रुपया पिछले एक साल में डॉलर के मुकाबले 8.16 फीसदी कमजोर हुआ है और इरान युद्ध (Iran war) शुरू होने के बाद से इसमें 2.28 फीसदी की गिरावट आई है। कमजोर रुपया घरेलू वित्त (household finances) पर असर डालता है और निवेशकों के लिए बच्चों की विदेश में शिक्षा तथा अंतरराष्ट्रीय यात्रा जैसे डॉलर-आधारित लक्ष्यों को पूरा करना कठिन बना देता है।
मौजूदा संकट से पहले ही रुपया कमजोर हो रहा था, क्योंकि शेयर बाजार से लगातार विदेशी पोर्टफोलियो निवेश की निकासी हो रही थी और कुछ हद तक बॉन्ड बाजार से भी पैसा बाहर जा रहा था।
स्वतंत्र अर्थशास्त्री अभेक बरुआ कहते हैं, “ग्लोबल टैरिफ संकट, खासकर अमेरिका द्वारा भारत पर लगाया गया 50 फीसदी टैरिफ, ने दबाव को और बढ़ा दिया।”
पिछले एक महीने में पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया है। ईंधन और उर्वरक आयात पर भारत की भारी निर्भरता उसे इस स्थिति में विशेष रूप से संवेदनशील बनाती है।
युद्ध कब तक जारी रहेगा, इस अनिश्चितता ने निवेशकों में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति को बढ़ा दिया है। बरुआ कहते हैं, “ऐसे समय में निवेशक सुरक्षित विकल्प के रूप में डॉलर की ओर रुख करते हैं, जिससे अन्य मुद्राओं के मुकाबले डॉलर मजबूत हो जाता है।”
रुपया आगे कितना गिरेगा, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि संघर्ष कितने समय तक चलता है। तेल, तेल उत्पादों, उर्वरकों और उनके कच्चे माल के लिए पश्चिम एशिया पर भारत की निर्भरता दबाव को और बढ़ा सकती है। हालांकि भारत ने तेल के लिए रूस का रुख किया है, लेकिन यह सप्लाई हाई प्रीमियम पर मिल रही है, जिससे देश का तेल आयात बिल पहले ही काफी बढ़ चुका है।
लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष भारत के बाहरी संतुलन को और बिगाड़ सकता है। एमके वेल्थ मैनेजमेंट के रिसर्च हेड जोसेफ थॉमस कहते हैं,“यदि युद्ध जारी रहता है तो ऊंची तेल कीमतें और कमजोर रुपया मिलकर व्यापार घाटे को और बढ़ाएंगे। बढ़ता हुआ व्यापार घाटा रुपये पर अतिरिक्त दबाव डालेगा।”
बरुआ के मुताबिक, यदि हालात और बिगड़ते हैं तो रुपया डॉलर के मुकाबले 100 के स्तर तक फिसल सकता है। वहीं, अगर अगले कुछ हफ्तों में संघर्ष थम जाता है, तो रुपये में सुधार देखने को मिल सकता है और यह 91-92 के दायरे में लौट सकता है।
कमजोर होता रुपया घर-परिवार की वित्तीय स्थिति पर व्यापक असर डालता है।
डीजल, पेट्रोल और एलपीजी जैसे जरूरी ईंधनों पर उपभोक्ताओं को विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क में कटौती के कारण कुछ राहत मिली है। हालांकि, यह राहत कब तक जारी रह पाएगी, इसको लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। यदि कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ती हैं, तो सरकार के लिए उत्पाद शुल्क में और कटौती करना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इससे राजकोषीय दबाव बढ़ेगा।
एविएशन टरबाइन फ्यूल पहले ही महंगा हो चुका है, जिससे हवाई यात्रा की लागत बढ़ेगी। बरुआ के अनुसार, “उर्वरकों की बढ़ती कीमतें फूड इंफ्लेशन को बढ़ावा दे सकती हैं।”
भविष्य में यदि ईंधन की कीमतों में वृद्धि की अनुमति दी जाती है, तो अधिकांश निर्मित वस्तुओं की लागत बढ़ेगी, जिससे लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति (कॉस्ट-पुश इंफ्लेशन) का दबाव बनेगा।
तरलता में कमी और बॉन्ड यील्ड बढ़ने के बीच, कर्ज लेना भी कठिन हो सकता है। बरुआ के मुताबिक, “बैंक अधिक चयनात्मक हो जाएंगे और उच्च गुणवत्ता वाले उधारकर्ताओं को प्राथमिकता देंगे।”
भविष्य में रीपो रेट में किसी भी बढ़ोतरी का असर फ्लोटिंग रेट वाले कर्जों पर ब्याज दरों में वृद्धि के रूप में दिखाई देगा।
विदेश में शिक्षा का खर्च उठाने वाले परिवार सीधे तौर पर रुपये की कमजोरी से प्रभावित होते हैं।
कमजोर रुपया आयात लागत को बढ़ाता है और इससे अर्थव्यवस्था में महंगाई पर भी दबाव बढ़ता है।
हालांकि, कुछ राहत की गुंजाइश भी है। थॉमस कहते हैं, चूंकि मौजूदा स्थिति जारी युद्ध से जुड़ी है, इसलिए कीमतों पर इसका असर अस्थायी हो सकता है, न कि लंबे समय तक रहने वाला।
परिवारों को यह भी याद रखना चाहिए कि डॉलर के मुकाबले रुपये की संरचनात्मक कमजोरी होती है। एप्रिशिएट के फाउंडर और सीईओ सुभो मौलिक कहते हैं, “लंबे समय में भी, इसकी कीमत सालाना लगभग 4-5 फीसदी गिरती है।”
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घर-परिवारों को यह समझना होगा कि वैश्विक परिस्थितियों से आने वाले झटके अब भारत के लिए अधिक सामान्य होते जा रहे हैं। महंगाई बढ़ने की आशंका के बीच, सुरक्षित और लिक्विड निवेश हर पोर्टफोलियो का हिस्सा होना चाहिए।
बरुआ कहते हैं, “घर-परिवारों को अपने धन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सुरक्षित साधनों, जैसे फिक्स्ड डिपॉजिट और लिक्विड म्युचुअल फंड में रखना चाहिए। भले ही इन पर रिटर्न कम मिले। तरलता महत्वपूर्ण है, क्योंकि अचानक आने वाली जरूरतों के लिए तुरंत नकदी की आवश्यकता पड़ सकती है।”
परिवारों को यह सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए कि अस्थिर मुद्रा माहौल में वे वास्तव में विदेश में शिक्षा का खर्च उठा सकते हैं या नहीं। बरुआ कहते हैं, “विदेशी शिक्षा के लिए अतिरिक्त बफर रखना चाहिए और उसका आकार सोच-समझकर तय करना चाहिए। भले ही बाद में मुद्रा में सुधार हो जाए, परिवारों को पढ़ाई के दौरान लागत में तेज बढ़ोतरी के दौर के लिए तैयार रहना चाहिए।”
बच्चे की यूनिवर्सिटी शिक्षा का खर्च डॉलर में तय होता है। मौलिक के मुताबिक,
“व्यावहारिक तरीका यह है कि एसेट की मुद्रा को लक्ष्य की मुद्रा से मेल कराया जाए। यदि पूरा पोर्टफोलियो रुपये में है और लक्ष्य डॉलर में, तो इससे धीरे-धीरे लगातार नुकसान होता रहेगा।”
यहां कुछ निवेश विकल्प दिए गए हैं, जो निवेशकों को कमजोर होते रुपये के प्रभाव से बचने में मदद कर सकते हैं
निवेशक अपने लॉन्ग टर्म इक्विटी पोर्टफोलियो में लगभग 20 फीसदी आवंटन अमेरीकी इक्विटी फंड में करना शुरू कर सकते हैं। मजबूत डॉलर ऐसे डॉलर-आधारित निवेशों की रुपये में वैल्यू बढ़ा देता है।
डेज़रव के प्रिंसिपल ऑफिसर प्रतीक बगड़िया कहते हैं, “भारतीय फंड हाउस द्वारा पेश किए गए अंतरराष्ट्रीय म्युचुअल फंड सुविधाजनक होते हैं, क्योंकि निवेशक भारतीय नियामकीय और टैक्स ढांचे के भीतर ही रहते हैं।”
ये फंड उन वैश्विक कंपनियों तक पहुंच देते हैं, जो भारत में मौजूद नहीं हैं। बगड़िया के मुताबिक, “केवल भारत तक सीमित रहना वैश्विक अवसरों के बड़े हिस्से को नजरअंदाज करना है।”
साथ ही, ये फंड पोर्टफोलियो में वास्तविक डाइवर्सिफिकेशन भी देते हैं, क्योंकि भारतीय और अमेरिकी शेयर बाजार हमेशा एक ही दिशा में नहीं चलते।
हालांकि, इस रास्ते से निवेश की सबसे बड़ी बाधा 7 अरब डॉलर की इंडस्ट्री-स्तर की विदेशी निवेश सीमा है। बगड़िया के अनुसार, “इस सीमा के कारण कई अच्छे अंतरराष्ट्रीय फंड नए निवेश के लिए बंद हो गए हैं।”
मौलिक कहते हैं, “जब यह सीमा पूरी हो जाती है, तो सब्सक्रिप्शन रुक सकते हैं और यूनिट्स ऊंचे प्रीमियम पर ट्रेड करने लगती हैं।” वे सलाह देते हैं कि निवेशकों को उन अंतरराष्ट्रीय म्युचुअल फंड्स से बचना चाहिए, जो अपने नेट एसेट वैल्यू (NAV) से प्रीमियम पर ट्रेड कर रहे हों।
अंतरराष्ट्रीय फंड्स का टैक्स ट्रीटमेंट घरेलू इक्विटी फंड्स जितना अनुकूल नहीं होता।
ज्यादातर भारतीय निवेशकों के लिए, अंतरराष्ट्रीय निवेश की शुरुआत अमेरिका से करना स्वाभाविक विकल्प हो सकता है। यदि किसी निवेशक के पास पहले से अमेरिकी एक्सपोजर है, तो ग्लोबल या डाइवर्सिफाइड इंटरनेशनल फंड बेहतर विकल्प हो सकता है।
निवेश करते समय पैसिव रणनीति अपनाना बेहतर माना जाता है। बगड़िया के अनुसार, “लंबी अवधि में अमेरिकी बाजार में एक्टिव मैनेजर लगातार अल्फा जनरेट करने में संघर्ष करते हैं।”
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सोना पारंपरिक रूप से रुपये की गिरावट के खिलाफ सबसे प्रभावी बचाव साधनों में से एक माना जाता है। जब डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है, तो भले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने की कीमत ज्यादा न बढ़े, लेकिन रुपये में इसकी कीमत बढ़ जाती है।
अरविंद राव एंड एसोसिएट्स के फाउंडर अरविंद राव कहते हैं, “यदि वैश्विक अनिश्चितता के कारण सोने की कीमतें बढ़ती हैं और उसी समय रुपया भी कमजोर होता है, तो भारतीय निवेशकों को दोहरा फायदा मिलता है।”
निवेशक Liberalised Remittance Scheme (LRS) के जरिए विदेशी एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETF), म्युचुअल फंड और शेयरों में निवेश कर सकते हैं।
इस मार्ग पर कोई इंडस्ट्री-स्तर की सीमा नहीं है। चार सदस्यों वाला एक परिवार सालाना 10 लाख डॉलर तक विदेश में निवेश कर सकता है।
इस विकल्प की कुछ कमियां भी हैं। 10 लाख रुपये से अधिक के रेमिटेंस पर 20 फीसदी टैक्स कलेक्टेड एट सोर्स (TCS) लगने से नकदी पर दबाव पड़ता है। हालांकि निवेशक बाद में इसे वापस ले सकते हैं।
विदेशी एसेट्स रखने वाले भारतीय निवासियों के लिए हर साल आयकर रिटर्न (ITR) में शेड्यूल FA का खुलासा करना अनिवार्य है। जानकारी न देने पर Black Money Act के तहत प्रति वर्ष 10 लाख रुपये तक का जुर्माना लग सकता है।
भारतीय निवेशकों को अमेरिका में 60,000 डॉलर से अधिक की संपत्ति पर एस्टेट टैक्स का जोखिम भी झेलना पड़ सकता है।
निवेशकों को व्यवस्थित तरीके से निवेश करना चाहिए, न कि तात्कालिक प्रतिक्रिया में। मौलिक कहते हैं, “LRS के जरिए निवेश का सबसे खराब तरीका है रुपये में गिरावट से जुड़ी सुर्खियों के आधार पर एकमुश्त रेमिटेंस करना।”
शुरुआत में निवेशकों को व्यक्तिगत शेयरों की बजाय ईटीएफ (ETF) का विकल्प चुनना चाहिए। विदेशी शेयरों और ईटीएफ को 24 महीने या उससे अधिक समय तक होल्ड करना चाहिए, ताकि लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (LTCG) का लाभ मिल सके।
अमेरिकी शेयरों से अच्छा-खासा डिविडेंड पाने वाले निवेशकों को टैक्स क्रेडिट का दावा करने के लिए आयकर रिटर्न (ITR) दाखिल करने से पहले फॉर्म 67 भरना जरूरी है।
निवेशकों को वित्त वर्ष समाप्त होने से पहले TCS रिकवरी की योजना बना लेनी चाहिए। वेतनभोगी निवेशकों को TCS कटने के तुरंत बाद अपने नियोक्ता को फॉर्म 12BAA के जरिए इसकी जानकारी देनी चाहिए।