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Equity से Gold तक: फाइनैंशियल ईयर के आखिर में पोर्टफोलियो कैसे करें रीबैलेंस?

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निवेशकों के लिए यह समय अपनी होल्डिंग्स का रिव्यू करने और एक सिस्टमैटिक रोडमैप के आधार पर आगे की रणनीति तय करने का है

Last Updated- March 30, 2026 | 3:37 PM IST
Portfolio Review

Year-end portfolio review: पिछले एक साल में विभिन्न एसेट क्लास के प्रदर्शन में उतार-चढ़ाव, पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और इसके चलते ईंधन कीमतों में तेजी, साथ ही ब्याज दरों के रुख में बदलाव जैसे कई कारकों ने निवेश रणनीति (investment strategy) पर असर डाला है। इन परिस्थितियों को देखते हुए एक्सपर्ट्स का मानना है कि चालू वित्त वर्ष के समापन से पहले निवेश पोर्टफोलियो को रीबैलेंस करना जरूरी हो गया है। वित्तीय सलाहकार (financial planner) के बिना निवेश करने वाले निवेशकों के लिए यह समय अपनी होल्डिंग्स का रिव्यू करने और एक सिस्टमैटिक रोडमैप के आधार पर आगे की रणनीति तय करने का है।

Equity Mutual Funds: फीका रहा रिटर्न

पिछले एक साल में इक्विटी म्युचुअल फंड्स का प्रदर्शन कमजोर रहा है। हालांकि फरवरी के अंत तक बाजार में सुधार दिखा था, लेकिन ईरान युद्ध के शुरू होने और इसके बाद तेल की कीमतों में आई तेजी ने रिटर्न पर बड़ा असर डाला।

यूटीआई एसेट मैनेजमेंट कंपनी के एग्जीक्यूटिव वाइस-प्रेसिडेंट (इक्विटी) वी. श्रीवत्स के अनुसार, “मौजूदा युद्ध ने मैक्रो माहौल को प्रभावित किया है क्योंकि 90 डॉलर प्रति बैरल के भाव से ऊपर का तेल चालू खाता घाटा, महंगाई और कच्चे माल की लागत पर दबाव डालता है।”

अगले वित्त वर्ष के लिए प्रति शेयर आय (EPS) में 13 फीसदी की वृद्धि का ब्लूमबर्ग का अनुमान फिलहाल दबाव में दिख रहा है। श्रीवत्स के अनुसार, “कच्चे तेल और उससे जुड़े उत्पादों की ऊंची कीमतों के कारण इस अनुमान में कटौती हो सकती है।”

बाजार में स्थिरता के लिए युद्ध का जल्द समाप्त होना जरूरी है। हालांकि संघर्ष खत्म होने के बाद भी सुधार में समय लग सकता है। श्रीवत्स कहते हैं, “कच्चे तेल, गैस और संबंधित उत्पादों में व्यवधान से होने वाली आय में कटौती को बाजार को समाहित करने में समय लगेगा।”

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Year-end Portfolio review: निवेशकों को क्या करना चाहिए?

कम रिटर्न के बावजूद निवेशकों को अपने सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) जारी रखने चाहिए। प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के फाउंडर और सीईओ विशाल धवन के अनुसार, “जिन निवेशकों का इक्विटी में निवेश कम हो गया है, उन्हें SIP और सिस्टेमैटिक ट्रांसफर प्लान (STP) के जरिए धीरे-धीरे संतुलन बनाना चाहिए।”

मनीएडस्कूल के फाउंडर अर्नव पंड्या कहते हैं, “जिन निवेशकों के लक्ष्य पांच से छह साल दूर हैं, उन्हें इस समय का उपयोग मजबूत इक्विटी एक्सपोजर बनाने के लिए करना चाहिए।”

निवेशकों को एक डायवर्सिफाइड इक्विटी पोर्टफोलियो बनाए रखना चाहिए, जिसमें लार्ज-कैप, मिड-कैप और स्मॉल-कैप फंड का संतुलित मिश्रण हो। साथ ही घरेलू और अंतरराष्ट्रीय इक्विटी में भी निवेश बनाए रखना जरूरी है।

स्थिरता के लिए डेट निवेश

पिछले एक साल में शॉर्ट और मीडियम ड्यूरेशन फंड्स ने बेहतर प्रदर्शन किया, जबकि लॉन्ग ड्यूरेशन फंड्स पिछड़ गए। इस दौरान ब्याज दरें सीमित दायरे में रहीं, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में इजाफा नहीं किया और वैश्विक अनिश्चितताओं के चलते लंबी अवधि की यील्ड्स में उतार-चढ़ाव बना रहा।

एक्सिस म्युचुअल फंड के फिक्स्ड इनकम हेड देवांग शाह के अनुसार, “भू-राजनीतिक जोखिम, स्टेट डेवलपमेंट लोन (SDL) की बढ़ी सप्लाई और हाल में कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता के कारण यील्ड्स में स्पष्ट और टिकाऊ गिरावट नहीं आ पाई, जो लॉन्ग ड्यूरेशन और गिल्ट फंड्स के बेहतर प्रदर्शन के लिए जरूरी होती है।”

डेट फंड्स में रिटर्न का प्रमुख आधार एक्रूअल रहा है। शाह के अनुसार, “यील्ड कर्व के फ्रंट और मिड हिस्से में हाई कैरी, पर्याप्त लिक्विडिटी और सीमित मार्क-टू-मार्केट उतार-चढ़ाव के कारण शॉर्ट और मीडियम ड्यूरेशन फंड्स को फायदा मिला।”

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शॉर्ट ड्यूरेशन फंड्स की ओर बढ़ें

निवेशकों को स्थिरता, नियमित आय और डायवर्सिफिकेशन के लिए डेट फंड्स में निवेश बनाए रखना चाहिए। बढ़ती तेल कीमतें महंगाई को फिर से बढ़ा सकती हैं। शाह कहते हैं, “दो से पांच साल की अवधि वाली कॉरपोरेट बॉन्ड को अपने डेट पोर्टफोलियो का मुख्य हिस्सा बनाएं। इन सेगमेंट्स में रिस्क-रिटर्न संतुलन बेहतर है।”

लॉन्ग ड्यूरेशन फंड्स में एक्सपोजर घटाएं

शाह के अनुसार, “सिर्फ ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद के आधार पर लॉन्ग ड्यूरेशन या गिल्ट फंड्स में बड़े दांव लगाने से बचें।” हालांकि, यदि लंबी अवधि में ब्याज दरों में गिरावट की उम्मीद है और आपके पास पर्याप्त निवेश अवधि (होराइजन) है, तो इनमें सीमित निवेश बनाए रखा जा सकता है।
विशाल धवन कहते हैं, “लॉन्ग टर्म निवेशकों को लगभग 80 फीसदी राशि शॉर्ट-ड्यूरेशन डेट फंड्स और और 20 फीसदी रकम लॉन्ग ड्यूरेशन फंड्स में रखना चाहिए।”

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Commodity Funds में मिला जबरदस्त रिटर्न

पिछले एक साल में गोल्ड और सिल्वर फंड्स ने शानदार प्रदर्शन किया है। निप्पॉन इंडिया म्युचुअल फंड के कमोडिटी हेड और फंड मैनेजर विक्रम धवन के अनुसार, “केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीद, भूराजनीतिक अनिश्चितता और सुरक्षित निवेश (हेज) के रूप में कीमती धातुओं में बढ़ती निवेशक रुचि ने सोने को सहारा दिया।”

चांदी को भी निवेश मांग और एनर्जी ट्रांसमिशन से जुड़े औद्योगिक उपयोग के कारण फायदा मिला। विक्रम धवन कहते हैं, “वास्तविक ब्याज दरों में गिरावट की उम्मीद, एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स (ETFs) में मजबूत निवेश और मोमेंटम आधारित भागीदारी ने कीमतों में तेजी को और बढ़ाया।”

रिटर्न में आ सकता है संतुलन

आगे का आउटलुक पॉजिटिव बना हुआ है, लेकिन हाल की तेज तेजी के बाद रिटर्न सामान्य हो सकते हैं। विक्रम धवन के अनुसार, “बुनियादी कारक मजबूत हैं, लेकिन असाधारण तेजी के बाद रिटर्न सामान्य स्तर पर आ सकते हैं।” हालांकि, औद्योगिक मांग कमजोर पड़ने पर चांदी पर दबाव आ सकता है।

पिछले रिटर्न के पीछे न भागें

कीमती धातुओं में रिटर्न अस्थिर और चरणों में आते हैं। विक्रम धवन कहते हैं, “कमोडिटी बाजार में मजबूत तेजी के दौरान भी अचानक और तेज गिरावट (मीन रिवर्जन) देखने को मिल सकती है।”

कमजोर दौर में धीरे-धीरे निवेश बढ़ाएं और तेजी के समय पोर्टफोलियो को संतुलित करें। कुल पोर्टफोलियो में गोल्ड और सिल्वर का हिस्सा 15 फीसदी के भीतर रखें (लगभग 10 फीसदी सोना और 5 फीसदी चांदी)।

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पोर्टफोलियो में रिबैलेसिंग जरूरी

कई निवेशकों का पोर्टफोलियो इस समय गोल्ड और सिल्वर में ओवरवेट हो गया होगा। सेबी-रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार और SahajMoney.com के फाउंडर अभिषेक कुमार कहते हैं, “चांदी में तीन अंकों की तेजी और सोने में मजबूत रिटर्न के कारण एसेट एलोकेशन में बड़ा बदलाव आया है, जिसे अब संतुलित करना जरूरी है।”

निवेशकों को आंशिक मुनाफावसूली (प्रॉफिट बुकिंग) कर अपने मूल एसेट एलोकेशन को बहाल करना चाहिए। कुमार के मुताबिक, इससे प्राप्त धन को इक्विटी और शॉर्ट ड्यूरेशन डेट फंड्स में निवेश करना बेहतर रहेगा।

पंड्या कहते हैं, “जिन पोर्टफोलियो में इक्विटी का हिस्सा ज्यादा है, खासकर स्मॉल-कैप की ओर झुकाव अधिक है, उन्हें रीबैलेंस करने की जरूरत है।”

पिछले एक साल में वैश्विक बाजार घरेलू बाजार की तुलना में अधिक स्थिर रहे हैं। निवेशकों को भौगोलिक डायवर्सिफिकेशन का लाभ लेने के लिए अपने इक्विटी पोर्टफोलियो का लगभग 20 फीसदी हिस्सा ग्लोबल फंड्स में रखना चाहिए।

पंड्या के अनुसार, निवेशकों को अपने फंड्स की गुणवत्ता की नियमित समीक्षा करनी चाहिए और यदि लगातार कमजोर प्रदर्शन दिखे तो बदलाव करना चाहिए। अंत में, यदि युद्ध के कारण बढ़ी अस्थिरता आपकी नींद खराब कर रही है, तो इक्विटी में एक्सपोजर कम करना बेहतर हो सकता है।

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First Published - March 30, 2026 | 3:37 PM IST

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