भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी ) फिर से कमोडिटी बाजारों पर नीतिगत ध्यान देने जा रहा है। इसके लिए पांच साल बाद उसकी योजना अपने कमोडिटी डेरिवेटिव्स मार्केट रेगुलेशन डिपार्टमेंट (सीडीएमआरडी) को फिर से शुरू करने की है। इस विभाग को पहले एक अन्य विभाग के साथ मिला दिया गया था।
सूत्रों के अनुसार जुलाई से इस विभाग को फिर से शुरू किया जा सकता है। इसकी देखरेख के लिए कार्यकारी निदेशक नियुक्त किया जाएगा। इससे कमोडिटी डेरिवेटिव पर नियामक का ध्यान फिर से बढ़ने का संकेत मिलता है। संसाधनों के दोहराव से बचने के लिए 2021 में सीडीएमआरडी को बाजार नियमन विभाग (एमआरडी) के साथ मिला दिया गया था क्योंकि ये दोनों विभाग एक्सचेंज और ब्रोकर जैसे साझा हितधारकों के साथ काम करते थे।
पिछले एक साल में कमोडिटी डेरिवेटिव के तंत्र से जुड़े प्रतिभागियों ने नियामक से बार-बार आग्रह किया है कि इस सेगमेंट के लिए समर्पित विभाग फिर से शुरू किया जाए। एक सूत्र ने कहा, सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय के कार्यभार संभालने के बाद उद्योग की सबसे शुरुआती मांगों में से एक इस विभाग को फिर से शुरू करना था। सेबी ने उद्योग को आश्वासन दिया था कि वह इस अनुरोध पर गौर करेगा और इस विभाग को वापस शुरू करना एक स्वस्थ और स्वागत योग्य कदम होगा।
पहले यह विभाग कमोडिटी डेरिवेटिव सेगमेंट में मार्केट इन्फ्रास्ट्रक्चर इंस्टिट्यूशंस (एमआईआई) से जुड़े नीतिगत मामलों, निगरानी और गवर्नेंस का काम देखता था। वह हितधारकों के साथ सलाह-मशवरा भी करता था। साथ ही, इस विभाग का काम निरीक्षण, निगरानी, शिकायतों का निपटारा, अनुशासन की कार्रवाई, डेटाबेस का रखरखाव और निवेशकों को जागरूक करने से जुड़ी पहलों को भी देखना था।
सूत्रों ने संकेत दिया कि विभाग को ये जिम्मेदारियां फिर से मिल सकती हैं। उद्योग के एक विशेषज्ञ ने कहा, एमआरडी के साथ विलय के बाद यह धारणा बन गई थी कि कमोडिटीज पर नीतिगत ध्यान कम हो गया है। इस पुनरुद्धार से संकेत मिलता है कि नियामक इस क्षेत्र को विकसित करने में फिर से दिलचस्पी ले रहा है।
इस विभाग की फिर से बहाली से भारत के कमोडिटी डेरिवेटिव बाजार के विकास को नई गति मिलने की उम्मीद है। इसके पुनर्गठन से सेबी के भीतर अधिकारियों के आंतरिक फेरबदल की भी शुरुआत हो सकती है। इस बारे में जानकारी के लिए सेबी को ईमेल के जरिये भेजे गए सवालों का जवाब नहीं मिला।
आईएमसी चैंबर ऑफ़ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री में कैपिटल मार्केट टास्क फ़ोर्स के चेयरमैन मृगांक परांजपे ने कहा, हमने सेबी को लिखित अनुरोध भेजा था, जिसमें विभाग को फिर से शुरू करने की मांग की थी। इक्विटी डेरिवेटिव और कमोडिटी डेरिवेटिव, ट्रेडिंग और सेटलमेंट के तरीकों के मामले में एक-दूसरे से बिल्कुल अलग होते हैं, भले ही डेरिवेटिव के मूल सिद्धांत एक जैसे ही क्यों न हों। उम्मीद है कि 5 साल बाद इस सेगमेंट पर फिर से खास ध्यान दिया जाएगा।
हाल के महीनों में सेबी ने कमोडिटी मार्केट में सुधार के मकसद से कई परामर्श पत्र जारी किए हैं। इनमें कृषि कमोडिटी डेरिवेटिव के लिए क्लाइंट-लेवल पोजीशन लिमिट बढ़ाने, ऐसी लिमिट के उल्लंघन पर लगने वाले जुर्माने में बदलाव और चुनिंदा कृषि कमोडिटी अनुबंधों को कैश-सेटल्ड इंस्ट्रूमेंट्स के तौर पर शुरू करने की अनुमति देने के प्रस्ताव शामिल हैं। ये अनुबंध तय सीमाएं पूरी होने पर अनिवार्य फिजिकल सेटलमेंट में बदल जाएंगे।
इसके साथ ही नियामक इस सेगमेंट में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की भागीदारी बढ़ाने के तरीकों की भी जांच कर रहा है। इनमें से कई प्रस्ताव सेबी द्वारा नियुक्त दो समितियों की सिफारिशों से निकले हैं, जिनमें से एक कृषि जिंसों पर और दूसरी गैर-कृषि जिसों पर थी।