पश्चिम एशिया में जारी तनाव अब सिर्फ कच्चे तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रह गया है। इसका असर धीरे-धीरे भारतीय बाजार, महंगाई, रुपये और आम लोगों की जेब पर भी दिखने लगा है। पिछले कुछ हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं और अब ब्रेंट क्रूड 100 से 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है।
बाजार में सबसे बड़ी चिंता ये है कि अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं, तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। महंगाई बढ़ सकती है, लोगों की खरीदारी पर असर पड़ सकता है और कंपनियों की कमाई भी दबाव में आ सकती है। यही वजह है कि निवेशक अब आने वाले महीनों को लेकर सतर्क नजर आ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल शेयर बाजार ने हालात की गंभीरता को पूरी तरह कीमतों में शामिल नहीं किया है। अगर पश्चिम एशिया का संकट लंबा चलता है और कच्चा तेल महंगा बना रहता है, तो बाजार में और दबाव देखने को मिल सकता है।
एमके ग्लोबल के मुताबिक, मौजूदा समय में निफ्टी वित्त वर्ष 2027 की अनुमानित कमाई के मुकाबले 19.1 गुना पीई पर कारोबार कर रहा है। ब्रोकरेज का मानना है कि अगर ऊर्जा संकट जारी रहता है, तो निफ्टी 21,000 तक फिसल सकता है। हालांकि ब्रोकरेज की बेस उम्मीद अब भी यही है कि आने वाले कुछ हफ्तों में अमेरिका और ईरान के बीच कोई समझौता हो सकता है, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में राहत मिल सकती है।
सरकार ने 13 मई को सोने और चांदी पर आयात शुल्क 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया। इसका मकसद चालू खाता घाटा यानी सीएडी पर दबाव कम करना है। एमके ग्लोबल का कहना है कि अगर सोने का आयात घटता है, तो इससे भारत के चालू खाता घाटे को कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि इसका असर ज्वेलरी कंपनियों पर नकारात्मक पड़ सकता है और महंगाई भी थोड़ी बढ़ सकती है।
ब्रोकरेज का मानना है कि तेल कंपनियों को मौजूदा कच्चे तेल की कीमतों पर प्रति लीटर करीब 17 से 18 रुपये का नुकसान हो रहा है। ऐसे में आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है। एमके ग्लोबल का अनुमान है कि कीमतों में करीब 10 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ोतरी की जा सकती है। हालांकि इससे महंगाई और लोगों की जेब पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
अगर कच्चे तेल की कीमतों में राहत नहीं मिलती है, तो भारतीय रिजर्व बैंक भी अगले कुछ महीनों में ब्याज दरें बढ़ा सकता है। ब्रोकरेज के मुताबिक, अगर ईंधन की कीमतों में 10 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी होती है, तो जून 2026 तक खुदरा महंगाई बढ़कर 4.4 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। हालांकि ब्याज दरें बढ़ाने से रुपये को कुछ सहारा मिल सकता है, लेकिन इससे कर्ज महंगे होंगे और लोगों की खर्च करने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।
एमके ग्लोबल का कहना है कि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक रुपये को संभालने और विदेशी मुद्रा दबाव कम करने के लिए दूसरे कदम भी उठा सकते हैं। इसमें डॉलर बाजार में हस्तक्षेप, विदेशी निवेशकों को कर राहत और विदेशों में भेजे जाने वाले पैसे पर और सख्ती जैसे कदम शामिल हो सकते हैं। ब्रोकरेज का मानना है कि अगर खाड़ी क्षेत्र का संकट जल्दी खत्म नहीं हुआ, तो भारतीय बाजार और अर्थव्यवस्था दोनों पर दबाव लंबे समय तक बना रह सकता है।