दुनिया में स्टील की मांग का नक्शा तेजी से बदल रहा है और अब नजरें भारत पर टिकती जा रही हैं। एक समय था जब चीन वैश्विक स्टील डिमांड का सबसे बड़ा इंजन था, लेकिन अब भारत उसी भूमिका की तरफ बढ़ता दिख रहा है। देश में तेजी से बढ़ता इंफ्रास्ट्रक्चर, शहरीकरण और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर स्टील की मांग को नई ऊंचाई पर ले जा रहे हैं। यही वजह है कि भारतीय मेटल कंपनियों के लिए आने वाला समय बेहद अहम माना जा रहा है।
गोल्डमैन सैक्स की हालिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि भारत में स्टील की खपत आने वाले वर्षों में जोरदार तरीके से बढ़ सकती है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2032 तक स्टील की खपत करीब दोगुनी होकर 212 मिलियन टन तक पहुंच सकती है। इसका मतलब है कि हर साल करीब 6.8 प्रतिशत की दर से वृद्धि देखने को मिल सकती है। फिलहाल भारत में प्रति व्यक्ति स्टील खपत करीब 102 किलो है, जो वैश्विक औसत का लगभग आधा है। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि भारत में स्टील की मांग बढ़ने की काफी गुंजाइश अभी बाकी है।
गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के अनुसार, 2020 से 2026 के बीच भारत की स्टील खपत में करीब 87 मिलियन टन की बढ़ोतरी हो सकती है। यह ऐसे समय में हो रहा है जब दुनिया के कई हिस्सों में स्टील की मांग सुस्त पड़ रही है। यानी वैश्विक स्तर पर मांग की जो कमी दिख रही है, उसे काफी हद तक भारत पूरा कर सकता है। यह स्थिति कुछ वैसी ही है जैसी पहले चीन के औद्योगिक विकास के दौरान देखने को मिली थी।
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भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी लागत प्रतिस्पर्धा है। देश में आयरन ओर की उपलब्धता ज्यादा है और इसकी कीमत वैश्विक स्तर की तुलना में 25 से 35 प्रतिशत तक कम है। इसका सीधा फायदा स्टील कंपनियों को मिलता है, क्योंकि उनका उत्पादन खर्च कम रहता है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि JSW Steel और जिंदल स्टील जैसी कंपनियां वैश्विक लागत के हिसाब से सबसे आगे हैं। यहां तक कि दुनिया में केवल कुछ रूसी कंपनियां ही इनसे ज्यादा प्रतिस्पर्धी मानी जाती हैं।
रिपोर्ट में JSW Steel और Shyam Metalics पर ‘खरीदारी’ की सलाह दी गई है, क्योंकि इनमें ग्रोथ की अच्छी संभावना और बिजनेस का विस्तार दिख रहा है। वहीं Tata Steel और Jindal Steel को ‘न्यूट्रल’ रेटिंग दी गई है। NMDC को लेकर चिंता जताई गई है, खासकर वॉल्यूम ग्रोथ और बढ़ती प्रतिस्पर्धा को देखते हुए।
मेटल कंपनियों के मुनाफे को लेकर भी तस्वीर बेहतर होती दिख रही है। रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे माल और तैयार उत्पाद के बीच का अंतर यानी स्प्रेड अभी लंबी अवधि के औसत से ऊपर है। इससे कंपनियों की कमाई में सुधार हो रहा है। इसके अलावा कर्ज की लागत में कमी और उत्पादन क्षमता बढ़ने से भी कंपनियों को फायदा मिल सकता है। अनुमान है कि FY25 में जहां औसत मुनाफा मार्जिन 2.7 प्रतिशत था, वह FY28 तक बढ़कर करीब 9.2 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
भारत में मेटल सेक्टर को सरकार का भी पूरा समर्थन मिल रहा है। इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़े निवेश, हाउसिंग योजनाएं और रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स स्टील की मांग को लगातार बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर बढ़ती सुरक्षा नीतियों के बीच भारत में लगाए गए सेफगार्ड ड्यूटी घरेलू कंपनियों को सुरक्षा दे रहे हैं, जिससे उनकी कीमतें और मार्जिन स्थिर बने रह सकते हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आने वाले वर्षों में स्टील कंपनियों की क्षमता उपयोग 80 प्रतिशत से ऊपर बना रह सकता है। इसका मतलब है कि मांग और सप्लाई के बीच संतुलन मजबूत रहेगा, जिससे कीमतों को भी सहारा मिलेगा।
(डिस्क्लेमर: यहां दी गई राय ब्रोकरेज की है। बिज़नेस स्टैंडर्ड इन विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं समझता और निवेश से पहले पाठकों को अपनी समझ से फैसला करने की सलाह देता है।)