वैश्विक पूंजी का झुकाव आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) से जुड़े निवेश की ओर होने के बावजूद घरेलू निवेशक भारतीय इक्विटी में मजबूती से डटे हुए हैं। इस साल घरेलू संस्थागत निवेशकों ने हर कारोबारी दिवस में इक्विटी में औसतन 4,000 करोड़ रुपये का निवेश किया है। उनकी लगातार खरीदारी ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की भारी बिकवाली की काफी हद तक भरपाई करने में मदद की है और बाजार में बड़ी गिरावट को रोका है।
स्टॉक एक्सचेंजों के आंकड़ों से पता चलता है कि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 2026 के पहले 6 महीनों में (9 जून तक) 106 कारोबारी सत्रों में 4.3 लाख करोड़ रुपये मूल्य के शेयर खरीदे जो जनवरी-जून अवधि के लिए दर्ज किया गया अब तक का सबसे अधिक निवेश है। इसके उलट नैशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी (एनएसडीएल) के आंकड़ों के अनुसार विदेशी निवेशकों ने इस अवधि में 2.8 लाख करोड़ रुपये मूल्य के शेयर बेचे हैं, जो पहली छमाही में अभी तक की सबसे बड़ी बिकवाली है।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही वैश्विक निवेशकों ने अपना धन विकसित बाजारों और एआई से जुड़े क्षेत्रों में लगाया है मगर घरेलू बचत का बड़ा हिस्सा म्युचुअल फंड, बीमा उत्पादों, पेंशन योजनाओं और वैकल्पिक निवेश फंडों (एआईएफ) के जरिये इक्विटी में आ रहा है।
घरेलू संस्थागत निवेशकों की निवेश क्षमता का एक बड़ा हिस्सा म्युचुअल फंड से आया है। 2026 के शुरुआती पांच महीनों में ऐक्टिव इक्विटी योजनाओं में 1.5 लाख करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश हुआ जो पिछले साल इसी अवधि में जुटाए गए 1.4 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है। इस बीच म्युचुअल फंडों ने सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में 2.7 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश किया है।
बाजार के भागीदारों का कहना है कि भारतीय परिवारों के पास बहुत कम आकर्षक विकल्प हैं। बैंक जमा और पारंपरिक बचत उत्पादों जैसे आय के निवेश साधान से अक्सर कर और मुद्रास्फीति के बाद बामुश्किल धनात्मक वास्तविक रिटर्न मिल पाता है। विदेशी निवेश पर नियामकीय सीमाएं और परिचालन रुकावटें बनी हुई हैं। नतीजतन, इक्विटी को दीर्घकालिक संपत्ति सृजन के सबसे प्रभावी साधनों में से एक माना जाता है।
अल्फानीति फिनटेक के सह-संस्थापक यूआर भट्ट ने कहा, ‘कई मायनों में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) आवर्ती जमा का आधुनिक रूप बन गए हैं। निवेशकों में हर महीने अपने वेतन का कुछ हिस्सा अलग रखने की आदत बन गई है। रुपया-लागत औसत और बाजार चक्रों के जरिये निवेशित रहने की अवधारणा समय के साथ मजबूत हुई है, जिससे खुदरा निवेशकों के व्यवहार में बड़ा बदलाव आया है।’
घरेलू निवेश का लचीलापन, खास तौर पर व्यापक बाजार में साफ तौर पर देखा गया है। लगातार विदेशी बिकवाली के बावजूद, इस साल निफ्टी मिडकैप 100 और निफ्टी स्मॉलकैप 100 में ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं दिखा है। इन्होंने बेंचमार्क निफ्टी से बेहतर प्रदर्शन किया है। निफ्टी में करीब 11 फीसदी की गिरावट आई है।
जानकार इस अंतर की वजह कुछ हद तक विदेशी निवेशकों की बिकवाली को मानते हैं जो मुख्य रूप से बड़े और लिक्विड शेयरों में हुई है। ये शेयर बेंचमार्क सूचकांक में अहम भूमिका निभाते हैं। वहीं घरेलू स्तर पर लगातार आ रहे निवेश ने मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों को सहारा दिया है जिनमें स्थानीय निवेशकों की शेयरधारिता ज्यादा है।
दूसरे एशियाई बाजारों की तुलना में यह अंतर और भी स्पष्ट दिखता है। दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे एआई आधारित बाजारों ने इस साल काफी विदेशी निवेश आकर्षित किया है और उनका प्रदर्शन भी बेहतर रहा है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच भू-राजनीतिक तनाव के कारण ऊर्जा की बढ़ती कीमतों की चिंता से घरेलू शेयर बाजार को जूझना पड़ रहा है।
इक्विनॉमिक्स के संस्थापक जी चोकालिंगम ने कहा, ‘ मौजूदा भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं को देखते हुए एफपीआई निवेश में किसी बड़े बदलाव के संकेत नहीं दिख रहे हैं। ऐसे माहौल में घरेलू संस्थागत निवेशकों के खरीदार बने रहने की संभावना है। अगर घरेलू संस्थान इस बिकवाली की भरपाई करने में सक्षम नहीं होते हैं तो बाजार में तेज गिरावट आ सकती है। इसके अलावा, अब विदेशी निवेशकों की तुलना में घरेलू संस्थागत निवेशों के पास भारतीय इक्विटी का बड़ा हिस्सा है, जिससे बाजार में स्थिरता उनके लिए महत्त्वपूर्ण है।’
चोकालिंगम के अनुसार विदेशी निवेशकों की बिकवाली के समय खरीदारी करने की रणनीति लंबे समय में फायदेमंद साबित होती है। उन्होंने कहा, साल 2008 के लीमन ब्रदर्स संकट के बाद से एक स्पष्ट रुझान दिखा है। जब भी विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने डर या अनिश्चितता के कारण आक्रामक रूप से बिकवाली की है, घरेलू संस्थागत निवेशक खरीदार के रूप में आगे आए हैं। यह वैश्विक वित्तीय संकट, 2016 के आसपास की उथल-पुथल और कोविड-19 महामारी के दौरान भी दिखा है।