अगर आप आने वाले महीनों में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने की आशंका से परेशान हैं, तो यह चिंता बेवजह नहीं है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और तेल की सप्लाई को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच कच्चे तेल की कीमतों में फिर उछाल आने का खतरा बढ़ गया है। इसका असर सिर्फ ईंधन की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर भी पड़ सकता है।
ब्रोकरेज फर्म एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए ब्रेंट क्रूड के औसत भाव का अनुमान 80 डॉलर प्रति बैरल से बढ़ाकर 90 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है। हालांकि कंपनी को उम्मीद है कि वित्त वर्ष की चौथी तिमाही तक कीमतें घटकर करीब 75 डॉलर प्रति बैरल तक आ सकती हैं, लेकिन फिलहाल बाजार में जोखिम काफी ज्यादा बना हुआ है।
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद ब्रेंट क्रूड का भाव 125 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। बाद में अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की उम्मीद में कीमतों में करीब 25 फीसदी की गिरावट आई। लेकिन एमके ग्लोबल का कहना है कि कीमतों में यह गिरावट पूरी तस्वीर नहीं दिखाती। असल समस्या यह है कि वैश्विक तेल बाजार में सप्लाई और मांग का संतुलन अभी भी दबाव में है।
रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में जमा तेल का भंडार तेजी से कम हो रहा है। कई देशों ने आपातकालीन भंडार का इस्तेमाल किया है, जबकि कुछ देशों ने अपने पुराने स्टॉक बाजार में उतारे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि जून के आखिर या जुलाई की शुरुआत तक वैश्विक तेल भंडार ऐसे स्तर पर पहुंच सकता है, जहां बाजार में किसी भी नई बाधा का बड़ा असर दिख सकता है।
दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य अभी भी चिंता का विषय बना हुआ है। पश्चिम एशिया से निकलने वाला बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से दुनिया के दूसरे देशों तक पहुंचता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर इस मार्ग से तेल की आवाजाही जल्द सामान्य नहीं हुई, तो तेल की कीमतों में फिर तेज उछाल आ सकता है।
एमके ग्लोबल का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी समझौते की संभावना फिलहाल काफी कम है। दोनों देशों के बीच कई अहम मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं। ब्रोकरेज का कहना है कि अगर तनाव फिर बढ़ता है, तो ब्रेंट क्रूड का भाव 150 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर जा सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अब तक कुछ वजहों से तेल की कीमतों में और बड़ी तेजी नहीं आई है।
इनमें प्रमुख हैं:
महंगे तेल का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। इसी वजह से एमके ग्लोबल ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान 6.6 फीसदी से घटाकर 6.3 फीसदी कर दिया है। हालांकि सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) वृद्धि दर 6.5 फीसदी रहने का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर तेल महंगा रहता है और अल नीनो की वजह से मानसून प्रभावित होता है, तो आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है।
ब्रोकरेज का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में पेट्रोल और डीजल के दाम करीब 10 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ सकते हैं। हालांकि बाद में अगर कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आती है, तो कुछ राहत मिल सकती है।
महंगे तेल की वजह से भारत का आयात बिल बढ़ सकता है। इसी को देखते हुए एमके ग्लोबल ने चालू खाते के घाटे (सीएडी) का अनुमान बढ़ाकर जीडीपी के 2.3 फीसदी कर दिया है। पहले यह अनुमान 1.7 फीसदी था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर तेल लंबे समय तक महंगा रहता है, तो इसका पूरा बोझ सिर्फ ग्राहकों पर नहीं डाला जाना चाहिए। ब्रोकरेज का मानना है कि सरकार, तेल विपणन कंपनियां और उपभोक्ता, तीनों को इसका असर साझा करना चाहिए। इससे आर्थिक विकास पर पड़ने वाला नुकसान कम किया जा सकेगा।
रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार पर सीधा वित्तीय बोझ बहुत ज्यादा नहीं होगा। लेकिन अगर विदेशी निवेश का प्रवाह कमजोर रहा, तो बढ़ते बाहरी घाटे की फंडिंग करना भारत के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। यानी फिलहाल सबसे बड़ा सवाल सिर्फ तेल की कीमत नहीं, बल्कि यह है कि अगर वैश्विक हालात और बिगड़ते हैं तो भारत अपनी आर्थिक रफ्तार को कितना संभाल पाता है।