Indian Equities Outlook: पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था और कंपनियों की कमाई पर दबाव बढ़ने की आशंका है। ब्रेंट क्रूड की कीमत युद्ध शुरू होने के बाद से करीब 42 प्रतिशत बढ़ चुकी है और फिलहाल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई है। इससे महंगाई बढ़ने और आर्थिक ग्रोथ धीमी पड़ने का खतरा भी बढ़ गया है।
मौजूदा वैश्विक हालात में भारतीय शेयर बाजार खासकर नॉर्थ ईस्ट एशिया के बाजारों के मुकाबले अब पहले जितना आकर्षक नहीं दिख रहा है। इस साल अब तक निफ्टी 50 करीब 6.7 प्रतिशत और सेंसेक्स करीब 7.9 प्रतिशत गिर चुके हैं, जिससे इनका प्रदर्शन वैश्विक स्तर पर कमजोर रहा है।
इन्हीं चिंताओं के चलते वैश्विक ब्रोकरेज फर्म HSBC ने भारतीय इक्विटी को “न्यूट्रल” से घटाकर “अंडरवेट” कर दिया है। खास बात यह है कि एक महीने से भी कम समय में यह दूसरी बार डाउनग्रेड किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, जून और सितंबर तिमाही तक तेल और गैस बाजार में दबाव बना रह सकता है। ऐसे में 2026 के लिए कंपनियों की कमाई का अनुमान, जो अभी करीब 16 प्रतिशत ग्रोथ दिखा रहा है, उसमें कटौती हो सकती है। अगर कच्चे तेल की कीमत 20 प्रतिशत और बढ़ती है, तो अर्निंग्स ग्रोथ करीब 1.5 प्रतिशत तक घट सकती है।
हालांकि बाजार की वैल्यूएशन पहले के मुकाबले कुछ कम हुई है, लेकिन अगर कमाई के अनुमान घटते हैं तो शेयर बाजार फिर से महंगा नजर आ सकता है।
ऊंची तेल कीमतों के चलते रुपये पर दबाव बढ़ने का खतरा है। साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते असर को लेकर आईटी सेक्टर पर भी चिंता जताई गई है। इन वजहों से विदेशी निवेशक लगातार पैसा निकाल रहे हैं। 2026 में अब तक करीब 18.5 अरब डॉलर की बिकवाली हो चुकी है, जबकि पिछले साल भी 18.9 अरब डॉलर निकाले गए थे।
हालांकि घरेलू निवेश, खासकर SIP के जरिए, बाजार को सपोर्ट मिल रहा है। लेकिन आगे IPO गतिविधियों के बढ़ने के साथ विदेशी निवेश की जरूरत फिर से बढ़ सकती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि निजी बैंक, मेटल और हेल्थकेयर सेक्टर में अभी भी चुनिंदा मौके बने हुए हैं, लेकिन कुल मिलाकर भारतीय बाजार की स्थिति पहले जितनी मजबूत नहीं रही है। (रॉयटर्स के इनपुट के साथ)