यूबीएस सिक्योरिटीज में उभरते बाजार (ईएम) और एशिया इक्विटी स्ट्रैटेजी के प्रमुख सुनील तिरुमलाई का कहना है कि वैश्विक निवेशक भारत को लेकर सतर्क बने हुए हैं। महंगे मूल्यांकन और दूसरे बाजारों में ज्यादा आकर्षक मौकों की वजह से वे अपने निवेश आवंटन पर फिर से विचार कर रहे हैं। समी मोडक को दिए इंटरव्यू में तिरुमलाई ने बताया कि यूबीएस के ईएम पोर्टफोलियो में भारत का वेटेज कम क्यों है, घरेलू निवेश ने बाजार की चाल को कैसे बदला है और ऐसी कौन सी बातें हैं जो विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी फिर से जगा सकती हैं। बातचीत के अंश:
उभरते बाजारों को लेकर आपकी मौजूदा स्थिति क्या है और भारत इसमें कहां है?
ईएम बास्केट में हम चीन, दक्षिण कोरिया, ब्राजील और मलेशिया पर ‘ओवरवेट’ हैं। भारत पर कुछ समय से ‘अंडरवेट’ हैं। पिछले साल जब मूल्यांकन में सुधार हुआ था, तो हम कुछ समय के लिए भारत पर ‘तटस्थ’ हो गए थे। लेकिन जैसे-जैसे टेक्नॉलजी (टेक) चक्र, खासकर एआई और मजबूत हुआ, हमने ताइवान जैसे बाजारों में अपना निवेश बढ़ाया और भारत को वापस ‘अंडरवेट’ श्रेणी में डाल दिया। हमारी मौजूदा स्थिति दर्शाती है कि कमाई की गति और संरचनात्मक कारक कहां सबसे अधिक मजबूत हैं।
भारत पारंपरिक रूप से अन्य उभरते बाजारों (ईएम) की तुलना में प्रीमियम पर कारोबार करता रहा है। अब इसमें किस तरह का बदलाव आया है?
भारत ने हमेशा प्रीमियम पर कारोबार किया है। चीन ने आम तौर पर डिस्काउंट पर ट्रेड किया है (सिर्फ 2020–2021 के दौर को छोड़कर, जब महामारी के दौरान चीन ही एकमात्र बड़ी अर्थव्यवस्था थी जो उस समय खुली हुई थी)। यह प्रीमियम निवेशकों की सोच को दिखाता है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले, यह प्रीमियम 15–20 प्रतिशत था, जिसे इंडिया इंडेक्स की विकास दर और अलग-अलग क्षेत्रों के मिश्रण के हिसाब से समायोजित किया गया था। इसके बाद यह बढ़कर 30–40 प्रतिशत हो गया और कुछ समय तक इसी स्तर पर बना रहा। महामारी के बाद इसमें तेजी से उछाल आई। 2024 में एक समय तो यह प्रीमियम लगभग 100 प्रतिशत तक पहुंच गया था।
इसका मतलब यह था कि भारतीय शेयरों का मूल्यांकन, दुनिया भर में उनके जैसे ही दूसरे शेयरों के मुकाबले लगभग दोगुना हो गया था। अब यह घटकर लगभग 70 प्रतिशत पर आ गया है, जो अब भी काफी ज्यादा है। हमारी राय में, 40 प्रतिशत का प्रीमियम ज्यादा सही और उचित है।
भारत के मूल्यांकन प्रीमियम में किस वजह से बड़ी तेजी आई?
40 प्रतिशत से 100 प्रतिशत तक की यह बढ़त, कमाई में बढ़ोतरी के बजाय मुख्य रूप से मूल्यांकन में विस्तार के कारण हुई। कमाई में उसी अनुपात में सुधार के बगैर पीई मल्टीपल में तेजी से उछाल आई। इसका एक अहम हिस्सा मजबूत घरेलू तरलता और रिटेल प्रवाह के कारण था।
हाल के वर्षों में घरेलू निवेशकों की भूमिका में किस तरह का बदलाव आया है?
कई देशों में, घरेलू निवेशक अब बाजार की दिशा तय करने वाले मुख्य कारक बन गए हैं। भारत इसका एक साफ उदाहरण है। महामारी के बाद विदेशी निवेशकों की शुद्ध बिकवाली के बावजूद भारतीय बाजार ने दूसरे उभरते बाजारों (ईएम) के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है। इसके विपरीत चीन में विदेशी निवेश आया तो सही, लेकिन उसका प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। इससे पता चलता है कि बाजार की चाल तय करने में अब घरेलू निवेश की भूमिका ज्यादा अहम हो गई है।
वैश्विक निवेशकों के लिए भारत फिर से कैसे आकर्षक बन सकता है?
इसके दो मुख्य कारण हैं। पहला, अगर एआई से जुड़ा मौजूदा उत्साह थोड़ा कम हो जाए। दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बाजार एआई आपूर्ति श्रृंखला की वजह से फायदा उठा रहे हैं। अगर यह उम्मीद ठंडी पड़ जाती है या इसका असर पहले ही दिख जाता है तो भारत को तुलनात्मक रूप से फायदा हो सकता है।
दूसरा, विनिर्माण को लेकर भारत का नजरिया, खासकर चीन के साथ उसका जुड़ाव है। विनिर्माण को बड़े पैमाने पर बढ़ाने के लिए शायद चीन के निवेश और तकनीक की जरूरत पड़ेगी, जैसा कि वियतनाम, थाईलैंड और मेक्सिको जैसे देशों में देखा गया है। अगर भारत इस तरह के सहयोग के लिए ज्यादा खुला नजरिया अपनाता है, तो इससे रोजगार, निर्यात और चालू खाते के मामले में व्यापक आर्थिक फायदे हो सकते हैं।