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BSE की डेरिवेटिव में बाजार हिस्सेदारी 20% के पार, एनएसई को कड़ी टक्कर

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एक साल से भी कम समय में 0 से 21 फीसदी पहुंचा हिस्सा, इस हिस्से में औऱ इजाफे की उम्मीद

Last Updated- May 02, 2024 | 8:57 AM IST
BSE gets Sebi approval for derivatives on BSE Focused Midcap index

बीएसई लिमिटेड (विगत में बंबई­ स्टॉक एक्सचेंज) की बाजार हिस्सेदारी डेरिवेटिव सेगमेंट में 20 फीसदी के पार निकल गई। इसके साथ ही उसकी बड़े प्रतिस्पर्धी नैशनल स्टॉक एक्सचेंज के साथ मुकाबला और बढ़ गया है। करीब एक साल पहले तक इस क्षेत्र में एनएसई का ही एकाधिकार था।

अप्रैल में बीएसई का रोजाना का औसत कारोबार 89 लाख करोड़ रुपये रहा जो रोज के कुल औसत कारोबार 432 लाख करोड़ रुपये (ऑप्शन के नोशनल वॉल्यूम पर आधारित) का 20.6 फीसदी बैठता है।

पिछले महीने एनएसई का रोजाना का औसत कारोबार लगातार दूसरे महीने मासिक आधार पर घटकर 343 लाख करोड़ रुपये रह गया था। इससे संकेत मिलता है कि डेरिवेटिव के हिस्से में वृद्धि थम गई है और वॉल्यूम सृजित करने वाला कुछ हिस्सा शायद बीएसई में चला गया है।

उद्योग के प्रतिभागियों ने कहा कि बीएसई का डेरिवेटिव प्लेटफॉर्म बाजार के निवेशकों के बीच ज्यादा स्वीकार्य होने लगा है। एक्सचेंज के अब 35 लाख यूनिक इन्वेस्टर, करीब 400 ब्रोकर, 100 एफपीआई हैं जो उसके प्लेटफॉर्म पर ट्रेड करते हैं।

साथ ही कुछ अल्गो ट्रेडर भी हैं, जिन्हें वॉल्यूम सृजन के मामले में सक्रिय माना जा रहा है। जब बीएसई ने सेंसेक्स व बैंकेक्स डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट मई 2023 में दोबारा पेश किया था तब उसे 10 से भी कम ब्रोकरों का समर्थन था।

बाजार पर नजर रखने वालों ने कहा कि नए एमडी व सीईओ सुंदररामन राममूर्ति की अगुआई में बीएसई ने बेहतरी से कदम उठाए हैं। एक्सचेंज ने सेंसेक्स व बैंकेक्स में ट्रांजेक्शन शुल्क व कारोबार का आकार छोटा रखा है। साथ ही अपने वॉल्यूम में मजबूती की खातिर ब्रोकरों, सॉफ्टवेयर डेवलपरों और अल्गो ट्रेडरों को जोड़ा है।

अलग-अलग प्रॉडक्ट के लिए अलग-अलग एक्सपायरी डेट रखने की रणनीति भी अच्छी साबित हुई है क्योंकि ज्यादातर वॉल्यूम, कॉन्ट्रैक्ट एक्सपायर होने के दिन सृजित होता है।

एक्सचेंज के पास अभी भी कई और तरीके हैं और विश्लेषकों को लगता है कि इस वित्त वर्ष में बीएसई की बाजार हिस्सेदारी 30 फीसदी के पार चली जाएगी। बीएसई ने मासिक अनुबंध की एक्सपायरी डेट बदलकर माह के आखिरी गुरुवार की बजाय दूसरा गुरुवार करने का ऐलान किया है, जैसा कि एनएसई में होता है।

इस कदम को प्रॉडक्ट को अलग बताने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है जो सेंसेक्स व बैंकेक्स के मामले में कारगर रहा है। एक्सचेंज अब एफपीआई की संख्या बढ़ाने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। साथ ही वह और डिस्काउंट ब्रोकरों व अल्गो ट्रेडरों के साथ अपने प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल के लिए बातचीत कर रहा है।

हालिया नोट में एचडीएफसी सिक्योरिटीज ने कहा है कि बैंकेक्स वॉल्यूम में वृद्धि की अगुआई में बीएसई का डेरिवेटिव में रोजाना औसत कारोबार वित्त वर्ष 26 तक 114 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच सकता है और उसकी बाजार हिस्सेदारी 30 फीसदी के पार जा सकती है।

एक महीने पहले एचडीएफसी सिक्योरिटीज के विश्लेषकों अमित चंद्रा और धनंजय जैन ने एक नोट में कहा कि बीएसई के लिए डेरिवेटिव की वृद्धि बैंकेक्स कॉन्ट्रैक्ट की बढ़त की अगुआई में जारी रहेगी। साथ ही बड़े डिस्काउंट ब्रोकरों के यहां इसके कारोबार की सुविधा, अल्गो व प्रोप्राइटरी ट्रेड का ज्यादा वॉल्यूम व एफपीआई की ज्यादा भागीदारी से भी उसे मदद मिलेगी।

हालांकि बीएसई को हाल में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। बाजार नियामक ने स्पष्ट किया है कि बीएसई को ऑप्शन ट्रेड की नोशनल वैल्यू पर नियामकीय शुल्क अदा करना है, न कि प्रीमियम टर्नओवर पर। वित्त वर्ष 23-24 के लिए बीएसई ने कहा है कि उसे सेबी के नियामकीय शुल्क के अंतर के तौर पर 96.3 करोड़ रुपये चुकाने हैं।

शुल्क के तौर पर ज्यादा रकम निकलने से वित्त वर्ष 25 व वित्त वर्ष 26 में बीएसई के लाभ पर करीब 18 फीसदी का असर पड़ने की आशंका है। इसकी भरपाई के लिए बीएसई ने बैंकेक्स व सेंसेक्स ऑप्शन पर लेनदेन शुल्क बढ़ा दिया है।

एक नोट में इन्वेस्टेक ने कहा कि एनएसई का लेनदेन शुल्क अभी बीएसई के मुकाबले 40 फीसदी ज्यादा है और लेनदेन शुल्क में 35 फीसदी की बढ़ोतरी उसे एनएसई के बराबर ले आएगी जिससे उसे अपना लाभ सुनिश्चित रखने में मदद मिलेगी। हालांकि यह देखना अभी बाकी है कि ये लेनदेन शुल्क उसके वॉल्यूम पर क्या असर डालते हैं और एनएसई के साथ उसके समीकरण में क्या बदलाव लाते हैं।

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First Published - May 1, 2024 | 10:56 PM IST

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