पश्चिम एशिया युद्ध को दो महीने पूरे हो चुके हैं। ब्लैकरॉक में एपीएसी के लिए मुख्य निवेश रणनीतिकार बेन पॉवेल ने नई दिल्ली में पुनीत वाधवा को साक्षात्कार में बताया कि अगले छह महीनों में उनके निवेश संबंधी फैसलों को प्रभावित करने वाले तीन सबसे अहम कारक होंगे – आय, ब्याज दरें और महंगाई का रुख। उन्होंने कहा कि महंगाई विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह दरों और बाजार की गतिशीलता दोनों को प्रभावित करती है। उनसे बातचीत के मुख्य अंश:
पिछले दो महीनों से पश्चिम एशिया में जारी लड़ाई पर आपका क्या आकलन है? बाजारों पर इसका क्या असर दिखा है और आगे बाजार किस चीज से चौंक सकते हैं?
आगे की बात करें तो मुख्य सवाल अवधि को लेकर है। होर्मुज स्ट्रेट अभी भी बंद है। असल में हमारे सामने दोहरी नाकेबंदी की स्थिति है, क्योंकि ईरान और अमेरिका दोनों ही ऊर्जा का रास्ता रोक रहे हैं। इसके अलावा भी कई दूसरी जरूरी चीजें और सामान प्रभावित हुए हैं। इसलिए, यह आपूर्ति से जुड़ी बड़ी समस्या है, हालांकि ऊर्जा का मुद्दा सबसे अहम है।
मेरी राय में बाजार अभी भी काफी हद तक आशावादी हैं कि इस समस्या का कोई हल जल्द ही निकल आएगा। हमें ठीक से नहीं पता कि ऐसा कब होगा। लेकिन कुछ अच्छे संकेत जरूर मिल रहे हैं। मामला थोड़ा पेचीदा है और इसमें समय लगेगा। इस दौरान उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं। इसके बावजूद आर्थिक नजरिये से देखें तो इस जंग में किसी की भी जीत नहीं हो रही है, यह पूरी दुनिया और खुद ईरान के लिए भी एक बड़ी समस्या है। लेकिन समय को लेकर हम अनिश्चित हैं। इसमें दिन, सप्ताह या और भी ज्यादा समय लग सकता है।
आपको कब लगता है कि बाजार किसी समाधान की उम्मीद छोड़ देंगे?
बाजार कभी भी पूरी तरह से उम्मीद नहीं छोड़ते। लेकिन अगर हॉर्मुज स्ट्रेट बंद रहता है, तो एक बड़ा बदलाव आ सकता है, कीमतें चढ़ने से लेकर नहीं चढ़ने तक। कमोडिटीज भौतिक चीजें होती हैं। महंगी आपूर्ति से लेकर एकदम किल्लत तक का बड़ा जोखिम है। यह ऐसी स्थिति है जिसमें आपको वह उत्पाद मिल ही न पाए। हम विमानन ईंधन और डीजल जैसे बाजारों में शुरुआती दबाव देख रहे हैं। इससे मांग में कमी के शुरुआती संकेत मिल रहे हैं, उदाहरण के लिए लोग हवाई यात्रा न करने का फैसला कर रहे हैं क्योंकि ईंधन की लागत के कारण टिकट की कीमतें बहुत ज्यादा हैं। अगर कीमतें ज्यादा होने से हालात बिगड़कर कमी में बदल जाते हैं, तो मांग में कमी और गहरा जाएगी, जिससे एक जबरदस्त आर्थिक झटका लगेगा, खासकर उन अर्थव्यवस्थाओं को जो ऊर्जा का आयात करती हैं।
क्या यही वह समय होगा जब बाजार कमजोर पड़ने लगेंगे?
शायद। फिलहाल तो बाजार अभी भी आशावादी हैं। लेकिन असली मुद्दा महंगाई है। ऊर्जा हर चीज से जुड़ी है, हर क्षेत्र इसी पर निर्भर है। अगर कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका बोझ उपभोक्ताओं पर पड़ता है। इससे पूरी अर्थव्यवस्था में महंगाई का दबाव बनता है। इसलिए इस क्रम को समझना जरूरी है। सबसे पहले ऊर्जा बाजारों पर असर पड़ता है, उसके बाद महंगाई के जरिये इसका असर फिक्स्ड इनकम पर पड़ता है और आखिर में ऊंची ब्याज दरें इक्विटी के लिए बाधा बन जाती हैं।
क्या ओपेक से बाहर निकलने का यूएई का फैसला तेल के लिए मुश्किलें खड़ी करेगा?
एक हद तक नहीं। यूएई काफी समय से इसके संकेत दे रहा था और यह कोई अप्रत्याशित नहीं है। कतर 2019 में ही इससे बाहर निकल गया था। मोटे तौर पर, यह दुनिया भर में चल रहे बिखराव का रुझान दिखाता है। कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं दबाव में हैं और देश अब ज्यादा से ज्यादा आत्मनिर्भरता पर जोर दे रहे हैं। यूएई का यह कदम स्वतंत्र नीति-निर्माण और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने की दिशा में हो रहे इस बड़े बदलाव के अनुरूप ही है।