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Nifty 50 कंपनियों की आय में गिरावट, EPS ग्रोथ रेट 4 साल में सबसे कम

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पिछले साल 20.4 फीसदी की मजबूती के बाद वित्त वर्ष 26 की पहली तिमाही में ईपीएस 7.4 फीसदी बढ़ा, जो बताता है कि रिकवरी डगमगा सकती है

Last Updated- September 09, 2025 | 9:55 PM IST
Nifty Outlook

भारतीय कंपनी जगत के कमजोर प्रदर्शन के बाद निफ्टी 50 कंपनियों की आय में 2025-26 की पहली तिमाही के दौरान तेजी से गिरावट आई। बेंचमार्क इंडेक्स की अंतर्निहित प्रति शेयर आय (ईपीएस) सालाना आधार पर महज 7.4 फीसदी बढ़ी, जो करीब चार साल की सबसे कमजोर रफ्तार है। यह मंदी पिछली आय गिरावट से भी बदतर है जब जुलाई-सितंबर 2023 के दौरान ईपीएस औसतन 8.8 फीसदी बढ़ा था। उस गिरावट के बाद रिकवरी हुई थी, जो अब फिर से रुकता हुआ प्रतीत होता है।

तुलना करें तो सितंबर 2024 में ईपीएस में सालाना आधार पर 20.4 फीसदी की वृद्धि हुई थी और पिछले दो वर्षों में इसमें सालाना आधार पर औसतन 18 फीसदी का इजाफा हुआ है। सूचकांक के लिए पिछले 12 महीने का ईपीएस 1,135.4 रुपये है, जो सितंबर 2024 के अंत में 1,057.1 रुपये और दिसंबर 2024 के अंत में रहे 1,081.1 रुपये से ऊपर है। यह गति दीर्घकालिक और मध्यम अवधि दोनों के रुझान से धीमी है। पिछले 20 वर्षों में ईपीएस औसतन 12.6 फीसदी सालाना की रफ्तार से बढ़ा है जबकि 10 वर्षों का औसत 10.8 फीसदी रहा है।

यह विश्लेषण निफ्टी 50 के पिछले 12 महीनों के पीई गुणक और उसके अंतर्निहित ईपीएस पर आधारित है, जिसकी गणना हर माह के अंत में सूचकांक के समापन मूल्य से की जाती है। तिमाही आय चक्र के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिए पीई और ईपीएस के तीन महीने के मूविंग एवरेज का इस्तेमाल किया गया है। सूचकांक ईपीएस इसमें शामिल 50 कंपनियों के संयुक्त शुद्ध लाभ को दर्शाता है।

इस बीच, मूल्यांकन में 2023 और 2024 के उच्चतम स्तर से केवल मामूली सुधार देखा गया है। सूचकांक अभी करीब 21.8 गुने के पिछले पीई गुणक पर कारोबार कर रहा है, जो 2024 में 23 गुना और 2023 में 22.3 गुना के औसत से नीचे है। मूल्यांकन इस साल फरवरी के अंत में देखे गए करीब 20 गुने के महामारी के बाद के निचले स्तर से ऊपर बना हुआ है।

मौजूदा पीई गुणक 2005 से 20.1 गुने के दीर्घकालिक औसत से अधिक है, लेकिन क्रमशः 10 वर्षीय और 5 वर्षीय औसत 23.2 गुने और 24.2 गुने से कम है।

विश्लेषक मूल्यांकन में इस मजबूती का श्रेय मंदी के बावजूद भविष्य की आय को लेकर निवेशकों के आशावादी रवैये को देते हैं। मोतीलाल ओसवाल फाइनैंशियल सर्विसेज के विश्लेषकों ने अपनी वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही की आय समीक्षा में लिखा है, वित्त वर्ष 2026 में निफ्टी 50 के लिए ईपीएस 9 फीसदी बढ़ने का अनुमान है, जिसे प्रोत्साहनकारी राजकोषीय और मौद्रिक उपायों के कारण वृहद आर्थिक परिदृश्य में अपेक्षित सुधार से मदद मिलेगी। टैरिफ संबंधी अनिश्चितताओं के कारण पिछले दो महीनों में भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव रहा है, लेकिन हमारा मानना ​​है कि बेहतर आय संभावनाओं और उचित मूल्यांकन से बाजार को मामूली बढ़त हासिल करने में मदद मिलेगी।

धीमी होती आय और बढ़े हुए मूल्यांकन के संयोजन ने मूल्य सेआय वृद्धि (पीईजी) अनुपात को तेजी से बढ़ा दिया है। यह अब करीब 3 गुना है यानी 52 महीनों में सबसे ज्यादा जबकि दिसंबर 2024 के अंत में यह 1.18 गुना और सितंबर 2024 में 1.19 गुना रहा था।

पीईजी अनुपात (जिसकी गणना पिछली पीई को ईपीएस वृद्धि से विभाजित करके की जाती है) यह दर्शाता है कि निवेशक आय वृद्धि के लिए कितना भुगतान करने को तैयार हैं। पिछले 20 वर्षों में इसका औसत मूल्य 1.19 गुना रहा है, जो दर्शाता है कि मूल्यांकन ऐतिहासिक रूप से आय का अधिक बारीकी से अनुसरण करते रहे हैं।

कुछ विश्लेषकों ने चेतावनी देते हुए कहा है कि यह बुनियादी बातों और बाज़ार मूल्य निर्धारण के बीच के अंतर को दर्शाता है। कोटक इंस्टिट्यूशनल इक्विटीज़ (केआईई) के संजीव प्रसाद, अनिंद्य भौमिक और सुनीता बलदावा ने अपनी वित्त वर्ष 26 की पहली तिमाही की समीक्षा में लिखा, भारतीय बाजार अभी भी बुनियादी बातों से काफी हद तक कटा हुआ है और विभिन्न क्षेत्रों में उच्च मूल्यांकन को खुदरा निवेश का सहारा मिला हुआ है।

केआईई के विश्लेषकों को अनुकूल वृहद परिदृश्य के बावजूद आय में उल्लेखनीय वृद्धि की उम्मीद नहीं है। वे उपभोग में केवल मामूली वृद्धि का अनुमान लगाते हैं, जो वित्त वर्ष 26 के बजट में आयकर में कटौती, हाल ही में वस्तु एवं सेवा कर में की गई कटौती और कैलेंडर वर्ष 2025 की पहली छमाही में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में 100 आधार अंकों की कटौती के कारण संभव है। हालांकि वे केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय में कमी और आवास में घरेलू निवेश में संभावित गिरावट के कारण कमजोर निवेश मांग का अनुमान लगाते हैं। प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में उपभोक्ता और कॉरपोरेट धारणा में सुस्ती के बीच निर्यात पर भी दबाव बने रहने की आशंका है। इससे इक्विटी बाजार में और अधिक अस्थिरता तथा गिरावट की संभावना बढ़ जाती है।

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First Published - September 9, 2025 | 9:49 PM IST

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