होती है। यही वजह है कि उसके पास अतिरिक्त लागत को संभालने की बेहतर क्षमता मानी जा रही है।
विश्लेषकों के मुताबिक, असली चिंता सिर्फ डिलीवरी खर्च बढ़ने की नहीं है। अगर पेट्रोल-डीजल लंबे समय तक महंगे रहते हैं, तो लोगों का रोजमर्रा का खर्च बढ़ेगा और वे बाहर से खाना मंगाने या क्विक कॉमर्स पर कम खर्च कर सकते हैं। इसका असर ऑर्डर ग्रोथ पर पड़ सकता है। वहीं, छोटे रेस्टोरेंट, लोकल ब्रांड और डी2सी कंपनियों की लागत भी बढ़ेगी। इससे वे विज्ञापन और प्रमोशन पर खर्च कम कर सकते हैं, जिसका असर इन प्लेटफॉर्म्स की एड कमाई पर भी पड़ सकता है।
विश्लेषकों का कहना है कि फिलहाल सीधा असर संभालने लायक दिख रहा है, लेकिन आने वाले समय में ग्राहकों की मांग और खर्च के रुझान पर नजर रखना सबसे जरूरी होगा।