गोल्डमैन सैक्स के विश्लेषकों ने हाल में एक नोट में लिखा है कि भारतीय शेयर बाजारों में ‘जोखिम लेने पर फायदा मिलने’ का समीकरण उत्तर एशियाई बाजारों की तुलना में कम आकर्षक है। इसकी वजह यह है कि ये बाजार वृद्धि को समायोजित करने के बाद भी ऊंचे मूल्यांकन पर कारोबार कर रहे हैं।
गोल्डमैन सैक्स में एशिया मैक्रो रिसर्च के सह-प्रमुख और एशिया-प्रशांत इक्विटी के मुख्य रणनीतिकार टिमोथी मो ने अमृता गोयल और सुनील कौल के साथ मिलकर एक हालिया नोट में लिखा, ‘एआई के संभावित नकारात्मक असर को लेकर निवेशकों की चिंताएं भारतीय इक्विटी बाजार में बढ़त को सीमित कर रही हैं।’
गोल्डमैन सैक्स का कहना है कि मध्यावधि वाले निवेशकों को ऐसे शेयरों पर ध्यान देना चाहिए जहां विदेशी स्वामित्व और हिस्सेदारी कम है। गोल्डमैन सैक्स का मानना है कि जब विदेशी धारणा में सुधार होगा, तो ये शेयर बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।
गोल्डमैन सैक्स की राय में हिंदुस्तान यूनिलीवर (एचयूएल), लार्सन ऐंड टुब्रो, बजाज ऑटो, बैंक ऑफ बड़ौदा, ट्रेंट, सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया, सीमेंस, बजाज होल्डिंग्स ऐंड इन्वेस्टमेंट, बॉश, स्विगी, वन 97 कम्युनिकेशंस और एमआरएफ ऐसी 12 कंपनियां हैं जिन पर तेल के झटकों का कमाई पर कम असर पड़ने की आशंका है। इन पर गोल्डमैन सैक्स ने सकारात्मक नजरिया दोहराया है।
गोल्डमैन सैक्स का कहना है कि हाल के महीनों में विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली के बाद यह आशंका है कि बिकवाली का बड़ा हिस्सा समाप्त हो चुका है। हालांकि गोल्डमैन सैक्स को उम्मीद नहीं है कि तेल की कीमतों में मौजूदा स्तरों से गिरावट आने पर भी विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों में जल्द लौटेंगे।
मो ने लिखा है, ‘अनुभव बताता है कि जब तेल की कीमतें गिरती हैं, तो एफआईआई का निवेश तुरंत वापस नहीं आता। अप्रैल की शुरुआत में जब तेल की कीमतों में सुधार हुआ, तब भी विदेशी पूंजी भारतीय इक्विटी बाजार में नहीं लौटी, जबकि मार्च में तेल कीमतों में तेजी के दौरान भारी बिकवाली हुई थी। पिछले साक्ष्य दर्शाते हैं कि अल्पावधि में विदेशी प्रवाह और तेल की गिरती कीमतों के बीच थोड़ा-बहुत सकारात्मक सह-संबंध होता है।’
गोल्डमैन सैक्स के अनुसार विदेशियों ने इस साल अब तक भारतीय इक्विटी में 22 अरब डॉलर की बिकवाली की है, जो पिछले ढाई दशकों के सालाना बिकवाली रिकॉर्ड (19 अरब डॉलर की निकासी 2025 में) को पार कर गई है। 250 दिनों की रोलिंग विंडो पर मौजूदा 30 अरब डॉलर की बिकवाली 2022/2025 के 28-32 अरब डॉलर के निचले स्तर के करीब है।
रिपोर्ट के मुताबिक इक्विटी में विदेशी हिस्सेदारी कैलेंडर वर्ष 2026 की पहली तिमाही में 14 साल के सबसे निचले स्तर पर आ गई और दो दशकों से ज्यादा समय में पहली बार घरेलू संस्थानों से नीचे फिसल गई। 2026 की पहली तिमाही में सूचीबद्ध कंपनियों की शेयरधारिता के आधार पर एफआईआई की हिस्सेदारी घटकर लगभग 16 प्रतिशत रह गई, जबकि डीआईआई की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 17 प्रतिशत हो गई।
गोल्डमैन सैक्स ने बताया कि बाजार पूंजीकरण के हिसाब से विदेशी हिस्सेदारी में गिरावट की मुख्य वजह लार्जकैप थे जिनमें हिस्सेदारी घटकर 10 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई।