साल 2026 की शुरुआत में भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में नजर आ रही थी। आर्थिक वृद्धि अच्छी थी, महंगाई नियंत्रण में थी, विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत था और कच्चे तेल की कीमतें भी काफी नीचे थीं। बाजार में उम्मीद थी कि सरकार और आरबीआई की नीतियों का फायदा आने वाले समय में कंपनियों की कमाई और शेयर बाजार दोनों को मिलेगा।
लेकिन फरवरी के आखिर में पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने और अमेरिका-इजराइल की ओर से ईरान पर हमले के बाद हालात तेजी से बदल गए। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गईं और एलपीजी व एलएनजी की सप्लाई पर दबाव बढ़ गया। इसके बाद भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी असर दिखना शुरू हो गया।
अब सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो चालू खाता घाटा, रुपये और महंगाई तीनों पर दबाव बढ़ सकता है। विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने भी बाजार की चिंता बढ़ा दी है।
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वीके विजयकुमार के मुताबिक, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक यानी एफपीआई पिछले काफी समय से भारतीय बाजार में लगातार बिकवाली कर रहे हैं। 14 मई 2026 तक एफपीआई भारतीय शेयर बाजार से करीब 2.2 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं। इससे पहले 2025 में भी उन्होंने बड़ी बिकवाली की थी। वीके विजयकुमार का कहना है कि इस लगातार बिकवाली का असर रुपये पर भी पड़ा है। रुपया कमजोर होने से विदेशी निवेशकों का भरोसा और कम हुआ, जिससे बाजार में और बिकवाली बढ़ी।
अप्रैल में खुदरा महंगाई 3.48 प्रतिशत रही, जो अभी आरबीआई के दायरे में है। लेकिन वीके विजयकुमार के मुताबिक, आने वाले महीनों में महंगाई बढ़ सकती है। सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 10 रुपये प्रति लीटर घटाई थी, जिससे सरकारी राजस्व पर असर पड़ा है। वहीं उर्वरक सब्सिडी बढ़ने और तेल कंपनियों के नुकसान की वजह से सरकार पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है। वीके विजयकुमार का मानना है कि इन सबका असर वित्त वर्ष 2027 के राजकोषीय घाटे पर पड़ सकता है और यह जीडीपी के 5 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
सरकार ने 15 मई से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। वहीं सीएनजी भी 2 रुपये प्रति किलो महंगी की गई है। लेकिन तेल कंपनियों को मौजूदा कच्चे तेल की कीमतों पर अभी भी बड़ा नुकसान हो रहा है। ऐसे में आने वाले समय में ईंधन की कीमतों में और बढ़ोतरी की आशंका बनी हुई है। वीके विजयकुमार के मुताबिक, अगर कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा रहा, तो रुपया धीरे-धीरे 100 प्रति डॉलर के स्तर तक भी कमजोर हो सकता है।
वीके विजयकुमार का कहना है कि विदेशी निवेशकों की बिकवाली सिर्फ महंगे तेल की वजह से नहीं है। उनके मुताबिक, सितंबर 2024 के बाद भारतीय बाजार के वैल्यूएशन काफी महंगे हो गए थे। दूसरी तरफ अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों में कंपनियों की कमाई तेजी से बढ़ रही है। यही वजह है कि विदेशी निवेशक उन बाजारों की तरफ ज्यादा पैसा लगा रहे हैं जहां बेहतर रिटर्न और ज्यादा ग्रोथ दिख रही है।
वीके विजयकुमार का कहना है कि अमेरिका और दूसरे बड़े बाजारों में इस समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई से जुड़े शेयरों में जबरदस्त तेजी देखी जा रही है। हालांकि उनका मानना है कि इन बाजारों में वैल्यूएशन काफी ऊंचे स्तर पर पहुंच चुके हैं और कभी भी बड़ी गिरावट आ सकती है। अगर ऐसा होता है और पश्चिम एशिया का तनाव कम होता है, तो भारतीय बाजार एक बार फिर विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक बन सकता है।
(डिस्क्लेमर: यहां दी गई राय एक्सपर्ट की है। बिज़नेस स्टैंडर्ड इन विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं समझता और निवेश से पहले पाठकों को अपनी समझ से फैसला करने की सलाह देता है।)